गिरफ्तारी के आधार लिखित में न देना जमानत का एकमात्र आधार नहीं, यदि आरोपी को कारणों का पता हो: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने ‘डे-लाइट डबल मर्डर’ के एक आरोपी की जमानत याचिका खारिज करते हुए एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। हाईकोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी के समय लिखित में आधार न दिया जाना मात्र आरोपी को जमानत दिलाने के लिए पर्याप्त नहीं है, बशर्ते उसे गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी हो और इस प्रक्रियात्मक चूक से उसके बचाव के अधिकार पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़ा हो।

न्यायमूर्ति सौरभ लवानिया ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि हालांकि गिरफ्तारी के आधारों की सूचना देना एक अनिवार्य संवैधानिक सुरक्षा है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट द्वारा लिखित सूचना की अनिवार्यता के संबंध में दिए गए हालिया निर्देश ‘भविष्यगामी’ (Prospective) हैं। अतः पुराने मामलों में केवल इस आधार पर गिरफ्तारी को अवैध नहीं माना जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

आवेदक सुनील कुमार शुक्ला ने सीतापुर जिले के थाना रामकोट में दर्ज मु0अ0सं0 607/2022 के तहत जमानत की गुहार लगाई थी। यह मामला आईपीसी की धारा 302, 323, 34 और 504 से संबंधित है। 25 नवंबर 2022 को दर्ज एफआईआर के अनुसार, आवेदक और उसके बेटों ने मनीष कुमार शुक्ला और मुनेंद्र शुक्ला पर ‘फरसा’ और ‘कुल्हाड़ी’ से हमला किया था, जिससे दोनों की मौके पर ही मौत हो गई थी।

आवेदक ने मुख्य रूप से इस आधार पर जमानत मांगी थी कि गिरफ्तारी के समय उसे संविधान के अनुच्छेद 22(1) और सीआरपीसी की धारा 50 के तहत लिखित में गिरफ्तारी के कारण नहीं बताए गए थे।

पक्षों के तर्क

आवेदक के वकील ने दलील दी कि लिखित आधार न देना मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के उन फैसलों का हवाला दिया जो गिरफ्तारी के कारणों को लिखित में देने पर जोर देते हैं ताकि आरोपी कानूनी सहायता प्राप्त कर सके और रिमांड का विरोध कर सके।

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वहीं, राज्य सरकार की ओर से पेश विद्वान सरकारी अधिवक्ता डॉ. वी.के. सिंह ने जमानत का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कोर्ट को बताया कि गिरफ्तारी के समय (26 नवंबर 2022) आरोपी को मौखिक रूप से कारणों की जानकारी दे दी गई थी। राज्य ने ‘गिरफ्तारी मेमो’ और ‘सूचना प्रपत्र’ पेश करते हुए कहा कि इसमें धारा 302 का स्पष्ट उल्लेख था। साथ ही, उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि मामला दोहरे हत्याकांड का है और आरोपी की भूमिका अत्यंत गंभीर है।

कोर्ट का विश्लेषण और महत्वपूर्ण नजीरें

हाईकोर्ट ने अनुच्छेद 22(1) और गिरफ्तारी की सूचना के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों का विश्लेषण किया:

  1. राम किशोर अरोड़ा बनाम ईडी (2024): कोर्ट ने नोट किया कि लिखित में आधार देने की अनिवार्यता पंकज बंसल मामले के फैसले की तारीख से लागू हुई है। उससे पहले की गिरफ्तारियों में यदि आरोपी को जानकारी थी, तो उसे अवैध नहीं ठहराया जा सकता।
  2. कर्नाटक राज्य बनाम श्री दर्शन (2025): इस मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि केवल लिखित आधारों की अनुपस्थिति गिरफ्तारी को तब तक अवैध नहीं बनाती, जब तक कि आरोपी को इससे कोई वास्तविक नुकसान (Prejudice) न हुआ हो।
  3. मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य (2026): कोर्ट ने माना कि हालांकि अब लिखित सूचना अनिवार्य है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे ‘अब से’ (Henceforth) लागू करने का निर्देश दिया है।
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हाईकोर्ट ने पाया कि इस मामले में गिरफ्तारी 2022 में हुई थी और रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि आवेदक को अपनी गिरफ्तारी के कारणों का शुरू से ही पता था।

कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा:

“गिरफ्तारी के आधार प्रस्तुत करने में देरी मात्र जमानत का आधार नहीं हो सकती… यदि कोई ठोस नुकसान साबित नहीं होता है, तो ऐसी प्रक्रियात्मक अनियमितता को सुधारा जा सकता है और यह आरोपी को रिहा करने के लिए पर्याप्त नहीं है।”

कोर्ट का निर्णय

मामले के तथ्यों, गवाहों के बयानों और आरोपी द्वारा दो लोगों की हत्या में निभाई गई सक्रिय भूमिका को देखते हुए, हाईकोर्ट ने जमानत देने से इनकार कर दिया।

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हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “अनुच्छेद 22(1) के उल्लंघन के आधार पर आवेदक को जमानत पर रिहा करना उचित नहीं है।” इसके साथ ही, ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया गया कि वह इस मामले के विचारण (Trial) को शीघ्रता से संपन्न करे।

केस विवरण:

  • केस: क्रिमिनल मिसलेनियस बेल एप्लीकेशन नंबर 928 ऑफ 2026
  • पक्ष: सुनील कुमार शुक्ला बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
  • बेंच: न्यायमूर्ति सौरभ लवानिया
  • आदेश की तिथि: 11 मार्च, 2026

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