इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी में ‘पुनिशमेंट डेमोलिशन’ पर उठाए सवाल, कहा– ‘बुलडोजर न्याय’ कानून के राज के विपरीत

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में अपराध के तुरंत बाद मकानों और संपत्तियों को गिराए जाने की घटनाओं को गंभीरता से लिया है और राज्य सरकार से पूछा है कि क्या यह कार्यपालिका का “प्रच्छन्न अधिकार प्रयोग” है। अदालत ने यह भी नोट किया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा नवंबर 2024 में दिए गए स्पष्ट आदेश के बावजूद ऐसी ‘बुलडोजर कार्रवाइयां’ राज्य में जारी हैं।

यह मामला फैमुद्दीन और अन्य द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है, जिनका आरोप है कि उनके रिश्तेदार आफान खान के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज होने के बाद, प्रशासन ने उनके घर, ‘इंडियन लॉज’ नामक व्यावसायिक प्रतिष्ठान और एक आरा मिल को निशाना बनाकर या तो सील कर दिया या उन्हें तोड़ने की तैयारी कर ली।

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि वे स्वयं एफआईआर में आरोपी नहीं हैं, लेकिन फिर भी पुलिस और भीड़ के मिलीभगत से उन्हें निशाना बनाया गया।

न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने 21 जनवरी को पारित आदेश में यह कहा:

“याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यद्यपि वे एफआईआर में सह-आरोपी नहीं हैं, फिर भी घटना के तुरंत बाद और एफआईआर दर्ज होने के साथ ही प्रतिवादियों ने याचिकाकर्ता संख्या 2 को नोटिस जारी कर दिया, जो उस मकान के मालिक हैं जिसमें वे रहते हैं।”

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अदालत ने यह भी दर्ज किया कि जिस आरा मिल का लाइसेंस फरवरी 2025 में नवीनीकृत किया गया था, वह भी सील कर दी गई है। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ताओं की मुख्य मांग यही है कि न्यायिक हस्तक्षेप कर उनकी संपत्तियों को ढहाए जाने से रोका जाए।

उत्तर प्रदेश सरकार ने याचिका को “समय से पूर्व” बताया और कहा कि याचिकाकर्ताओं को जारी नोटिसों का जवाब देना चाहिए। सरकार ने अदालत को मौखिक आश्वासन भी दिया कि विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया का पालन किए बिना और याचिकाकर्ताओं को सुनवाई का अवसर दिए बिना कोई भी ध्वस्तीकरण नहीं किया जाएगा।

हालाँकि, हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि नवंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश के बावजूद राज्य में ऐसी ध्वस्तीकरण कार्यवाहियां जारी हैं, जिसे अदालत ने गंभीरता से लिया।

सुप्रीम कोर्ट ने जमीयत उलेमा-ए-हिंद बनाम भारत संघ मामले में कहा था:

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“बुलडोजर न्याय कानून के राज के तहत अस्वीकार्य है। यदि इसे अनुमति दी जाए, तो संविधान के अनुच्छेद 300A के तहत संपत्ति के अधिकार को निरर्थक कर दिया जाएगा।”

यह आदेश तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने दिया था।

मामले की संवैधानिक प्रकृति को देखते हुए—जिसमें राज्य का विध्वंस करने का अधिकार और नागरिकों के मौलिक अधिकार जैसे अनुच्छेद 14 और 21 शामिल हैं—हाईकोर्ट ने अगली सुनवाई की तारीख 9 फरवरी तय की है।

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