स्कूलों में बुलिंग और उत्पीड़न की शिकायतों पर तुरंत कार्रवाई जरूरी: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने जारी किए निर्देश

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा के सभी स्कूलों को छात्रों की आत्महत्या रोकने, मानसिक स्वास्थ्य और सुरक्षा से जुड़े मौजूदा दिशानिर्देशों का सख्ती से पालन करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि स्कूलों की आंतरिक शिकायत निवारण व्यवस्था में लिंग, लैंगिक पहचान और यौन रुझान के आधार पर होने वाली बुलिंग और उत्पीड़न की शिकायतों को भी शामिल किया जाना चाहिए।

जस्टिस मनीषा बत्रा ने 31 अक्टूबर के आदेश में हरियाणा के स्कूल शिक्षा विभाग को निर्देश दिया कि राज्य के सभी स्कूल सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2025 में छात्रों की आत्महत्या रोकने के लिए जारी दिशानिर्देशों और 2021 के स्कूल सुरक्षा संबंधी दिशानिर्देशों का पालन सुनिश्चित करें।

हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसी शिकायतों पर तत्काल और गोपनीय तरीके से कार्रवाई होनी चाहिए। यदि शिकायत से किसी संज्ञेय अपराध का पता चलता है, तो कानून के अनुसार पुलिस को इसकी सूचना देना अनिवार्य होगा।

यह आदेश एक मां की याचिका पर आया, जिसके बेटे ने स्कूल में कथित रूप से लंबे समय तक बुलिंग, यौन शोषण और उत्पीड़न झेलने के बाद फरवरी 2022 में आत्महत्या कर ली थी।

कागजों तक सीमित दिशानिर्देश बच्चों की सुरक्षा नहीं कर सकते

हाईकोर्ट ने कहा कि केवल दिशानिर्देश जारी कर देना पर्याप्त नहीं है। स्कूलों में उनका प्रभावी ढंग से पालन होना भी जरूरी है।

कोर्ट ने सीबीएसई के 2015 के सर्कुलर का उल्लेख किया, जो बच्चे के कथित उत्पीड़न की पूरी अवधि के दौरान लागू था। कोर्ट के अनुसार, मुख्य सवाल यह था कि स्कूल स्तर पर इन सुरक्षा उपायों को वास्तव में कितना लागू किया गया।

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हाईकोर्ट ने स्कूलों में बुलिंग और रैगिंग रोकने से जुड़े सीबीएसई सर्कुलर, बच्चों की सुरक्षा संबंधी दिशानिर्देशों, मई 2025 के एनसीईआरटी प्रशिक्षण मॉड्यूल और मनोदर्पण पहल का भी उल्लेख किया।

कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 2025 में LGBTQIA+ समुदाय के छात्रों के साथ भेदभाव रोकने के लिए दिशानिर्देश जारी किए थे। ये दिशानिर्देश उचित कानून बनने तक कानूनी रूप से लागू रहेंगे और देश के सभी शिक्षण संस्थानों के लिए बाध्यकारी हैं।

मां ने स्कूल पर शिकायत के बावजूद कार्रवाई नहीं करने का आरोप लगाया

याचिका के अनुसार, बच्चे की मां एकल अभिभावक थीं और उसी स्कूल में कला शिक्षिका के रूप में कार्यरत थीं, जहां उनका बेटा दूसरी से दसवीं कक्षा तक पढ़ा था।

मां ने आरोप लगाया कि छठी कक्षा से ही कुछ छात्र उनके बेटे को अपमानजनक नामों से बुलाते थे। उसके साथ शारीरिक उत्पीड़न और यौन शोषण भी किया गया। फर्जी सोशल मीडिया अकाउंट के जरिए उसे साइबर बुलिंग का भी सामना करना पड़ा।

इन घटनाओं के कारण बच्चे को चिंता और पैनिक अटैक की समस्या होने लगी तथा विभिन्न अस्पतालों में उसका इलाज कराया गया। सितंबर 2021 में एक डॉक्टर ने प्रमाणित किया कि बुलिंग और यौन शोषण के कारण बच्चा पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) से पीड़ित था। उसे डिस्लेक्सिया की समस्या भी थी।

मां के मुताबिक, उन्होंने 23 सितंबर 2021 को स्कूल की प्रिंसिपल को ईमेल भेजकर उत्पीड़न में शामिल कथित छात्रों के नाम बताए थे। हालांकि, स्कूल प्रशासन ने कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की।

उन्होंने आरोप लगाया कि प्रिंसिपल ने एक महीने से अधिक समय बाद जवाब दिया कि शिकायत में नामित मुख्य छात्र स्कूल छोड़ चुके हैं और अन्य छात्रों के खिलाफ कार्रवाई के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं।

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बोर्ड परीक्षा के दौरान भी अनुचित व्यवहार का आरोप

मां ने याचिका में बताया कि दसवीं की बोर्ड परीक्षा के पहले पेपर में बच्चे को उसकी स्थिति के बावजूद लिखने के लिए सहायक (स्क्राइब) नहीं दिया गया।

उन्होंने आरोप लगाया कि विज्ञान की परीक्षा के दौरान हेडमिस्ट्रेस ने बच्चे पर संख्यात्मक प्रश्न हल करने का दबाव बनाया। साथ ही कथित तौर पर उसकी मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को नकारते हुए कहा कि वह और उसकी मां इन परेशानियों का अनुचित लाभ उठा रहे हैं।

24 फरवरी 2022 को बच्चे ने आत्महत्या कर ली। मां के अनुसार, उसके सुसाइड नोट में स्कूल को उसकी मौत के लिए जिम्मेदार ठहराया गया था। नोट में हेडमिस्ट्रेस और स्कूल के वरिष्ठ अधिकारियों का भी नाम था।

आत्महत्या के बाद दर्ज हुई FIR, एसआईटी ने की जांच

बच्चे की मौत के बाद आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में एफआईआर दर्ज की गई। हेडमिस्ट्रेस को गिरफ्तार किया गया, लेकिन बाद में ट्रायल कोर्ट से जमानत मिल गई।

5 मार्च 2022 को मामले की जांच के लिए विशेष जांच दल (SIT) गठित किया गया। जांच के दौरान पॉक्सो अधिनियम के तहत भी अपराध जोड़े गए।

जांच में प्रिंसिपल के खिलाफ मुख्य रूप से बाल यौन शोषण की शिकायत की सूचना पुलिस को नहीं देने या उसे दर्ज नहीं कराने से संबंधित अपराध सामने आया। आरोप था कि उन्होंने मां की पहले की शिकायत को स्वयं निपटाया और पुलिस को जानकारी नहीं दी।

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अक्टूबर 2022 में मां ने हाईकोर्ट का रुख किया। उन्होंने आरोप लगाया कि जांच लापरवाहीपूर्ण और पक्षपातपूर्ण तरीके से की जा रही थी।

याचिका में LGBTQIA+ समुदाय के छात्रों की सुरक्षा, शिक्षकों और काउंसलरों को संवेदनशील बनाने तथा भविष्य में ऐसी घटनाएं रोकने के लिए दिशानिर्देश जारी करने की मांग भी की गई।

जांच की निगरानी से इनकार, मौजूदा नियमों के पालन पर जोर

हाईकोर्ट ने जांच की निगरानी का निर्देश देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने पाया कि जांच पूरी हो चुकी थी और दिसंबर 2022 में अंतिम रिपोर्ट ट्रायल कोर्ट के समक्ष पेश की जा चुकी थी।

कोर्ट ने कहा कि मां अपनी शेष शिकायतें ट्रायल कोर्ट के सामने उठा सकती हैं।

LGBTQIA+ छात्रों की सुरक्षा के लिए नए दिशानिर्देश बनाने की मांग पर हाईकोर्ट ने कहा कि वह पूरे देश के शिक्षण संस्थानों के लिए नीति निर्धारित नहीं कर सकता। मां द्वारा दिए गए विशेष सुझाव शैक्षणिक नीति से जुड़े विषय हैं।

हालांकि, कोर्ट ने मौजूदा दिशानिर्देशों के प्रभावी पालन पर जोर देते हुए हरियाणा के स्कूल शिक्षा विभाग को सभी स्कूलों में सुरक्षा व्यवस्था और शिकायत निवारण तंत्र सुनिश्चित करने का निर्देश दिया।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि स्कूलों की आंतरिक समितियां लैंगिक पहचान और यौन रुझान के आधार पर बुलिंग तथा उत्पीड़न की शिकायतों को भी अपने दायरे में लें। ऐसी शिकायतों पर तत्काल, गोपनीय और कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए।

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