उत्तर प्रदेश नगरीय परिसर किरायेदारी विनियमन अधिनियम, 2021 की धारा 21(2)(m) की महत्वपूर्ण व्याख्या करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कानून के तहत “मकान मालिक द्वारा अपेक्षित” (required by landlord) आधार केवल मकान मालिक के खुद के व्यक्तिगत भौतिक कब्जे तक सीमित नहीं है। अदालत ने कहा कि यदि उचित और वैध संबंध (nexus) स्थापित होता है, तो इसमें बेटे जैसे निकट पारिवारिक सदस्य के व्यवसाय की स्थापना या संचालन की वास्तविक जरूरत भी शामिल हो सकती है। जस्टिस डॉ. योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव की एकल पीठ ने बेदखली आदेशों को चुनौती देने वाली किरायेदारों की संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत दाखिल दो याचिकाओं को खारिज करते हुए यह निर्णय दिया। इसके साथ ही अदालत ने प्रावधान के पहले हिस्से के तहत मकान मालिक के व्यक्तिगत भौतिक कब्जे की अनिवार्यता को खारिज कर दिया, हालांकि किरायेदारों को बकाया चुकाने और अंडरटेकिंग देने की शर्त पर परिसर खाली करने के लिए छह महीने का समय प्रदान किया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह फैसला धारा 21(2)(m) से जुड़े समान कानूनी प्रश्नों को उठाने वाली दो अलग-अलग याचिकाओं पर आया।
पहला मामला (संदीप बनाम विनोद कुमार छाबड़ा) मुजफ्फरनगर के नई मंडी स्थित वकील रोड की दुकान संख्या 97-बी से संबंधित था। मकान मालिक विनोद कुमार छाबड़ा ने किराये के भुगतान में चूक, परिसर में भौतिक फेरबदल, संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 की धारा 106 के तहत नोटिस और अपने बेटे के व्यवसाय/कार्यालय की जरूरत का हवाला देते हुए धारा 21(2) के तहत बेदखली याचिका दायर की थी। मुजफ्फरनगर रेंट अथॉरिटी ने 13 फरवरी 2025 को इस अर्जी को खारिज कर दिया था। इसके बाद जिला जज/रेंट ट्रिब्यूनल, मुजफ्फरनगर ने 13 मई 2026 को मकान मालिक की अपील आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए किरायेदार को दुकान खाली करने का आदेश दिया।
दूसरा मामला (केशव भल्ला बनाम विहित प्राधिकारी / रेंट अथॉरिटी एवं अन्य) फर्रुखाबाद के मोहल्ला बढ़पुर स्थित एक दुकान से जुड़ा था। इस दुकान में किरायेदार केशव भल्ला ‘मैसर्स अनिल ऑटो रिपेयर्स’ नाम से टेंपो मरम्मत का काम कर रहे थे। यह परिसर लगभग साढ़े चार दशक पहले उनके दिवंगत पिता को किराये पर दिया गया था। मकान मालिक अखिलेश चंद्र गंगवार ने अपने बेरोजगार बेटे को व्यवसाय शुरू कराने की जरूरत और किराये के भुगतान में चूक का आधार लेकर धारा 21(2) के तहत याचिका दाखिल की। रेंट अथॉरिटी/अपर जिला मजिस्ट्रेट, फर्रुखाबाद ने 22 फरवरी 2025 को बेदखली का आदेश दिया, जिसकी पुष्टि रेंट ट्रिब्यूनल/अपर जिला जज ने 10 अप्रैल 2026 को की। दोनों मामलों में किरायेदारों ने हाईकोर्ट की पर्यवेक्षी अधिकारिता के तहत याचिकाएं दाखिल की थीं।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता किरायेदारों के अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि धारा 21(2)(m) केवल मकान मालिक की अपनी व्यक्तिगत आवश्यकता की बात करती है और इसमें बेटे की जरूरत को बेदखली का स्वतंत्र आधार नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा कि निचली अदालतों ने वैधानिक आधार का अनुचित विस्तार किया है, किरायेदार की आजीविका के एकमात्र साधन की अनदेखी की है, मकान मालिकों की अन्य खाली दुकानों के विकल्प पर विचार नहीं किया और तुलनात्मक कठिनाई (comparative hardship) का आकलन करने में विफल रहे। यह भी दलील दी गई कि निरस्त हो चुके 1972 के अधिनियम में मौजूद “उसके परिवार का सदस्य” शब्दावली को 2021 के नए कानून में विधायिका ने जानबूझकर छोड़ दिया है, इसलिए ‘मकान मालिक द्वारा कब्जा’ का दायरा परिवार के सदस्यों तक नहीं बढ़ाया जा सकता।
इसके विपरीत, मकान मालिकों के वकीलों ने तर्क दिया कि ‘मकान मालिक द्वारा कब्जा’ का अर्थ केवल उनके व्यक्तिगत भौतिक उपयोग तक सीमित नहीं हो सकता। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के जोगिंदर पाल बनाम नवल किशोर के ऐतिहासिक फैसले के साथ-साथ कैलाश चंद बनाम धरम दास, अजीत सिंह बनाम जीत राम, द्वारका प्रसाद बनाम निरंजन, महमूदा गुलशन बनाम जावैद हुसैन मंग्लू और मुरलीधर अग्रवाल बनाम महेंद्र प्रताप काकन का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि स्थापित किराया कानून के अनुसार, व्यवसाय स्थापित करने के लिए आश्रित परिवार के सदस्य की जरूरत मकान मालिक की अपनी आवश्यकता के दायरे में ही आती है। इसके अलावा, परिसर का विधिक नियंत्रण और स्वामित्व मकान मालिक के पास ही बना रहता है।
अदालत के सहयोग के लिए उपस्थित राज्य के अपर महाधिवक्ता ने स्पष्ट किया कि 2021 का अधिनियम पुराने 1972 के कानून से एक सोचा-समझा बदलाव है, जिसमें ‘सद्भावी’ (bona fide) और ‘तुलनात्मक कठिनाई’ जैसी शर्तों को समाप्त कर दिया गया है, जैसा कि श्याम पाल बनाम बी.एस. एंटरप्राइजेज में माना गया था। राम सूरत मिश्रा बनाम यूपी राज्य के पूर्ण पीठ के फैसले का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि अधिनियम के मूल हिंदी पाठ और अंग्रेजी संस्करण में ‘or’ से पहले लगे अल्पविराम (comma) से यह साफ है कि धारा में दो अलग-अलग स्थितियां हैं: पहली, परिसर की मौजूदा स्वरूप में आवश्यकता; और दूसरी, विध्वंस व नए निर्माण के बाद मकान मालिक के खुद के कब्जे के लिए आवश्यकता। राज्य की ओर से बजरंगी बनाम यूपी राज्य, डॉ. एम.के. साल्पेकर बनाम सुनील कुमार शमसुंदर चौधरी, समा अलाना अब्दुल्ला बनाम गुजरात राज्य, नानालाल गोवर्धनलाल एंड कंपनी बनाम सम्राटबाई लीलाचंद शाह, वर्षा अग्रवाल बनाम रेंट ट्रिब्यूनल और शफीकुर्रहमान बनाम विशेष न्यायाधीश का भी संदर्भ दिया गया।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और कानूनी व्याख्या
कानून के इतिहास, व्याकरण और रूपरेखा का परीक्षण करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि धारा 21(2)(m) में ‘या’ (or) और अंग्रेजी पाठ में अल्पविराम द्वारा अलग किए गए दो स्पष्ट विकल्प शामिल हैं: पहला, परिसर का मौजूदा रूप में अपेक्षित होना; दूसरा, विध्वंस और नए निर्माण के बाद मकान मालिक के कब्जे के प्रयोजनार्थ अपेक्षित होना।
व्याकरण के विश्लेषण के संदर्भ में कोर्ट ने ‘रूल ऑफ द लास्ट एंटीसिडेंट’ (Rule of the Last Antecedent) का उल्लेख किया, जिसे सदरलैंड, स्कालिया एवं गार्नर (रीडिंग लॉ) और जस्टिस जी.पी. सिंह (प्रिंसिपल्स ऑफ स्टेट्यूटरी इंटरप्रिटेशन) के ग्रंथों के साथ-साथ ओ’कॉनर बनाम ओकहर्स्ट डेयरी, बार्नहार्ट बनाम थॉमस, सुरेंद्र नारायण सिंह बनाम बिहार राज्य, मोहम्मद शब्बीर बनाम महाराष्ट्र राज्य, बेल एक्सप्रेसव्यू लिमिटेड पार्टनरशिप बनाम रेक्स, रेक्स बनाम केसमेंट और अश्विनी कुमार घोष बनाम अरबिंदा बोस के निर्णयों में मान्यता दी गई है। कोर्ट ने रेखांकित किया कि यद्यपि विराम चिह्न व्याख्या का एक गौण साधन है, फिर भी इसकी स्थिति यह दर्शाती है कि “मकान मालिक द्वारा अपने अधिभोग के प्रयोजनार्थ” वाक्यांश स्वाभाविक रूप से विध्वंस और पुनर्निर्माण वाली दूसरी स्थिति से जुड़ा है।
प्रावधान के पहले हिस्से में “मकान मालिक द्वारा अपेक्षित” के मूल अर्थ की व्याख्या करते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:
“इसलिए, ‘मकान मालिक द्वारा अपेक्षित’ शब्दों को अनिवार्य रूप से ‘मकान मालिक के अपने व्यक्तिगत भौतिक कब्जे के लिए अपेक्षित’ का पर्याय मानना उचित नहीं होगा। ऐसा अर्थ निकालने से पहले हिस्से में एक ऐसी शर्त जुड़ जाएगी जो विधायिका ने वहां व्यक्त नहीं की है, जबकि विधायिका ने दूसरे विकल्प में मकान मालिक द्वारा कब्जे का स्पष्ट उल्लेख किया है।”
दोनों पक्षों द्वारा दी गई चरम दलीलों को अस्वीकार करते हुए पीठ ने कहा:
“अदालत दोनों पक्षों द्वारा प्रस्तुत किसी भी चरम व्याख्या को स्वीकार नहीं करती है। पहली यह कि ‘मकान मालिक द्वारा अपेक्षित’ शब्दों का अर्थ अनिवार्य रूप से यह है कि मकान मालिक को खुद परिसर पर भौतिक रूप से कब्जा करना होगा, जो प्रावधान के पहले हिस्से में न दी गई शर्त को जोड़ देगा। दूसरी यह कि बेटे या किसी अन्य पारिवारिक सदस्य की आवश्यकता स्वतः ही मकान मालिक की आवश्यकता बन जाती है, जो ‘मकान मालिक द्वारा’ अभिव्यक्ति के सीमित दायरे को ही समाप्त कर देगी। सही व्याख्या इन दोनों चरम सीमाओं के बीच स्थित है और यह वैधानिक भाषा तथा न्यायिक निर्णयों द्वारा मान्यता प्राप्त संबंध (nexus) के नियंत्रित सिद्धांत दोनों को प्रभावी बनाती है।”
अदालत ने स्पष्ट किया कि जोगिंदर पाल मामले में प्रतिपादित परीक्षण यह निर्धारित करने के लिए लागू होता है कि कथित आवश्यकता का मकान मालिक के अपने हित से वैध संबंध है या नहीं:
“मकान मालिक और प्रस्तावित उपयोगकर्ता के बीच संबंध, प्रस्तावित उपयोग की प्रकृति और उद्देश्य, वे परिस्थितियां जिनमें आवश्यकता उत्पन्न हुई है, निर्भरता या आपसी संबंध की सीमा, और दावे की सत्यता व अंतर्निहित औचित्य इस प्रश्न को निर्धारित करने में प्रासंगिक विचार हैं।”
अदालत ने आगे कहा:
“तदनुसार, जहां परिसर अपने मौजूदा स्वरूप में मकान मालिक के बेटे के व्यवसाय या रोजगार को स्थापित करने या चलाने के लिए मांगा जाता है, ऐसी आवश्यकता को शुरुआत में ही केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि प्रस्तावित उपयोगकर्ता मकान मालिक व्यक्तिगत रूप से न होकर उसका बेटा है। प्रासंगिक प्रश्न यह है कि सक्षम प्राधिकारी के समक्ष प्रस्तुत तथ्यों और सामग्री के आधार पर क्या आवश्यकता को धारा 21(2)(m) के तहत उचित रूप से मकान मालिक की अपनी आवश्यकता माना जा सकता है।”
कानूनी स्थिति का सार संक्षेप प्रस्तुत करते हुए अदालत ने निर्णय दिया:
“परिणामस्वरूप, परिवार के किसी करीबी सदस्य, जिसमें बेटा भी शामिल है, की आवासीय या व्यावसायिक गतिविधियों को स्थापित करने या चलाने के उद्देश्य से की गई वास्तविक आवश्यकता पहले हिस्से के दायरे में आ सकती है, जहां तथ्यों के आधार पर इसे उचित रूप से मकान मालिक की आवश्यकता माना जा सकता है।”
इन सिद्धांतों को तथ्यों पर लागू करते हुए पीठ ने पाया कि दोनों मामलों में मकान मालिकों ने अपने बेटों के व्यवसाय स्थापित करने की आवश्यकता को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया था और सक्षम प्राधिकारियों ने उनके पक्ष में ठोस तथ्यात्मक निष्कर्ष दिए थे। हाईकोर्ट ने दोहराया कि अनुच्छेद 227 के तहत supervisory अधिकारिता का दायरा सबूतों के दोबारा मूल्यांकन करने या निष्कर्षों को बदलने की अनुमति तब तक नहीं देता, जब तक कि आदेश मनमाना, विकृत या बिना अधिकार क्षेत्र का न हो। इसके अलावा, जब विधायिका ने खुद 2021 के कानून में वैकल्पिक आवास और तुलनात्मक कठिनाई को स्वतंत्र अनिवार्य शर्तों के रूप में शामिल नहीं किया है, तो अदालतें उन्हें बाहर से नहीं जोड़ सकतीं।
अदालत का निर्णय और निर्देश
हाईकोर्ट ने दोनों याचिकाओं को योग्यताहीन मानते हुए खारिज कर दिया और बेदखली के आदेशों को सही ठहराया।
हालांकि, किरायेदारों के वकीलों द्वारा किए गए वैकल्पिक अनुरोध और मकान मालिकों की सहमति को देखते हुए अदालत ने किरायेदारों को परिसर खाली करने और शांतिपूर्ण कब्जा सौंपने के लिए छह महीने का समय दिया। इसके लिए निम्नलिखित शर्तें तय की गईं:
- दोनों किरायेदार संबंधित रेंट अथॉरिटी के समक्ष दो सप्ताह के भीतर यह शपथ पत्र (undertaking) दाखिल करेंगे कि वे 23 मार्च 2027 को या उससे पहले परिसर खाली कर शांतिपूर्ण कब्जा मकान मालिक को सौंप देंगे। साथ ही, पिछले सभी किराये का बकाया भी दो सप्ताह के भीतर जमा करेंगे।
- परिसर के उपयोग और अधिभोग शुल्क (use and occupation charges) के रूप में अक्टूबर 2026 से शुरू होकर कब्जा सौंपने तक प्रत्येक महीने की 7 तारीख तक 4,000 रुपये प्रतिमाह जमा करने होंगे।
- किसी भी शर्त का उल्लंघन होने पर यह अंतरिम सुरक्षा स्वतः समाप्त हो जाएगी और मकान मालिक कानून के अनुसार बेदखली आदेश को क्रियान्वित कराने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र होंगे।
मामले का शीर्षक: केशव भल्ला बनाम विहित प्राधिकारी / रेंट अथॉरिटी (अपर जिला मजिस्ट्रेट) एवं अन्य
वाद संख्या: मैटर्स अंडर आर्टिकल 227 संख्या 8450 / 2026
पीठ: जस्टिस डॉ. योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव

