मध्यस्थता ट्रिब्यूनल अनुबंध की शर्तें बदलकर स्पेसिफिक परफॉर्मेंस का आदेश नहीं दे सकता: सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रखा

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मध्यस्थता ट्रिब्यूनल किसी अनुबंध के विशिष्ट पालन (Specific Performance) का आदेश देते समय उसकी मूल शर्तों को बदल या दोबारा निर्धारित नहीं कर सकता। ऐसा करना मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 28(3) का उल्लंघन है।

जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की बेंच ने महाराष्ट्र के ठाणे में जमीन से जुड़े विवाद में मध्यस्थता अवार्ड रद्द करने वाले बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए जमीन मालिकों को बिल्डर से प्राप्त रकम नौ प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज के साथ लौटाने का निर्देश दिया।

क्या था जमीन से जुड़ा विवाद?

6 अगस्त 2003 को उपेंद्र कांतिलाल थानावाला और उनके परिवार के चार सदस्यों ने ठाणे के पंचपाखड़ी गांव स्थित जमीन में अपने अविभाजित 2/9 हिस्से के विकास के लिए श्रीराम बिल्डर्स और उसके साझेदारों के साथ समझौता किया था।

समझौते के तहत 25,000 वर्ग फुट के अनुमानित फ्लोर स्पेस इंडेक्स (FSI) के आधार पर 915 रुपये प्रति वर्ग फुट की दर तय की गई थी। कुल रकम 2,28,75,000 रुपये थी।

9 अप्रैल 2008 को जमीन मालिकों ने नोटिस जारी कर समझौता समाप्त कर दिया।

इसके बाद विवाद तीन सदस्यीय मध्यस्थता ट्रिब्यूनल के सामने पहुंचा।

10 दिसंबर 2011 को सेवानिवृत्त जस्टिस एस.डी. पंडित और पी.एस. मुधोलकर के बहुमत वाले अवार्ड ने समझौता समाप्त करने को अवैध माना और उसके विशिष्ट पालन का आदेश दिया।

ट्रिब्यूनल ने अनुबंध में तय 915 रुपये प्रति वर्ग फुट की दर को छह गुना बढ़ाकर 5,490 रुपये प्रति वर्ग फुट कर दिया। बिल्डर को बिक्री विलेख के लिए 10,91,30,164 रुपये जमा करने का निर्देश दिया गया।

साथ ही, विशिष्ट पालन का आदेश रद्द होने की स्थिति में 23,21,19,892 रुपये वैकल्पिक हर्जाने का प्रावधान किया गया।

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तीसरे मध्यस्थ वी.पी. पाटिल ने बहुमत के फैसले से असहमति जताई।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने मध्यस्थता अवार्ड रद्द किया

25 जनवरी 2020 को ठाणे के प्रधान जिला न्यायाधीश ने धारा 34 के तहत बहुमत वाले अवार्ड को बरकरार रखा।

हालांकि, 5 मार्च 2024 को बॉम्बे हाईकोर्ट ने धारा 37 के तहत उस अवार्ड को रद्द कर दिया।

इसके खिलाफ बिल्डर ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

बिल्डर का तर्क था कि उसने तय रकम का लगभग 82 प्रतिशत भुगतान कर दिया था और शेष राशि 2017 में जमा कर दी थी। उसने अवार्ड के तहत निर्धारित बढ़ी हुई 13,72,75,000 रुपये की रकम देने की भी इच्छा जताई।

अनुबंध में तय जिम्मेदारियों का क्रम बदलना गलत

सुप्रीम कोर्ट ने Gayatri Balasamy v. ISG Novasoft Technologies के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि धारा 37 के तहत हाईकोर्ट की समीक्षा की शक्ति धारा 34 जितनी ही व्यापक है।

चूंकि दोनों चुनौतियां 23 अक्टूबर 2015 से पहले दाखिल की गई थीं, इसलिए कोर्ट ने धारा 34 के असंशोधित प्रावधान लागू किए।

बेंच ने Sasan Power Limited के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि समझौते का शीर्षक या उस पर चुकाई गई एक प्रतिशत स्टाम्प ड्यूटी उसकी वास्तविक प्रकृति तय करने के लिए निर्णायक नहीं है।

हालांकि, कोर्ट ने कहा कि इस विवाद में समझौते को किसी विशेष श्रेणी में रखना आवश्यक नहीं था, क्योंकि उसमें पक्षकारों की जिम्मेदारियां और उन्हें पूरा करने का बाध्यकारी क्रम स्पष्ट था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा:

“बहुमत वाले अवार्ड में मूलभूत गलती यह स्पष्ट रूप से दिखाई देती है कि उसने मामले को बिक्री समझौते के विशिष्ट पालन के सामान्य मुकदमे की तरह देखा, न कि ऐसे अनुबंध से उत्पन्न मध्यस्थता विवाद के रूप में, जिसमें पक्षकारों पर जिम्मेदारियां थीं और उन्हें किस क्रम में पूरा करना था, यह बाध्यकारी रूप से निर्धारित था।”

पूरी रकम चुकाए बिना बिक्री विलेख का आदेश नहीं दिया जा सकता था

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सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि समझौते के अनुसार 1 मार्च 2008 तक देय पूरी रकम का भुगतान नहीं किया गया था।

बेंच ने यह भी ध्यान दिया कि FSI में बदलाव, अतिरिक्त जमीन और बेसमेंट के कारण कीमत में संशोधन की संभावना समझौते में मौजूद थी।

अनुबंध के अनुसार, सभी देय रकम का भुगतान होने के बाद ही संपत्ति का हस्तांतरण विलेख निष्पादित किया जाना था।

कोर्ट ने कहा:

“भले ही अवार्ड अपने विश्लेषण के आधार पर इस धारणा पर आगे बढ़ा हो कि संबंधित समझौता केवल विकास के लिए नहीं, बल्कि बिक्री का समझौता था, तब भी दोनों विद्वान मध्यस्थों को उसकी शर्तें दोबारा लिखने का अधिकार नहीं था।”

अवार्ड में कई गंभीर त्रुटियां पाईं

सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत वाले अवार्ड में अन्य खामियों की भी पहचान की।

ट्रिब्यूनल ने संपत्ति के उस हिस्से को भी हस्तांतरण में शामिल कर दिया था, जिसे समझौते से स्पष्ट रूप से बाहर रखा गया था। इससे ऐसे सह-मालिकों के अधिकार प्रभावित होते थे, जो मध्यस्थता कार्यवाही में पक्षकार नहीं थे।

इसके अलावा, पहले के एक समझौता ज्ञापन (MoU) के तहत किए गए भुगतानों को भी समायोजित कर दिया गया, जबकि बाद के समझौते ने उस MoU का स्थान ले लिया था।

ट्रिब्यूनल ने अनुबंध में निर्धारित दर को छह गुना बढ़ाने का भी कोई ठोस हिसाब या कारण नहीं दिया।

इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसा निर्देश “पूरी तरह समझौते के दायरे से बाहर था और तर्क के विपरीत था।”

बेंच ने पाया कि समझौते में हर्जाने का कोई प्रावधान नहीं था। इसके बावजूद विशिष्ट पालन के विकल्प के रूप में हर्जाना देना सार्वजनिक नीति के विरुद्ध था, जैसा कि हाईकोर्ट ने सही निष्कर्ष निकाला था।

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मध्यस्थों ने अनुबंध की शर्तों को “पूरी तरह हटाकर अपनी मनमर्जी के अनुसार नई शर्तों से बदल दिया था।”

जमीन मालिकों को नौ प्रतिशत ब्याज सहित रकम लौटाने का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने समझौते की धारा 54 पर विचार करते हुए पाया कि अनुबंध समाप्त करने की स्थिति में जमीन मालिकों को प्राप्त रकम लौटानी थी, क्योंकि उनके हिस्से की जमीन पर कोई निर्माण नहीं हुआ था।

इसके बावजूद जमीन मालिकों ने बिल्डर से मिली रकम अपने पास रखी।

बेंच ने कहा कि पक्षकारों के बीच नए मुकदमे से बचने और पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए अनुच्छेद 142 के तहत निर्देश देना उचित होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने जमीन मालिकों को आदेश दिया कि वे बिल्डर से प्राप्त पूरी रकम प्रत्येक भुगतान की तारीख से वास्तविक वापसी तक नौ प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज के साथ लौटाएं।

इसके अतिरिक्त बिल्डर द्वारा अदालतों में जमा की गई रकम भी उस पर अर्जित ब्याज सहित वापस की जाएगी।

इन निर्देशों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने अपीलों का निपटारा कर दिया। प्रत्येक पक्ष अपना मुकदमे का खर्च स्वयं वहन करेगा।

केस डिटेल्स

केस टाइटल: Shreeram Builders v. Upendra Kantilal Thanawala and others

केस नंबर: Civil Appeal Nos. 9817-9818 of 2024

पीठ: जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा

फैसले की तारीख: 29 अक्टूबर 2026

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