प्रबंधन समिति के प्रस्ताव के बिना प्रबंधक द्वारा दायर रिट याचिका स्वीकार्य नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में स्पष्ट किया है कि किसी प्रबंधन समिति (Committee of Management) द्वारा अपने प्रबंधक (Manager) के माध्यम से दायर की गई रिट याचिका तब तक स्वीकार्य (Maintainable) नहीं होगी, जब तक कि याचिका के साथ समिति का वह विशिष्ट प्रस्ताव (Resolution) संलग्न न हो, जिसमें मुकदमा दायर करने का निर्णय लिया गया हो।

कोर्ट ने कहा कि प्रबंधक अपनी व्यक्तिगत क्षमता में या केवल प्रशासन योजना (Scheme of Administration) में दी गई सामान्य शक्तियों के आधार पर राज्य के अधिकारियों के आदेशों को चुनौती देने का नीतिगत निर्णय स्वयं नहीं ले सकता।

न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की पीठ ने श्री गांधी इंटर कॉलेज की प्रबंधन समिति द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए कहा कि “प्रबंधक अकेले अपने स्तर पर या प्रबंधन समिति की ओर से निर्णय लेने के लिए सक्षम नहीं है।”

मामले की पृष्ठभूमि

यह याचिका श्री गांधी इंटर कॉलेज, हरपुर बुदहट, गोरखपुर की प्रबंधन समिति द्वारा उसके प्रबंधक के माध्यम से दायर की गई थी। याचिकाकर्ताओं ने जिला विद्यालय निरीक्षक (DIOS), गोरखपुर द्वारा पारित 24 दिसंबर, 2025 के आदेश को चुनौती दी थी। इस आदेश के माध्यम से DIOS ने प्रतिवादी संख्या 3 के निलंबन के संबंध में समिति द्वारा भेजे गए 26 अक्टूबर, 2025 के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था।

सुनवाई के दौरान, विपक्षी प्रतिवादी के वकील ने रिट याचिका की स्वीकार्यता पर प्रारंभिक आपत्ति उठाई। यह तर्क दिया गया कि याचिका के साथ प्रबंधन समिति का कोई ऐसा प्रस्ताव संलग्न नहीं है जिसमें विवादित आदेश को चुनौती देने और प्रबंधक को उनकी ओर से कार्य करने के लिए अधिकृत करने का निर्णय लिया गया हो।

पक्षों की दलीलें

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याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता आर.के. ओझा ने तर्क दिया कि कॉलेज की प्रशासन योजना प्रबंधक को व्यापक शक्तियां प्रदान करती है। उन्होंने योजना के क्लॉज 20 (3) (9) का हवाला देते हुए कहा कि प्रबंधक को अभिवचनों (pleadings) पर हस्ताक्षर करने और कानूनी कार्यवाही में संस्था का प्रतिनिधित्व करने का अधिकार है। उनका कहना था कि यह क्लॉज प्रबंधक को सक्षम न्यायालय के समक्ष किसी आदेश को चुनौती देने का निर्णय लेने का अधिकार देता है और इसके लिए हर कार्यवाही के लिए नए प्रस्ताव की अनिवार्य आवश्यकता नहीं है।

इसके अतिरिक्त, याचिकाकर्ताओं ने “अहतियात के तौर पर” 13 जनवरी, 2026 का एक प्रस्ताव रिकॉर्ड पर रखा, जिसे याचिका दायर करने के बाद अपनाया गया था।

दूसरी ओर, निजी प्रतिवादी के वकील श्री आर.सी. द्विवेदी ने सरस्वती विद्या मंदिर बनाम यूपी राज्य (2003) और उमेश चंद्र बनाम महिला विद्यालय सोसाइटी (2006) सहित अन्य निर्णयों का हवाला दिया। उन्होंने तर्क दिया कि राज्य के आदेश से पीड़ित पक्ष ‘प्रबंधन समिति’ होती है, न कि स्वतंत्र रूप से प्रबंधक। प्रशासन योजना केवल प्रबंधक को प्रतिनिधित्व करने और पैरवी करने के लिए अधिकृत करती है, न कि कार्यवाही शुरू करने का नीतिगत निर्णय लेने के लिए, क्योंकि समिति का निर्णय भिन्न भी हो सकता है।

कोर्ट का विश्लेषण और निष्कर्ष

न्यायमूर्ति शमशेरी ने प्रशासन योजना और प्रबंधक के अधिकारों से संबंधित कानूनी स्थिति का परीक्षण किया। कोर्ट ने स्वीकार किया कि हालांकि योजना प्रबंधक को कर्तव्य और जिम्मेदारियां देती है, लेकिन “प्रबंधक व्यक्तिगत क्षमता में कोई वाद या रिट याचिका दायर नहीं कर सकता। यह प्रबंधन समिति है जो वाद या रिट याचिका दायर कर सकती है।”

पीठ ने वकालतनामा या हलफनामे पर हस्ताक्षर करने के अधिकार और केस दायर करने का निर्णय लेने के अधिकार के बीच स्पष्ट अंतर किया। कोर्ट ने कहा:

“प्रस्तुत मामले में, प्रशासन योजना के अनुसार, प्रबंधक को प्रबंधन समिति की ओर से प्रतिनिधित्व करने, यानी पैरवी करने, पुष्टि करने या कोई मामला दायर करने या हलफनामा देने के लिए अधिकृत किया गया है, लेकिन यह विशेष रूप से प्रबंधक को कोई भी वाद या रिट याचिका दायर करने का निर्णय लेने के लिए अधिकृत नहीं करता है।”

कोर्ट ने आगे कहा कि राज्य द्वारा पारित कोई भी प्रतिकूल आदेश सामूहिक रूप से प्रबंधन समिति को प्रभावित करता है। इसलिए, कानूनी सहारा लेने का निर्णय सामूहिक होना चाहिए।

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“कानूनी सहारा लेने का निर्णय लेने और उसके अनुसार कार्य करने के लिए प्रबंधक को अधिकृत करने के बीच स्पष्ट अंतर है। किसी भी परिस्थिति में, प्रबंधक प्रबंधन समिति या सोसाइटी की जनरल बॉडी के निर्णय पर सवाल नहीं उठा सकता है, जैसा भी मामला हो, या अपनी मर्जी से आगे नहीं बढ़ सकता है, क्योंकि यह सोसाइटी के उपनियमों या प्रशासन योजना के तहत प्रबंधन समिति के निर्णय के खिलाफ होगा।”

कोर्ट ने प्रतिवादी द्वारा उद्धृत समन्वय पीठ (Coordinate Bench) के निर्णयों पर भरोसा जताया, जिसमें यह पुष्टि की गई थी कि प्रबंधक प्रबंधन समिति के कार्यों को तब तक अपने हाथ में नहीं ले सकता जब तक कि उसे विशिष्ट कानूनी कार्रवाई के लिए विशेष रूप से अधिकृत नहीं किया जाता।

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13 जनवरी, 2026 के बाद के प्रस्ताव के संबंध में, कोर्ट ने कहा कि यद्यपि इसे रिकॉर्ड पर रखा गया है, लेकिन इसमें अभी भी “वर्तमान रिट याचिका दायर करने के लिए प्रबंधन समिति का निर्णय शामिल नहीं है।”

निर्णय

हाईकोर्ट ने प्रारंभिक आपत्ति को सही ठहराते हुए रिट याचिका को खारिज कर दिया क्योंकि यह सुनवाई योग्य नहीं थी। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को उचित प्रस्ताव के साथ नई याचिका दायर करने की छूट प्रदान की।

न्यायमूर्ति शमशेरी ने भविष्य के मामलों में प्रक्रियात्मक अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए हाईकोर्ट की रजिस्ट्री को भी कड़े निर्देश जारी किए। आदेश में कहा गया:

“रजिस्ट्री को यह जांचने का निर्देश दिया जाता है कि प्रबंधन समिति द्वारा दायर रिट याचिकाओं के साथ रिट याचिका दायर करने के लिए प्रबंधन समिति के प्रस्ताव की एक प्रति संलग्न होनी चाहिए और प्रबंधक को तदनुसार कार्य करने के लिए अधिकृत किया जाना चाहिए।”

रजिस्ट्रार (अनुपालन) को इस निर्देश के संबंध में आवश्यक कदम उठाने के लिए कहा गया है।

केस का विवरण:

  • केस शीर्षक: कमेटी ऑफ मैनेजमेंट श्री गांधी इंटर कॉलेज हरपुर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 2 अन्य
  • केस संख्या: रिट – ए संख्या 118 वर्ष 2026
  • पीठ: न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी
  • याचिकाकर्ता के वकील: आस्था मिश्रा, अवनीश त्रिपाठी
  • प्रतिवादी के वकील: सी.एस.सी., रमेश चंद्र द्विवेदी

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