सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि चकबंदी प्रक्रिया के दौरान सड़क किनारे स्थित व्यावसायिक महत्व की जमीन को उसके मूल भूमिधरों से लेकर ऐसे व्यक्तियों को मनमाने ढंग से आवंटित नहीं किया जा सकता, जिनका उस जमीन पर कोई अधिकार नहीं है।
जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले से जुड़े भूमि विवाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए आवंटन प्राप्त करने वाले व्यक्तियों की अपील खारिज कर दी।
हाईकोर्ट ने चकबंदी के दौरान दूसरे व्यक्तियों को आवंटित की गई सड़क किनारे की जमीन मूल भूमिधरों को वापस देने का आदेश दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ताओं को विवादित जमीन पर कोई प्राथमिक अधिकार नहीं था और उनके पक्ष में किए गए आवंटन का कोई वैध आधार भी सामने नहीं आया।
बस्ती में सड़क किनारे की जमीन को लेकर विवाद
मामला बस्ती जिले की हर्रैया तहसील के बरहपुर पांडेय गांव में स्थित गाटा संख्या 159 से संबंधित है।
गांव में उत्तर प्रदेश जोत चकबंदी अधिनियम, 1953 के तहत 12 अक्टूबर 1973 को चकबंदी प्रक्रिया शुरू हुई थी।
वर्ष 1978 की प्रस्तावित चकबंदी योजना में सहायक चकबंदी अधिकारी ने विवादित जमीन के कुछ हिस्से अपीलकर्ताओं को आवंटित कर दिए।
इसके बाद 28 अप्रैल 1982 को उन्हें जमीन का कब्जा भी सौंप दिया गया।
मूल भूमिधरों ने इस आवंटन का विरोध करते हुए कहा कि उन्हें सड़क किनारे स्थित अपनी जमीन से वंचित कर दिया गया।
वर्ष 1986 में सहायक चकबंदी निदेशक ने पाया कि अधिक व्यावसायिक मूल्य वाली सड़क किनारे की जमीन का मनमाने तरीके से आवंटन हुआ था।
उन्होंने नए सिरे से चकों के निर्धारण के लिए मामला वापस भेज दिया।
स्थल निरीक्षण के बाद चकबंदी बंदोबस्त अधिकारी ने आवंटन रद्द किया
मामला वापस भेजे जाने के बाद चकबंदी अधिकारी ने फिर से विवादित जमीन अपीलकर्ताओं को आवंटित कर दी।
इसके खिलाफ कार्यवाही में चकबंदी बंदोबस्त अधिकारी (SOC) ने मौके का निरीक्षण किया और पाया कि विवादित जमीन मुख्य सड़क से लगी हुई है।
इस आधार पर उन्होंने 18 सितंबर 1992 को आवंटन रद्द कर दिया।
हालांकि, 31 दिसंबर 1992 को उप संचालक चकबंदी (DDC) ने चकबंदी बंदोबस्त अधिकारी का आदेश पलट दिया।
मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा, जिसने उप संचालक चकबंदी का आदेश रद्द कर दिया।
हाईकोर्ट ने कहा कि वर्ष 1981 और 1988 के परिपत्रों के अनुसार सड़क किनारे स्थित व्यावसायिक महत्व की जमीन को चकबंदी में शामिल नहीं किया जाना चाहिए।
यदि ऐसी जमीन चकबंदी में शामिल की जाती है, तो उसे मूल भूमिधरों को ही आवंटित किया जाना चाहिए।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि चकबंदी का उद्देश्य मूल भूमिधरों को उनकी महत्वपूर्ण जमीन से हटाकर उसे बाहरी व्यक्तियों को देना नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट में दोनों पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता पुनीत विनय ने दलील दी कि मूल भूमिधरों ने आवंटन के लगभग चार वर्ष बाद आपत्ति दर्ज कराई थी।
उन्होंने कहा कि वर्ष 1988 का परिपत्र इस मामले में लागू नहीं होता। साथ ही मूल भूमिधरों को विवादित भूखंड के बगल में जमीन आवंटित की गई थी।
प्रतिवादियों की ओर से अधिवक्ता प्रदीप कुमार यादव ने तर्क दिया कि चकबंदी प्रक्रिया उस समय लागू परिपत्रों के विपरीत थी।
उन्होंने कहा कि सड़क किनारे की जमीन को चकबंदी में शामिल ही नहीं किया जाना चाहिए था।
उनके अनुसार, चकबंदी बंदोबस्त अधिकारी के स्थल निरीक्षण से स्पष्ट था कि जमीन को चकबंदी में शामिल करना प्रथम दृष्टया अवैध था।
बिना अधिकार वाले व्यक्तियों को जमीन आवंटित करने का कोई वैध कारण नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि यह निर्विवाद था कि अपीलकर्ताओं का विवादित जमीन पर कोई अधिकार नहीं था, जबकि प्रतिवादी उसके मूल भूमिधर थे।
बेंच ने कहा:
“विवादित जमीन को चकबंदी में शामिल करना और उसे ऐसे अपीलकर्ताओं को आवंटित करना, जिनका उस पर कोई प्राथमिक अधिकार नहीं है, किसी भी वैध कारण से समर्थित नहीं है।”
कोर्ट ने चकबंदी बंदोबस्त अधिकारी के स्थल निरीक्षण को महत्वपूर्ण माना, जिसमें पुष्टि हुई थी कि जमीन मुख्य सड़क से लगी हुई है।
बेंच ने उप संचालक चकबंदी के आदेश में खामियां पाते हुए कहा:
“उप संचालक चकबंदी ने चकबंदी बंदोबस्त अधिकारी का आदेश रद्द करने के लिए यांत्रिक ढंग से कारण दर्ज किए।”
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने उप संचालक चकबंदी के गलत दृष्टिकोण की जांच करते हुए अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर फैसला दिया था।
बेंच ने टिप्पणी की:
“हाईकोर्ट ने अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर रहते हुए उप संचालक चकबंदी के त्रुटिपूर्ण दृष्टिकोण पर निष्कर्ष दर्ज किए हैं।”
सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज की
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं है।
बेंच ने अपील खारिज करते हुए सड़क किनारे की विवादित जमीन मूल भूमिधरों को वापस देने संबंधी हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रखा।
कोर्ट ने मुकदमे के खर्च के संबंध में कोई आदेश नहीं दिया।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: Rama Pandey and Others v. Ram Lal (Dead) Through LR. and Others
केस नंबर: Civil Appeal arising out of S.L.P. (C) No. 15053 of 2017
पीठ: जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस एन.वी. अंजारिया
फैसले की तारीख: 5 नवंबर 2026
