सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश 7 नियम 11 के तहत किसी वादपत्र को मुकदमे के औपचारिक पंजीकरण से पहले भी खारिज किया जा सकता है। हालांकि, केवल इस आशंका के आधार पर वादपत्र खारिज नहीं किया जा सकता कि मुकदमा ट्रायल के बाद असफल हो सकता है।
जस्टिस उज्जल भुयान और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की बेंच ने 5 नवंबर 2026 को दिए फैसले में यह भी निर्देश दिया कि पंजीकरण से पहले खारिज किए जाने वाले प्रत्येक वादपत्र का रिकॉर्ड एक रजिस्टर में दर्ज किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के कुड्डालोर के प्रधान जिला न्यायाधीश द्वारा वादपत्र खारिज करने और उस आदेश को बरकरार रखने वाले मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया। कोर्ट ने वादपत्र बहाल करते हुए उसका पंजीकरण करने और मुकदमे का ट्रायल चलाने का निर्देश दिया।
पंजीकरण से पहले भी वादपत्र खारिज करने की शक्ति
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एक प्रमुख सवाल था कि क्या ट्रायल कोर्ट किसी मुकदमे का औपचारिक पंजीकरण होने से पहले आदेश 7 नियम 11 CPC के तहत वादपत्र खारिज कर सकता है।
बेंच ने कहा कि इस प्रावधान के तहत अदालत की शक्ति केवल मुकदमा पंजीकृत होने के बाद तक सीमित नहीं है।
कोर्ट ने T. Arivandandam v. T.V. Satyapal, Saleem Bhai v. State of Maharashtra, Madiraju Venkata Ramana Raju v. Peddireddigari Ramachandra Reddy और Church of Christ Charitable Trust v. Ponniamman Educational Trust के फैसलों का उल्लेख किया।
बेंच ने स्पष्ट किया:
“वादपत्र का औपचारिक पंजीकरण अपने आप में उसे ऐसा अभेद्य संरक्षण नहीं देता कि उसकी पोषणीयता पर सवाल नहीं उठाया जा सके, क्योंकि संहिता के आदेश 7 नियम 11 के तहत किसी भी चरण में उसकी पोषणीयता को चुनौती दी जा सकती है।”
हालांकि, कोर्ट ने कहा कि इस शक्ति का इस्तेमाल करते समय वादपत्र में किए गए सभी महत्वपूर्ण कथनों को समग्र रूप से पढ़ना आवश्यक है।
25 लाख रुपये के कर्ज और जमीन की बिक्री से जुड़ा विवाद
मामला जी. पझनिवेल और एस. थिलगावती के बीच संपत्ति के स्वामित्व से संबंधित है।
वादी जी. पझनिवेल ने दावा किया कि उनके बेटे ने 26 फरवरी 2021 को पंजीकृत सेटलमेंट डीड के माध्यम से उन्हें एक जमीन दी थी।
वादपत्र के अनुसार, उन्होंने प्रतिवादी के पति से 25 लाख रुपये का कर्ज 24 प्रतिशत मासिक ब्याज पर लिया था।
वादी का कहना था कि कर्जदाता के आग्रह पर उन्होंने 15 मार्च 2021 को प्रतिवादी के नाम बिक्री विलेख निष्पादित किया।
हालांकि, उनका दावा था कि यह बिक्री विलेख वास्तव में कर्ज की सुरक्षा के लिए बनाया गया था और जमीन पर उनका कब्जा बना रहा।
वादी के अनुसार, जब उन्होंने ब्याज सहित कर्ज चुकाने की पेशकश की, तो प्रतिवादी ने संपत्ति वापस हस्तांतरित करने से परहेज किया।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि 25 मई 2025 को प्रतिवादी ने जमीन पर जबरन कब्जा करने का प्रयास किया।
इसके बाद वादी ने स्वामित्व की घोषणा, बिक्री विलेख के रूप में दर्शाए गए बंधक के मोचन, संपत्ति के पुनः हस्तांतरण और स्थायी निषेधाज्ञा की मांग करते हुए मुकदमा दाखिल किया।
ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट ने वादपत्र खारिज किया था
मुकदमे का पंजीकरण होने से पहले ही ट्रायल कोर्ट ने वादपत्र खारिज कर दिया।
ट्रायल कोर्ट ने कहा कि बिक्री विलेख में संपत्ति दोबारा बेचने की कोई शर्त नहीं थी और वादी ने पुनर्विक्रय से संबंधित कोई समझौता भी पेश नहीं किया था।
मद्रास हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने इस आदेश को बरकरार रखते हुए माना कि वादपत्र से वाद का कोई कारण प्रकट नहीं होता।
इसके खिलाफ वादी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
दोनों पक्षों की दलीलें
वादी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शोएब आलम ने दलील दी कि मुकदमे के पंजीकरण से पहले आदेश 7 नियम 11 लागू नहीं किया जा सकता।
उन्होंने कहा कि वादपत्र को पूरा पढ़ने पर मुकदमा दाखिल करने का स्पष्ट कारण सामने आता है।
अपने तर्क के समर्थन में उन्होंने मद्रास हाईकोर्ट के Selvaraj v. Koodankulam Nuclear Power Plant India Limited और Government of Tamil Nadu v. Ponnusamy तथा सुप्रीम कोर्ट के Alka Gupta v. Narender Kumar Gupta फैसलों का उल्लेख किया।
प्रतिवादी की ओर से अधिवक्ता जी. इंदिरा ने कहा कि पंजीकृत बिक्री विलेख से संपत्ति की पूर्ण बिक्री साबित होती है और उसे वापस हस्तांतरित करने की मंशा दर्शाने वाली कोई सामग्री नहीं है।
उन्होंने तर्क दिया कि आदेश 7 नियम 11 के तहत शक्ति का इस्तेमाल किसी भी चरण में किया जा सकता है। इसलिए पंजीकरण से पहले वादपत्र खारिज करना वैध था।
मुकदमा हारने की संभावना वादपत्र खारिज करने का आधार नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने यह स्पष्ट नहीं किया था कि आदेश 7 नियम 11 के किस खंड के तहत वादपत्र खारिज किया जा रहा है।
बेंच ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने वादी द्वारा मांगी गई अन्य राहतों को नजरअंदाज किया और पूरे मुकदमे को केवल बंधक के मोचन से संबंधित मान लिया।
कोर्ट ने कहा:
“ट्रायल कोर्ट के लिए वादपत्र में किए गए महत्वपूर्ण कथनों को नजरअंदाज करना स्वीकार्य नहीं था और न ही वह वादपत्र को समग्र रूप से पढ़ने से इनकार कर सकता था।”
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि हाईकोर्ट ने वादी की उस विशेष दलील पर विचार नहीं किया कि उसे पहले अपने दावे के समर्थन में साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाना चाहिए।
बेंच ने स्पष्ट किया:
“ट्रायल के बाद मुकदमा खारिज होने की संभावना, ट्रायल से पहले वादपत्र खारिज करने का आधार नहीं बन सकती।”
कोर्ट ने आगे कहा:
“यदि वादपत्र से वाद का कारण प्रकट होता है, जैसा कि वर्तमान मामले में होता है, और वादपत्र में किए गए कथनों के आधार पर मुकदमा किसी कानून से प्रतिबंधित नहीं दिखाई देता, तो उसका ट्रायल होना चाहिए।”
इस संबंध में बेंच ने Ganga Bai v. Vijay Kumar के फैसले पर भरोसा किया।
पंजीकरण से पहले खारिज वादपत्रों का रिकॉर्ड रखना अनिवार्य
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मुकदमे के पंजीकरण से पहले वादपत्र खारिज किए जाने की घटनाएं रिकॉर्ड से बाहर नहीं रहनी चाहिए।
बेंच ने स्पष्ट किया:
“वादपत्र की अस्वीकृति का स्वरूप संहिता की धारा 2(2) में परिभाषित ‘डिक्री’ का होता है।”
कोर्ट ने कहा कि ऐसे आदेशों का रिकॉर्ड होने से उनके खिलाफ अपील की स्थिति में सहायता मिलेगी।
इसके अतिरिक्त, यदि वादी आदेश 7 नियम 13 के तहत नया मुकदमा दाखिल करता है, तो प्रतिवादी को पहले वादपत्र खारिज होने की जानकारी मिल सकेगी।
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि पंजीकरण से पहले खारिज किए जाने वाले प्रत्येक वादपत्र को CPC के आदेश 4 नियम 2 के तहत रखे जाने वाले रजिस्टर में दर्ज किया जाए।
जहां सिविल मैनुअल या लागू नियमों में ऐसी व्यवस्था नहीं है, वहां हाईकोर्ट CPC की धारा 122 के तहत आवश्यक कदम उठा सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने वादपत्र बहाल किया
सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट और मद्रास हाईकोर्ट के आदेश रद्द कर दिए।
बेंच ने वादपत्र को पंजीकरण और ट्रायल के लिए बहाल कर दिया। अपील बिना किसी लागत के स्वीकार की गई।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसके फैसले में की गई टिप्पणियों को मूल संपत्ति विवाद के गुण-दोष पर राय नहीं माना जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने फैसले की प्रतियां सभी हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल और राज्य न्यायिक अकादमियों के निदेशकों को भेजने का भी निर्देश दिया।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: G. Pazhanivel v. S. Thilagavathy
केस नंबर: Civil Appeal No. 13154 of 2026
पीठ: जस्टिस उज्जल भुयान और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर
फैसले की तारीख: 5 नवंबर 2026
