गुजरात हाईकोर्ट ने साल 2008 में अहमदाबाद में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के मामले में मंगलवार को एक बड़ा फैसला सुनाया। अदालत ने विशेष अदालत के उस फैसले की पुष्टि की है, जिसमें 38 दोषियों को मौत की सजा और 11 अन्य को उम्रकैद दी गई थी। जस्टिस ए.वाई. कोग्जे और जस्टिस एस.जे. दवे की पीठ ने दोषियों की ओर से दायर सभी अपीलों को खारिज कर दिया। इस भीषण आतंकी हमले में 56 लोगों की मौत हो गई थी और 246 लोग घायल हुए थे।
हाईकोर्ट विशेष अदालत के 8 फरवरी 2022 के उस विस्तृत फैसले के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था, जो 7,015 पन्नों का था। इसके साथ ही अदालत ने राज्य सरकार की उस याचिका पर भी विचार किया जिसमें दोषियों की मौत की सजा की पुष्टि करने की मांग की गई थी।
पीड़ितों के लिए मुआवजे का निर्देश
अपने फैसले में हाईकोर्ट ने गुजरात सरकार को आदेश दिया कि वह इस त्रासदी के पीड़ितों और उनके परिवारों को वित्तीय सहायता प्रदान करे। अदालती आदेश के अनुसार, सरकार मृतकों के परिवारों को 10-10 लाख रुपये, गंभीर रूप से घायल लोगों को 5-5 लाख रुपये और मामूली रूप से घायलों को 1-1 लाख रुपये का मुआवजा देगी। सरकार को इस पूरी भुगतान प्रक्रिया को पूरा करने के लिए 31 मार्च 2027 तक का समय दिया गया है।
अस्पतालों को निशाना बनाने वाला देश का पहला हमला
अहमदाबाद में 26 जुलाई 2008 को कई व्यस्त इलाकों में सिलसिलेवार बम धमाके हुए थे। इसके ठीक दो दिन बाद सूरत शहर में भी कई जिंदा बम बरामद हुए थे, जिन्हें समय रहते निष्क्रिय कर दिया गया था। यह भारत का पहला ऐसा आतंकी हमला माना जाता है जिसमें साजिशकर्ताओं ने अस्पतालों को जानबूझकर निशाना बनाया था। जांच एजेंसियों के अनुसार, धमाकों के बाद भेजे गए ई-मेल में आतंकियों ने दावा किया था कि यह हमला साल 2002 में गोधरा कांड के बाद भड़की गुजरात हिंसा का बदला लेने के लिए किया गया था।
मुकदमे का लंबा सफर और रिकॉर्ड गवाहियां
इस बड़ी आतंकी साजिश के आरोपियों पर मुकदमा चलाने के लिए कुल 35 अलग-अलग मामलों को आपस में जोड़ दिया गया था। इनमें अहमदाबाद में दर्ज की गई 20 एफआईआर और सूरत की 15 एफआईआर शामिल थीं, जहां प्लांट किए गए बम फटे नहीं थे। यह मुकदमा भारतीय कानूनी इतिहास के सबसे बड़े और लंबे समय तक चलने वाले मुकदमों में से एक बन गया। इस पूरी सुनवाई के दौरान नौ अलग-अलग जजों ने मामले को सुना। अभियोजन पक्ष ने कोर्ट के सामने कुल 1,163 गवाहों के बयान दर्ज कराए। गवाहों की सुरक्षा को देखते हुए अदालत ने 26 प्रमुख गवाहों की पहचान को पूरी तरह गुप्त रखा था।
सिमी और इंडियन मुजाहिदीन का कनेक्शन
इस मामले में कुल 49 लोगों को गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए), भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), विस्फोटक पदार्थ अधिनियम और सार्वजनिक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम के तहत दोषी ठहराया गया है। इन सभी पर हत्या, हत्या का प्रयास, आपराधिक साजिश, देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने की कोशिश, देशद्रोह और आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप साबित हुए हैं।
दोषियों में प्रतिबंधित संगठन ‘स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया’ (सिमी) का पूर्व नेता सफदर नागौरी और गुजरात, मध्य प्रदेश, केरल व उत्तर प्रदेश सहित देश के 11 राज्यों के उसके सहयोगी शामिल हैं। पुलिस जांच में यह बात सामने आई थी कि इन आरोपियों ने मिलकर ‘इंडियन मुजाहिदीन’ नाम से एक नया संगठन तैयार किया था।
विशेष अदालत का फैसला और बरी हुए आरोपी
अहमदाबाद पुलिस की क्राइम ब्रांच ने इस आतंकी साजिश के सिलसिले में शुरुआत में 100 से अधिक लोगों को आरोपी बनाया था, जिनमें से आखिरकार 78 लोगों पर मुकदमा चलाया गया। फरवरी 2022 में विशेष ट्रायल कोर्ट ने इनमें से 49 आरोपियों को दोषी करार दिया था और सबूतों के अभाव में 28 लोगों को बरी कर दिया था।
बरी होने वाले आरोपियों में मुबीन शेख और मंसूर पीरभॉय भी शामिल थे, जिन पर आतंकी साजिश रचने और धमकी भरे ई-मेल भेजकर धमाकों की जिम्मेदारी लेने का आरोप लगाया गया था। इसके अलावा, ट्रायल कोर्ट ने एक ऐसे सरकारी गवाह को पूरी तरह माफ कर दिया था जो सरकारी गवाह बना रहा, जबकि अपने बयानों से मुकर जाने वाले चार अन्य सरकारी गवाहों को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी।

