भरण-पोषण के मामलों में पत्नी द्वारा पति की आय बढ़ा-चढ़ाकर बताना झूठी गवाही की श्रेणी में नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भरण-पोषण (maintenance) के एक मामले में अपनी पत्नी के खिलाफ झूठी गवाही (perjury) की कार्यवाही शुरू करने की मांग करने वाली पति की अपील को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि भरण-पोषण की कार्यवाहियों में यह एक “सामान्य जानकारी” (common knowledge) है कि दावेदार अक्सर पति की आय को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं, लेकिन ऐसे बयानों के आधार पर दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 340 के तहत कार्यवाही की आवश्यकता नहीं है।

यह आदेश न्यायमूर्ति राज बीर सिंह ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 380 के तहत दायर एक आपराधिक अपील पर सुनवाई करते हुए दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता (पति) ने अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय संख्या 4, प्रयागराज द्वारा 28 अक्टूबर 2025 को पारित आदेश को चुनौती दी थी। परिवार न्यायालय ने अपनी पत्नी (प्रतिवादी संख्या 2) के खिलाफ धारा 340 Cr.P.C. (पठित धारा 379 BNSS) के तहत दायर उसके आवेदन को खारिज कर दिया था।

विवाद की शुरुआत तब हुई जब पत्नी ने धारा 125 Cr.P.C. के तहत भरण-पोषण का मामला दर्ज कराया। अपने हलफनामे में पत्नी ने अपीलकर्ता की मासिक आय ₹80,000 बताई और एक अन्य स्थान पर इसे ₹1,25,000 बताया। पति का तर्क था कि उसकी वास्तविक आय केवल ₹11,000 प्रति माह है और उसकी पत्नी ने जानबूझकर गलत तथ्य पेश किए हैं।

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पक्षों के तर्क

अपीलकर्ता के वकील ने दलील दी कि पत्नी ने बिना किसी सहायक साक्ष्य के झूठा हलफनामा दायर किया है। यह प्रस्तुत किया गया कि चूंकि प्रतिवादी ने गलत बयान दिए हैं, इसलिए भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 211, 213, 222 और 232 के तहत मामला बनता है। अपीलकर्ता ने परिवार न्यायालय द्वारा जांच से इनकार करने को मनमाना और तथ्यों के विपरीत बताया।

प्रतिवादी संख्या 2 (पत्नी) के वकील ने अपील का विरोध करते हुए कहा कि अपीलकर्ता स्वयं एक अधिवक्ता है और उसने कृषि एवं किराये से होने वाली अपनी आय को छुपाया है। यह तर्क दिया गया कि पति की आय साक्ष्य का विषय है जिसे परिवार न्यायालय द्वारा तय किया जाना है और परजरी का यह आवेदन केवल अंतरिम भरण-पोषण के भुगतान से बचने के लिए “विलंब करने की रणनीति” मात्र है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने धारा 340 Cr.P.C. और धारा 195(1)(b) Cr.P.C. के प्रावधानों का परीक्षण किया। हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि जांच तभी की जानी चाहिए जब वह “न्याय के हित में समीचीन” (expedient in the interest of justice) हो।

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सुप्रीम कोर्ट के छाजू राम बनाम राधे श्याम और अन्य (AIR 1971 SC 1367) मामले का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:

“झूठी गवाही (perjury) के लिए मुकदमा केवल उन्हीं मामलों में चलाया जाना चाहिए जहां यह जानबूझकर और सचेत रूप से किया गया प्रतीत होता है और दोषसिद्धि की संभावना अधिक हो… मुकदमा तब आदेशित किया जाना चाहिए जब दोषी को दंडित करना न्याय के हित में समीचीन समझा जाए, न कि केवल इसलिए कि बयान में कोई ऐसी अशुद्धि है जो निर्दोष या महत्वहीन हो सकती है।”

इसके अलावा, हाईकोर्ट ने जसविंदर सिंह बनाम श्रीमती परमजीत कौर (1985) मामले का हवाला देते हुए टिप्पणी की कि अदालतों को कभी भी निजी प्रतिशोध (private vendetta) को संतुष्ट करने या एक पक्ष के इशारे पर दूसरे को दंडित करने का जरिया नहीं बनना चाहिए।

भरण-पोषण के विवादों की विशिष्ट प्रकृति पर हाईकोर्ट ने कहा:

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“यह सामान्य जानकारी है कि धारा 125 Cr.P.C. जैसी कार्यवाहियों में, आमतौर पर दावेदार / पत्नी भरण-पोषण का दावा करने के लिए अपने पति की आय को बढ़ा-चढ़ाकर बताती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि पत्नी के ऐसे बयान पर धारा 340 Cr.P.C. के तहत कार्रवाई की आवश्यकता है।”

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति की आय के संबंध में पत्नी के दावों की सत्यता अभी भी साक्ष्य का विषय है, जिसे परिवार न्यायालय द्वारा तय किया जाना बाकी है।

निर्णय

हाईकोर्ट को परिवार न्यायालय के निर्णय में कोई भौतिक अवैधता या दोष नहीं मिला। हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि इस मामले में झूठी गवाही की शिकायत दर्ज करना “न्याय के हित में समीचीन” नहीं था। हाईकोर्ट ने अपील को गुणदोष के आधार पर खारिज कर दिया।

केस विवरण:

  • केस का नाम: शिव कांत दुबे बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
  • केस संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 72 ऑफ 2026
  • पीठ: न्यायमूर्ति राज बीर सिंह
  • दिनांक: 13 मार्च, 2026

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