सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को सुकेश चंद्रशेखर की उस याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिसमें उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के जज का रूप धारण कर न्यायिक कार्यवाही को प्रभावित करने के मामले में अपनी दोषसिद्धि पर रोक लगाने की मांग की थी।
जस्टिस जेबी परदीवाला और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के 16 अक्टूबर के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा था कि दोषसिद्धि के खिलाफ अपील लंबित होने के दौरान उस पर रोक लगाने का कोई आधार नहीं बनता।
दिल्ली की एक अदालत ने 20 अगस्त को चंद्रशेखर को 2017 के भ्रष्टाचार मामले में जमानत के लिए विशेष न्यायाधीश को प्रभावित करने के उद्देश्य से सुप्रीम कोर्ट के जज का रूप धारण करने का दोषी ठहराया था। इसके बाद 29 अगस्त को उन्हें आठ साल कैद की सजा सुनाई गई थी।
हाईकोर्ट ने अपीलीय अदालत में दलीलें रखने की छूट दी थी
चंद्रशेखर ने अपनी दोषसिद्धि और सजा पर रोक लगाने की अर्जी खारिज होने के बाद दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया था।
हाईकोर्ट ने 16 अक्टूबर को उनकी याचिका का निपटारा करते हुए कहा था कि ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों और फैसले में की गई प्रतिकूल टिप्पणियों पर आपत्तियों की जांच लंबित आपराधिक अपील में की जानी चाहिए।
हाईकोर्ट ने चंद्रशेखर को अपीलीय अदालत के समक्ष अपनी सभी दलीलें रखने की स्वतंत्रता दी थी, लेकिन दोषसिद्धि पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था।
अलग-अलग अपराधों में कुल आठ साल की कैद
ट्रायल कोर्ट ने चंद्रशेखर को तीन अपराधों में अलग-अलग सजा सुनाई थी। लोक सेवक का रूप धारण करने के लिए दो साल का कठोर कारावास, लोक सेवक को धमकाने के लिए दो साल का कठोर कारावास और गुमनाम संचार के माध्यम से आपराधिक धमकी देने के लिए चार साल की कैद की सजा दी गई थी।
अदालत ने निर्देश दिया था कि सभी सजाएं एक के बाद एक चलेंगी। इस प्रकार कुल सजा आठ साल की निर्धारित की गई।
ट्रायल कोर्ट ने चंद्रशेखर के कृत्य को ‘संस्थागत पवित्रता का अपमान’ करार देते हुए कहा था कि उन्होंने जानबूझकर सुप्रीम कोर्ट के जज की पहचान अपनाकर न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने का प्रयास किया।
पुलिस हिरासत से विशेष न्यायाधीश को किया था फोन
यह मामला 28 अप्रैल 2017 की घटना से जुड़ा है। उस समय चंद्रशेखर भ्रष्टाचार के एक मामले में पुलिस हिरासत में थे।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, उन्होंने एक पुलिस कांस्टेबल का मोबाइल फोन हासिल किया और उससे तत्कालीन विशेष न्यायाधीश पूनम चौधरी के आधिकारिक लैंडलाइन और मोबाइल नंबर पर संपर्क किया। पूनम चौधरी उस समय भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामलों की सुनवाई कर रही थीं।
चंद्रशेखर ने पहले खुद को सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व जज का निजी सचिव बताया और बाद में स्वयं उसी जज के रूप में बात की।
ट्रायल कोर्ट ने पाया था कि अभियोजन पक्ष ने संदेह से परे साबित कर दिया कि चंद्रशेखर ने न्यायिक कार्यवाही को प्रभावित करने के उद्देश्य से जानबूझकर सुप्रीम कोर्ट के जज का रूप धारण किया था।
अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिका पर विचार करने से इनकार किए जाने के बाद दोषसिद्धि के खिलाफ चंद्रशेखर की लंबित आपराधिक अपील में ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों की जांच का रास्ता खुला है।
