सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि भारत में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह करने वाला व्यक्ति ब्रिटेन की अदालत से वैवाहिक संबंध पूरी तरह टूटने (Irretrievable Breakdown of Marriage) के आधार पर तलाक लेकर द्विविवाह (Bigamy) के आपराधिक मुकदमे से नहीं बच सकता। हिंदू विवाह अधिनियम में तलाक का यह आधार वैधानिक रूप से मान्यता प्राप्त नहीं है।
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की बेंच ने डॉ. एन. श्रीधर रेड्डी के खिलाफ द्विविवाह की आपराधिक कार्यवाही जारी रखने का आदेश दिया। हालांकि, कोर्ट ने उनके माता-पिता और दूसरी पत्नी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विदेशी अदालत का तलाक आदेश भारत में लागू वैवाहिक कानून के विपरीत होने पर उसे स्वतः मान्यता नहीं दी जा सकती।
भारतीय कानून के विपरीत विदेशी तलाक आदेश मान्य नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 13 और Y. Narasimha Rao v. Y. Venkata Lakshmi के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि विदेशी अदालत के निर्णय को भारत में मान्यता देने के लिए संबंधित कानूनी शर्तों का पालन आवश्यक है।
बेंच ने कहा:
“हमारे विचार में विदेशी तलाक की डिक्री भारत में लागू वैवाहिक कानून का उल्लंघन करते हुए और ऐसे आधार पर पारित की गई थी, जिसे कानून में वैधानिक मान्यता भी प्राप्त नहीं है।”
कोर्ट ने अपने हालिया फैसले Kishorekumar Mohan Kale v. Kashmira Kale का भी उल्लेख किया।
बेंच ने पाया कि पहली पत्नी ने ब्रिटेन की अदालत के अधिकार क्षेत्र पर आपत्ति जताई थी। इसके बाद कार्यवाही में उसकी भागीदारी को इस स्तर पर विदेशी अदालत के अधिकार क्षेत्र की बिना शर्त स्वीकृति नहीं माना जा सकता।
भारत में हुई थी पहली शादी, ब्रिटेन में लिया तलाक
डॉ. एन. श्रीधर रेड्डी ने 18 अप्रैल 2003 को आंध्र प्रदेश के सत्तेनपल्ली में एन. गीता प्रशांति से हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह किया था।
वर्ष 2005 में पति ब्रिटेन चले गए और 2006 में पत्नी भी उनके साथ रहने पहुंची। वर्ष 2007 में बेटे के जन्म के लिए पत्नी भारत लौट आई।
वैवाहिक संबंधों में विवाद होने के बाद पति ने गुंटूर जिले की अदालत में तलाक की याचिका दाखिल की, जिसे खारिज कर दिया गया।
इसके खिलाफ उन्होंने हाईकोर्ट में अपील की, लेकिन बाद में उसे वापस ले लिया। इस कारण दोनों का विवाह कानूनी रूप से बना रहा।
फरवरी 2013 में ब्रिटेन की नागरिकता प्राप्त करने के बाद पति ने कैम्ब्रिज काउंटी कोर्ट में तलाक की कार्यवाही शुरू की।
पत्नी ने उस अदालत के अधिकार क्षेत्र पर आपत्ति जताई।
इसके बावजूद 29 जनवरी 2014 को वैवाहिक संबंध पूरी तरह टूटने के आधार पर तलाक की डिक्री अंतिम हो गई।
इसके बाद 3 मार्च 2014 को श्रीधर रेड्डी ने ब्रिटेन के नॉरफॉक में गीता इंटुरी से दूसरी शादी कर ली।
पहली पत्नी ने दर्ज कराई द्विविवाह की शिकायत
वर्ष 2016 में पहली पत्नी ने IPC की धारा 494 और 120B के साथ धारा 34 के तहत आपराधिक शिकायत दर्ज कराई।
पुलिस ने आरोपपत्र से दूसरी पत्नी का नाम हटा दिया था, लेकिन मजिस्ट्रेट ने उसके खिलाफ भी संज्ञान ले लिया।
आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने आपराधिक कार्यवाही रद्द करने से इनकार कर दिया, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
नागरिकता बदलने से पहली शादी के कानूनी परिणाम समाप्त नहीं होते
सुप्रीम कोर्ट में पति की ओर से दलील दी गई कि दूसरी शादी के समय वह ब्रिटिश नागरिक थे और विवाह भी विदेश में हुआ था। इसलिए IPC की धारा 4 के तहत उन पर भारतीय दंड संहिता लागू नहीं होती।
यह भी कहा गया कि ब्रिटेन का तलाक आदेश वैध था और CPC की धारा 14 के तहत उसकी वैधता की उपधारणा लागू होती है। पति ने पहली पत्नी के विदेशी अदालत के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार करने और शिकायत में देरी होने का तर्क भी दिया।
पहली पत्नी की ओर से कहा गया कि भारत में हिंदू कानून के तहत संपन्न विवाह को उसी कानून के अनुसार समाप्त किया जा सकता है।
उन्होंने Y. Narasimha Rao v. Y. Venkata Lakshmi और Satya v. Teja Singh के फैसलों का हवाला दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने पति की IPC की धारा 4 से संबंधित दलील अस्वीकार करते हुए कहा:
“द्विविवाह के अपराध की जांच को केवल दूसरी शादी के स्थान तक सीमित नहीं किया जा सकता, बल्कि पहले से कायम वैवाहिक संबंध को भी अनिवार्य रूप से ध्यान में रखना होगा।”
बेंच ने स्पष्ट किया कि बाद में नागरिकता बदल लेने से पहले से कायम विवाह के कानूनी परिणाम समाप्त नहीं होते।
शिकायत में देरी के सवाल पर कोर्ट ने कहा कि द्विविवाह एक निरंतर जारी रहने वाला अपराध है।
हालांकि, बेंच ने स्पष्ट किया कि उसके निष्कर्ष इस चरण में अनुमत सीमित न्यायिक जांच तक ही सीमित हैं।
माता-पिता के खिलाफ साजिश का आरोप साबित करने वाली सामग्री नहीं
पति के माता-पिता ने दलील दी कि उनके खिलाफ किसी विशेष आपराधिक कृत्य का आरोप नहीं लगाया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि माता-पिता और पति के बीच द्विविवाह करने के लिए किसी समझौते या साजिश को दर्शाने वाली सामग्री उपलब्ध नहीं थी।
बेंच ने Sivaraman Nair v. State of Kerala और S. Nitheen v. State of Kerala के फैसलों पर भरोसा करते हुए कहा:
“भले ही आरोपी संख्या 2 और 3 को दूसरी शादी के बारे में जानकारी रही हो, केवल इस आधार पर उन्हें द्विविवाह की साजिश के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।”
दूसरी पत्नी के खिलाफ भी कार्यवाही रद्द
दूसरी पत्नी ने कहा कि उसे पति के पहले विवाह की जानकारी नहीं थी।
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि मजिस्ट्रेट ने दूसरी पत्नी के खिलाफ संज्ञान लेते समय कोई कारण दर्ज नहीं किया था।
इसके अलावा ऐसा कोई विशेष कृत्य सामने नहीं आया जिससे यह साबित हो कि उसे पहले विवाह के कानूनी रूप से कायम होने की जानकारी थी।
बेंच ने कहा:
“प्रत्येक आरोपी के संबंध में आपराधिक जिम्मेदारी अलग-अलग स्थापित की जानी चाहिए।”
कोर्ट ने माना कि दूसरी पत्नी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।
पति के खिलाफ मुकदमा जारी रहेगा
सुप्रीम कोर्ट ने डॉ. एन. श्रीधर रेड्डी की अपील खारिज करते हुए उनके खिलाफ द्विविवाह की आपराधिक कार्यवाही जारी रखी।
वहीं, उनके माता-पिता और दूसरी पत्नी की अपीलें स्वीकार करते हुए उनके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी गई।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: N. Sridhar Reddy v. The State of A.P. through Secretary and Others
केस नंबर: Criminal Appeal No. 5187 of 2026 (साथ में Criminal Appeal Nos. 5188 और 5189 of 2026)
पीठ: जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर
फैसले की तारीख: 3 नवंबर 2026
