सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पत्नी को ‘बेवकूफ’ और ‘निकम्मी’ कहना पति के स्वभाव को दर्शा सकता है, लेकिन केवल ऐसे शब्दों के इस्तेमाल को क्रूरता या आपराधिक धमकी नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कनाडा में पत्नी की आत्महत्या के मामले में पति के खिलाफ दर्ज दहेज हत्या की एफआईआर और उससे जुड़ी सभी आपराधिक कार्यवाहियां रद्द कर दी हैं।
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस मनमोहन की डिवीजन बेंच ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें पति पीयूष नरलावार के खिलाफ एफआईआर रद्द करने से इनकार किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि पति पर लगाए गए आरोपों और पत्नी की मृत्यु के बीच कोई संबंध स्थापित नहीं हुआ था।
टोरंटो में 22वीं मंजिल से कूदकर महिला ने की थी आत्महत्या
पीयूष नरलावार का विवाह 3 जनवरी 2021 को हुआ था। फरवरी 2022 में दंपति कनाडा के टोरंटो चले गए।
11 जून 2023 को पत्नी की अपार्टमेंट की 22वीं मंजिल से कूदने के कारण मृत्यु हो गई।
फ्लैट से मिले हस्तलिखित सुसाइड नोट में महिला ने लिखा था कि एक साल से अधिक समय तक नौकरी नहीं मिलने के कारण वह खुद को जीवन में असफल महसूस कर रही थी।
30 जून 2023 को महिला के पिता ने महाराष्ट्र के औरंगाबाद स्थित सातारा पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज कराई।
इसमें IPC की धारा 304B, 323, 498A और 504 के साथ धारा 34 तथा दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3 और 4 के तहत आरोप लगाए गए।
शिकायत में विवाह से पहले 15 तोला सोने की मांग, पहली दिवाली पर सोने के आभूषण, महिला के भाई से एक लाख रुपये लेने और अपमानजनक भाषा के इस्तेमाल का आरोप था।
कनाडा पुलिस की जांच में नहीं मिले आपराधिक गतिविधि के संकेत
टोरंटो पुलिस की जांच और कोरोनर की रिपोर्ट में संघर्ष या किसी आपराधिक गतिविधि के संकेत नहीं मिले।
पुलिस ने पाया कि सुसाइड नोट की लिखावट मृतका की लिखावट से मेल खाती थी। सीसीटीवी फुटेज के अनुसार, पति घटना के लगभग आधे घंटे बाद वहां पहुंचा था।
बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने पति के माता-पिता और बहन के खिलाफ एफआईआर रद्द कर दी थी, लेकिन पति को राहत देने से इनकार कर दिया था।
बाद में पुलिस ने आरोपपत्र दाखिल किया और 4 फरवरी 2025 को पति के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किए गए।
11 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने उसके खिलाफ किसी भी तरह की दंडात्मक कार्रवाई नहीं करने का निर्देश दिया था।
सुसाइड नोट में दहेज प्रताड़ना का उल्लेख नहीं
सुप्रीम कोर्ट में पति की ओर से दलील दी गई कि आरोप अस्पष्ट थे और सुसाइड नोट, कोरोनर की रिपोर्ट तथा टोरंटो पुलिस की जांच में किसी आपराधिक गतिविधि की पुष्टि नहीं हुई थी।
बचाव पक्ष ने यह भी बताया कि पति ने पत्नी को अपना नॉमिनी बनाया था और उसके तथा उसके परिवार के खातों में पैसे भी भेजे थे।
राज्य की ओर से कहा गया कि महिला को दहेज के लिए बार-बार मानसिक और शारीरिक हिंसा का सामना करना पड़ा तथा पति से हिरासत में पूछताछ आवश्यक थी।
राज्य ने सुसाइड नोट में अंगदान की इच्छा जताने पर भी सवाल उठाया और कहा कि 22वीं मंजिल से गिरने वाली महिला का ऐसा अनुरोध करना असंभव-सा प्रतीत होता है।
शिकायतकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि कनाडा की जांच रिपोर्ट मान्य नहीं हो सकती, क्योंकि वहां IPC की धारा 304B के समान कोई कानूनी प्रावधान नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि विवाह से लेकर महिला की मृत्यु तक दहेज संबंधी कोई आरोप नहीं लगाया गया था। एफआईआर उसकी मृत्यु के बाद दर्ज कराई गई।
सुसाइड नोट का उल्लेख करते हुए बेंच ने कहा:
“यदि अपीलकर्ता और उसके परिवार द्वारा दहेज की गैरकानूनी मांगों के कारण मृतका को तनिक भी मानसिक या शारीरिक पीड़ा हुई होती, तो स्वाभाविक रूप से उसका उल्लेख सुसाइड नोट में होता।”
शादी में दिया गया सोना और दिवाली के उपहार दहेज नहीं माने गए
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि विवाह के समय 15 तोला सोना पति और पत्नी दोनों को उपहार के रूप में दिया गया था। इसलिए उसे दहेज नहीं माना जा सकता।
पहली दिवाली पर दिए गए उपहारों के संबंध में कोर्ट ने माना कि उनका आदान-प्रदान रीति-रिवाज और परंपरा के तहत हुआ हो सकता है।
एक लाख रुपये के लेन-देन पर बेंच ने पाया कि यह रकम उस समय भेजी गई थी, जब पति ने पत्नी की भारत यात्रा के लिए फ्लाइट बुक की थी।
कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि दोनों खातों के बीच कई अन्य वित्तीय लेन-देन हुए थे।
केवल अपमानजनक शब्दों से क्रूरता का अपराध साबित नहीं होता
पत्नी को ‘बेवकूफ’ और ‘निकम्मी’ कहने के आरोप पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
“अधिक से अधिक यह पति के स्वभाव को दर्शाता है, लेकिन इसे इतना गंभीर आपराधिक स्वरूप नहीं दिया जा सकता कि इसे पत्नी की आत्महत्या का कारण मान लिया जाए।”
बेंच ने आगे कहा:
“किसी विशिष्ट कृत्य या चूक के उदाहरणों के बिना ‘क्रूरता’ स्थापित नहीं की जा सकती।”
कोर्ट ने माना कि उपलब्ध सामग्री से पति के खिलाफ लगाए गए आपराधिक आरोप स्थापित नहीं होते।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की परिस्थितियों पर टिप्पणी करते हुए कहा:
“यह एक दुर्भाग्यपूर्ण उदाहरण है, जिसमें अपनी बेटी की मृत्यु से शोकग्रस्त पिता यह समझने के लिए कोई कारण तलाश रहा है कि मृतका ने आत्महत्या जैसा इतना कठोर कदम क्यों उठाया।”
बेंच ने State of Haryana v. Bhajan Lal फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि उस निर्णय के पैराग्राफ 102 की श्रेणियां (1), (2), (3), (5) और (7) वर्तमान मामले में पूरी तरह लागू होती हैं।
पति के खिलाफ एफआईआर और सभी आपराधिक कार्यवाहियां रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए पीयूष नरलावार के खिलाफ दर्ज एफआईआर संख्या 212/2023 और उससे उत्पन्न सभी आपराधिक कार्यवाहियां समाप्त कर दीं।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: Piyush S/o Deepak Narlawar v. State of Maharashtra & Others
केस नंबर: Criminal Appeal arising out of SLP (Crl.) No. 12158 of 2025
पीठ: जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस मनमोहन
फैसले की तारीख: 2 नवंबर 2026
