मैनपुरी कस्टोडियल डेथ: इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, गायब सबूतों को ढूंढने के लिए CBI को दिया 60 दिन का समय; बताया ‘संस्थागत विफलता’

उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले में करीब 17 साल पहले हुई एक दिव्यांग युवक की संदिग्ध हिरासत में मौत (कस्टोडियल डेथ) के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने इस मामले में महत्वपूर्ण वीडियो और फोटो साक्ष्यों के गायब होने को “संस्थागत विफलता” (Institutional Failure) करार देते हुए देश की शीर्ष जांच एजेंसी सीबीआई (CBI) को इन्हें हर हाल में बरामद करने का आदेश दिया है।

हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सीबीआई की गाजियाबाद स्थित भ्रष्टाचार निरोधक शाखा को निर्देश दिया है कि वह लापता वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी साक्ष्यों को अगले 60 दिनों के भीतर सुरक्षित करे और उन्हें अदालत के समक्ष पेश करे।

यह गंभीर मामला 9 मई 2009 का है। मैनपुरी जिले के दन्नाहार थाने के लॉकअप के शौचालय (यूरिनल) वाले हिस्से में 40 प्रतिशत दिव्यांगता से पीड़ित नहर सिंह का शव फंदे से लटका हुआ पाया गया था।

घटना के तुरंत बाद स्थानीय पुलिस ने दावा किया था कि नहर सिंह ने अपनी बेल्ट का इस्तेमाल कर खुदकुशी कर ली है।

हालांकि, इस थ्योरी पर शुरुआत से ही सवाल उठ रहे थे। साल 2010 में महिलाओं और हाशिए के समुदायों के अधिकारों के लिए काम करने वाले गैर-सरकारी संगठन ‘एसोसिएशन फॉर एडवोकेसी एंड लीगल इनिशिएटिव्स’ (AALI) ने मामले की निष्पक्ष जांच की मांग को लेकर हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की। याचिका में आरोप लगाया गया कि यह आत्महत्या नहीं, बल्कि हिरासत में दी गई यातना और हत्या का मामला है।

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अदालती सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता संगठन की ओर से पेश हुए अधिवक्ता अंकुर शर्मा ने जोरदार ढंग से अपनी बात रखी। उन्होंने दलील दी कि दोषी पुलिसकर्मियों को बचाने के इरादे से मामले के बेहद महत्वपूर्ण सबूतों को जानबूझकर छिपाया जा रहा है। इसके साथ ही उन्होंने अदालत का ध्यान उत्तर प्रदेश में हिरासत में होने वाली मौतों के बढ़ते मामलों की तरफ भी खींचा और इस पर कड़े न्यायिक नियंत्रण और जवाबदेही की आवश्यकता पर बल दिया।

दूसरी तरफ, यह जनहित याचिका पिछले 16 वर्षों से हाईकोर्ट में लंबित है, लेकिन इसके बावजूद राज्य प्रशासन और पुलिस विभाग अब तक पोस्टमार्टम की वीडियोग्राफी और घटनास्थल की तस्वीरें अदालत के समक्ष प्रस्तुत करने में पूरी तरह नाकाम रहे हैं।

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जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने डेढ़ दशक से भी अधिक समय बीत जाने के बाद भी बुनियादी साक्ष्यों को पेश न कर पाने पर राज्य सरकार और प्रशासनिक तंत्र के प्रति गहरी नाराजगी व्यक्त की।

हाईकोर्ट ने पुलिस की आत्महत्या वाली कहानी पर गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि पुलिस लॉकअप कोई ऐसी जगह नहीं होती जहां किसी की नजर न पड़े। खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा:

“यह मामला पूरी तरह से संस्थागत विफलताओं को उजागर करता है। यह जनहित याचिका साल 2010 में दायर की गई थी और आज भी लंबित है। सोलह साल बीत जाने के बाद भी घटनास्थल और पोस्टमार्टम की वीडियोग्राफी व तस्वीरें इस न्यायालय को उपलब्ध नहीं कराई जा रही हैं, ताकि कोर्ट इस मामले में आगे बढ़ सके।”

इसके साथ ही जजों ने पूछा कि जब लॉकअप लगातार निगरानी में रहता है और वहां पुलिस की चौबीसों घंटे आवाजाही होती है, तो यह कैसे मुमकिन है कि किसी ने मृत युवक को फंदे से लटकते हुए नहीं देखा? इस बात ने पुलिस के दावों पर गहरे संदेह पैदा किए हैं।

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मामले के संवेदनशील साक्ष्यों के गायब होने को अत्यंत गंभीरता से लेते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्थानीय जांच एजेंसियों को दरकिनार कर यह जिम्मेदारी केंद्रीय एजेंसी को सौंप दी है।

अदालत ने सीबीआई की एंटी-करप्शन यूनिट (गाजियाबाद) को निर्देश दिया है कि वह घटनास्थल और पोस्टमार्टम दोनों से जुड़े सभी गायब फोटो और वीडियो फुटेज को 60 दिनों की समय सीमा के भीतर खोजकर अपने कब्जे में ले। सीबीआई को इन साक्ष्यों को अगली सुनवाई में पेश करना होगा।

हाईकोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 10 अगस्त 2026 की तारीख तय की है।

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