सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 96(3) के तहत सहमति से पारित डिक्री (Consent Decree) के खिलाफ अपील करने पर लगी रोक केवल समझौते में शामिल पक्षकारों पर लागू होती है। मुकदमे में शामिल नहीं रहा कोई व्यक्ति भी अपील की अनुमति मांग सकता है, यदि डिक्री से उसके कानूनी अधिकार प्रभावित होते हैं।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने इस कानूनी सिद्धांत को स्पष्ट करते हुए गुजरात हाईकोर्ट के आदेशों के खिलाफ दाखिल अपीलें खारिज कर दीं।
हाईकोर्ट ने भूमि विवाद में मुकदमे के पक्षकार नहीं रहे व्यक्तियों को सहमति डिक्री के खिलाफ अपील करने की अनुमति दी थी। साथ ही 11 वर्ष की देरी माफ करते हुए विवादित जमीन के संबंध में अपीलकर्ता के लेन-देन पर रोक लगाई थी।
क्या था जमीन का विवाद?
वर्ष 1975 में पुरुषोत्तमभाई पुंजाभाई ने एक पंजीकृत बिक्री विलेख के जरिए जमीन विक्रम पुंजाभाई पालखीवाला को बेची थी। प्रतिवादी संख्या 1 से 9, जो संयुक्त हिंदू परिवार (HUF) के सदस्य हैं, उसी खरीदार के माध्यम से जमीन पर अपना अधिकार जताते हैं।
वर्ष 1996 में मूल विक्रेता के उत्तराधिकारियों ने वही जमीन गीताग्राम कोऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी को बेचने का समझौता किया।
सोसाइटी ने वर्ष 2012 में समझौते के विशिष्ट पालन के लिए मुकदमा दाखिल किया। यह मुकदमा 29 अप्रैल 2013 को सहमति डिक्री के आधार पर समाप्त हुआ।
वर्ष 2022 में कोर्ट कमिश्नर ने उसी डिक्री के तहत अपीलकर्ता गिरीशभाई नटवरलाल पटेल के पक्ष में बिक्री विलेख निष्पादित किया। इसमें सोसाइटी पुष्टि करने वाले पक्ष के रूप में शामिल थी।
प्रतिवादियों के अनुसार, वर्ष 2023 में राजस्व रिकॉर्ड की जांच करने पर उन्हें जमीन पर अपीलकर्ता का नाम दर्ज होने की जानकारी मिली।
इसके बाद फरवरी 2024 में उन्होंने धोखाधड़ी और मिलीभगत का आरोप लगाते हुए सहमति डिक्री को गुजरात हाईकोर्ट में चुनौती दी।
हाईकोर्ट ने 2 अप्रैल 2024 को अपीलकर्ता के खिलाफ एकपक्षीय अंतरिम रोक लगाई। इसके बाद 14 अगस्त 2024 को रोक की पुष्टि करते हुए 11 वर्ष की देरी माफ की और प्रतिवादियों को अपील की अनुमति दे दी।
अपीलकर्ता ने सहमति डिक्री के खिलाफ अपील पर उठाया सवाल
अपीलकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अंशिन एच. देसाई ने दलील दी कि CPC की धारा 96 के तहत सहमति डिक्री के खिलाफ अपील स्वीकार्य नहीं है।
उन्होंने कहा कि समझौते का पक्षकार नहीं रहा व्यक्ति भी उस डिक्री को चुनौती देने के लिए कार्रवाई का आधार प्राप्त नहीं कर सकता।
इस दलील के समर्थन में उन्होंने Triloki Nath Singh, Pushpa Devi Bhagat और R. Janakiammal के फैसलों का उल्लेख किया।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि अंतरिम रोक का आधार एक प्रस्तावित संशोधन था, 11 वर्ष की देरी बिना पर्याप्त विचार के माफ की गई और वास्तविक प्रभावित पक्ष HUF था, न कि उसके व्यक्तिगत सदस्य।
दूसरी ओर, प्रतिवादियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मिहिर जे. ठाकोर और मेघा जानी ने मुकदमे को मिलीभगत पर आधारित बताया।
उन्होंने कहा कि मुकदमा दाखिल होने से पहले ही मूल विक्रेता के उत्तराधिकारियों ने अपीलकर्ता के पक्ष में पावर ऑफ अटॉर्नी जारी की थी और अपीलकर्ता ने उनकी ओर से वकालतनामा दाखिल किया था।
सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त दस्तावेजों का हवाला देते हुए उन्होंने यह भी कहा कि अपीलकर्ता वर्ष 2002-2003 में संबंधित सोसाइटी का चेयरमैन था।
प्रतिवादियों ने H. Anjanappa v. A. Prabhakar फैसले पर भरोसा किया।
सहमति डिक्री के खिलाफ अपील की रोक किस पर लागू होती है?
सुप्रीम कोर्ट ने CPC की धारा 96(3) और आदेश 23 के नियम 3 तथा 3A की व्याख्या करते हुए कहा कि इन प्रावधानों का उद्देश्य समझौते पर सहमति देने वाले पक्षकारों को बाद में उससे पीछे हटने से रोकना है।
बेंच ने कहा:
“हालांकि, वैधानिक रोक को यांत्रिक तरीके से लागू करके ऐसे व्यक्ति के अधिकार को समाप्त नहीं किया जा सकता, जो समझौते का पक्षकार नहीं था और जो दावा करता है कि डिक्री से उसका स्वतंत्र कानूनी हित प्रतिकूल रूप से प्रभावित हुआ है।”
कोर्ट ने Triloki Nath Singh फैसले को वर्तमान मामले से अलग बताया। उस मामले में अपीलकर्ता अपना स्वामित्व मुकदमे के एक पक्षकार के माध्यम से प्राप्त होने का दावा कर रहा था।
इसके विपरीत, वर्तमान मामले के प्रतिवादी संख्या 1 से 9 मुकदमे के पूरी तरह बाहरी व्यक्ति थे और किसी भी पक्षकार के माध्यम से अधिकार का दावा नहीं कर रहे थे।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
“समझौता डिक्री से संबंधित किसी तीसरे व्यक्ति को CPC, 1908 की धारा 96(3) के साथ पढ़े जाने वाले आदेश 23 के नियम 3 और 3A के तहत अपील करने से वंचित नहीं माना जा सकता, क्योंकि इन प्रावधानों का दायरा और प्रभाव समझौते के पक्षकारों तक सीमित है तथा केवल उन्हीं के संबंध में एस्टॉपल के रूप में काम करता है।”
तीसरे पक्ष को अपील का स्वतः अधिकार नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुकदमे का पक्षकार नहीं होने मात्र से किसी व्यक्ति को अपील करने का असीमित अधिकार नहीं मिल जाता।
बेंच ने कहा:
“साथ ही, मुकदमे का पक्षकार नहीं होने की स्थिति किसी व्यक्ति को अपील का असीमित अधिकार नहीं देती।”
ऐसे व्यक्ति को प्रथमदृष्टया यह दिखाना होगा कि डिक्री से उसके अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसके लिए अपीलीय अदालत की अनुमति भी आवश्यक है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सामान्य डिक्री के खिलाफ किसी तीसरे पक्ष की अपील के लिए लागू सिद्धांत सहमति डिक्री पर भी लागू होते हैं।
बेंच ने कहा:
“यह तथ्य कि संबंधित डिक्री एक सहमति डिक्री है, न तो इस आवश्यकता को समाप्त करता है और न ही अपने आप में अपील की अनुमति देने पर रोक लगाता है।”
H. Anjanappa में बताए गए सिद्धांतों को लागू करते हुए कोर्ट ने पाया कि प्रतिवादियों ने ऐसा कानूनी हित बताया था, जिस पर डिक्री का प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
11 वर्ष की देरी माफ करने का फैसला भी बरकरार
अपीलकर्ता ने सहमति डिक्री को चुनौती देने में हुई 11 वर्ष की देरी पर भी आपत्ति जताई थी।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
“यह मानकर आगे बढ़ना गलत होगा कि उन्हें डिक्री पारित होने की तारीख से ही उसकी जानकारी थी।”
बेंच ने पाया कि रिकॉर्ड में देरी का स्पष्टीकरण मौजूद था और प्रतिवादियों ने जानकारी मिलने के बाद कदम उठाए थे।
अंतरिम रोक के संबंध में भी कोर्ट ने हाईकोर्ट की कार्यवाही को उचित पाया।
बेंच ने कहा कि शुरुआती एकपक्षीय आदेश के बाद अपीलकर्ता को सुना गया था और उसके बाद रोक जारी रखी गई।
कोर्ट ने स्पष्ट किया:
“इस प्रकार रोक जारी रखना एकपक्षीय आदेश को स्वतः अनिश्चित अवधि तक बनाए रखना नहीं था।”
गुजरात हाईकोर्ट को तीन महीने में अपील निपटाने का अनुरोध
सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट के आदेशों के खिलाफ दाखिल अपीलें खारिज कर दीं।
हालांकि, बेंच ने स्पष्ट किया कि उसके निष्कर्षों को जमीन के स्वामित्व या धोखाधड़ी और मिलीभगत के आरोपों पर अंतिम राय नहीं माना जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट से मुख्य अपील की सुनवाई कर तीन महीने के भीतर उसका निपटारा करने का अनुरोध किया।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: Girishbhai Natwarlal Patel v. Gautam Punjabhai Palkhiwala (Dead) by LRs & Ors.
केस नंबर: Civil Appeal Nos. 14017-14018 of 2026
पीठ: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन
फैसले की तारीख: 30 अक्टूबर 2026
