सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को स्पष्ट किया कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों में अनिवार्य रोटेशन की व्यवस्था लागू करने का निर्णय संसद को लेना है। अदालत कानून में ऐसी व्यवस्था जोड़ने का निर्देश नहीं दे सकती।
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने इस संबंध में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने परिसीमन अधिनियम, 2002 की धारा 9(1)(c) की वैधता बरकरार रखी। इस प्रावधान के तहत उन क्षेत्रों में SC/ST के लिए सीटें आरक्षित की जाती हैं, जहां इन समुदायों की आबादी का अनुपात तुलनात्मक रूप से अधिक है।
पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 तथा परिसीमन अधिनियम में आरक्षित सीटों को निश्चित अंतराल पर बदलने की कोई अनिवार्य व्यवस्था नहीं है। ऐसे में न्यायपालिका अपनी ओर से रोटेशन का प्रावधान लागू नहीं कर सकती।
करीब 70 वर्षों से आरक्षित सीट को लेकर विवाद
यह मामला उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले की 191-कादीपुर विधानसभा सीट से जुड़ा है। इस क्षेत्र के मतदाता जगदीश सिंह ने याचिका दायर कर बताया कि यह सीट करीब सात दशकों से अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित है।
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि आरक्षित सीटों में रोटेशन नहीं होने से संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 19 के तहत मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है। उनके अनुसार, मौजूदा व्यवस्था में मतदाताओं के पास केवल SC समुदाय के उम्मीदवारों में से प्रतिनिधि चुनने का विकल्प रहता है।
उन्होंने यह भी दावा किया कि लंबे समय तक एक ही सीट आरक्षित रहने का लाभ पूरे समुदाय के बजाय कुछ परिवारों तक सीमित हो जाता है।
याचिका में पंचायतों और नगर निकायों के लिए संविधान के अनुच्छेद 243D और 243T के तहत लागू रोटेशन व्यवस्था की तरह लोकसभा और विधानसभा की आरक्षित सीटों में भी बदलाव की मांग की गई थी।
जाति के आधार पर मतदान की धारणा पर कोर्ट ने उठाए सवाल
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता की इस दलील पर सवाल उठाया कि अधिक SC/ST आबादी वाले क्षेत्रों में सीटें आरक्षित करने से जातिगत विभाजन मजबूत होता है।
पीठ ने कहा कि बहुदलीय लोकतंत्र में विभिन्न राजनीतिक दल अलग-अलग विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। मतदाताओं से अपेक्षा की जाती है कि वे उम्मीदवार की जाति या धर्म के बजाय राजनीतिक विचारधारा के आधार पर मतदान करें।
कोर्ट के अनुसार, मतदाता किसी राजनीतिक विचारधारा का समर्थन या विरोध कर सकता है और उस विचारधारा का प्रतिनिधित्व करने वाले व्यक्ति की पहचान निर्णायक नहीं होती।
पीठ ने इस धारणा को भी सही नहीं माना कि किसी क्षेत्र में बहुसंख्यक समुदाय के मतदाता अनिवार्य रूप से जाति के आधार पर ही मतदान करेंगे।
अदालत ने कहा कि मतदाता किस आधार पर अपना प्रतिनिधि चुनेंगे, यह उनका लोकतांत्रिक निर्णय है। हाईकोर्ट ऐसे चुनावी व्यवहार के बारे में न्यायिक निष्कर्ष नहीं दे सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने मतदान के अधिकार और किसी विशेष निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ने के कथित अधिकार के बीच भी अंतर स्पष्ट किया। पीठ ने कहा कि सामान्य वर्ग के उम्मीदवार अनारक्षित सीटों से चुनाव लड़ने के लिए स्वतंत्र हैं।
‘आप गलत नंबर डायल कर रहे हैं’: सुप्रीम कोर्ट
जब याचिकाकर्ता ने रोटेशन व्यवस्था लागू कराने के लिए न्यायिक हस्तक्षेप की मांग दोहराई, तो पीठ ने टिप्पणी की कि वह गलत जगह अपनी मांग रख रहे हैं।
कोर्ट ने कहा, “आप गलत नंबर डायल कर रहे हैं।”
पीठ ने सुझाव दिया कि याचिकाकर्ता को इस मुद्दे पर निर्वाचित जनप्रतिनिधियों से संपर्क करना चाहिए और कानून में बदलाव के लिए राजनीतिक सहमति बनाने का प्रयास करना चाहिए।
सुनवाई के दौरान हल्के अंदाज में कोर्ट ने विरोध प्रदर्शनों और नारेबाजी का भी उल्लेख किया। पीठ ने कहा कि यह मांग भी विरोध प्रदर्शन का एक मुद्दा बन सकती है।
याचिकाकर्ता ने बताया कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी आरक्षित सीटों में रोटेशन को आदर्श व्यवस्था माना था, लेकिन न्यायिक सीमाओं को देखते हुए कोई निर्देश जारी नहीं किया।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रोटेशन व्यवस्था कितनी उचित होगी और मौजूदा आरक्षण प्रणाली का जातिगत संबंधों पर क्या प्रभाव पड़ता है, जैसे विषयों पर विचार करना विधायिका का काम है।
पीठ ने कहा कि केवल इस आधार पर कि मौजूदा व्यवस्था कथित तौर पर जातिगत विभाजन को बढ़ावा देती है, संबंधित कानूनी प्रावधान को असंवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला बरकरार
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आरक्षित सीटों में रोटेशन लागू करने का निर्देश देने से सही तरीके से इनकार किया था, क्योंकि यह विषय संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है।
पीठ ने स्पष्ट किया कि जब संविधान और संबंधित कानून में रोटेशन का प्रावधान नहीं है, तो अदालत अपने आदेश से ऐसी व्यवस्था लागू नहीं कर सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं पाया।
हालांकि, अदालत ने याचिकाकर्ता को जनप्रतिनिधियों से संपर्क कर रोटेशन के सिद्धांत पर सहमति बनाने की स्वतंत्रता दी।
याचिकाकर्ता ने अपनी मांग के समर्थन में परिसीमन आयोग द्वारा 2008 में की गई आरक्षण प्रक्रिया का भी हवाला दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि मौजूदा कानूनी व्यवस्था में कोई बदलाव विधायी प्रक्रिया के जरिए ही किया जा सकता है।
