इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि कोरोना संक्रमण से कर्मचारी की मृत्यु की पुष्टि सरकारी अस्पताल के मेडिकल रिकॉर्ड से होने पर केवल RT-PCR रिपोर्ट उपलब्ध नहीं होने के आधार पर 50 लाख रुपये की अनुग्रह सहायता का दावा खारिज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उत्तर प्रदेश सरकार की COVID-19 मुआवजा योजना में संक्रमण की पुष्टि के लिए RT-PCR के अलावा एंटीजन टेस्ट और सीटी स्कैन रिपोर्ट को भी मान्यता दी गई है।
न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने अर्चना सिंह की याचिका स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया। याचिकाकर्ता के पति की मई 2021 में कोरोना संक्रमण के कारण मृत्यु हो गई थी। जिला प्रशासन ने मुआवजे के दावे को मंजूरी दे दी थी, लेकिन बाद में RT-PCR रिपोर्ट पोर्टल पर अपलोड नहीं होने के कारण आवेदन खारिज कर दिया गया।
हाईकोर्ट ने कहा कि जब सरकारी अस्पताल के रिकॉर्ड में कोरोना संक्रमण की पुष्टि दर्ज है और संबंधित अधिकारी भी संक्रमण तथा मृत्यु के कारण को स्वीकार करते हैं, तो अलग से जांच रिपोर्ट उपलब्ध नहीं होने का अर्थ यह नहीं लगाया जा सकता कि संक्रमण का कोई प्रमाण नहीं है।
सरकारी अस्पताल के रिकॉर्ड में दर्ज थी कोरोना संक्रमण की पुष्टि
याचिकाकर्ता के पति उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड की ओबरा ताप विद्युत परियोजना में जूनियर इंजीनियर के पद पर कार्यरत थे। उन्होंने कोरोना महामारी के दौरान भी अपनी ड्यूटी जारी रखी थी।
स्वास्थ्य बिगड़ने पर उन्हें 28 अप्रैल 2021 को सोनभद्र के लोढ़ी स्थित सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। अस्पताल के बेड-हेड टिकट में उनका एंटीजन टेस्ट पॉजिटिव दर्ज था।
इलाज के दौरान 5 मई 2021 को उनकी मृत्यु हो गई। अस्पताल द्वारा तैयार मृत्यु संबंधी प्रपत्र में COVID-19 वायरल निमोनिया को मृत्यु का मूल कारण बताया गया था, जिसके बाद कार्डियोपल्मोनरी अरेस्ट हुआ।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कार्डियोपल्मोनरी अरेस्ट दर्ज होने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि मृत्यु का संबंध कोरोना संक्रमण से नहीं था।
जिलाधिकारी की मंजूरी के बावजूद खारिज हुआ दावा
कर्मचारी की मृत्यु के बाद विद्युत उत्पादन निगम के मुख्य महाप्रबंधक ने मुआवजे की सिफारिश की थी। मुख्य विकास अधिकारी की अध्यक्षता वाली समिति ने भी मामले की जांच कर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।
इन सिफारिशों के आधार पर जिलाधिकारी ने जून 2021 में मुआवजे के दावे को मंजूरी दे दी थी। बाद में संबंधित प्रमाणपत्रों का सत्यापन भी किया गया और उन्हें सही पाया गया।
इसके बावजूद 16 नवंबर 2021 को आवेदन इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि मृतक की RT-PCR रिपोर्ट निर्धारित पोर्टल पर अपलोड नहीं की गई थी।
राज्य सरकार की ओर से स्थायी अधिवक्ता ने दलील दी कि शासनादेश के अनुसार रिपोर्ट अपलोड करना आवश्यक था। रिपोर्ट उपलब्ध नहीं होने के कारण पोर्टल पर मुआवजे का दावा आगे नहीं बढ़ाया जा सकता था।
केवल RT-PCR रिपोर्ट अनिवार्य नहीं: हाईकोर्ट
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने 26 जुलाई 2021 के शासनादेश का परीक्षण किया। कोर्ट ने पाया कि शासनादेश में मृत कर्मचारी की RT-PCR, एंटीजन या सीटी स्कैन रिपोर्ट की स्पष्ट प्रति राहत आयुक्त के पोर्टल पर अपलोड करने का प्रावधान था।
खंडपीठ ने कहा कि शासनादेश में केवल RT-PCR रिपोर्ट को ही कोरोना संक्रमण की पुष्टि का एकमात्र आधार नहीं बनाया गया था।
मौजूदा मामले में सरकारी अस्पताल के रिकॉर्ड में एंटीजन टेस्ट पॉजिटिव होने की जानकारी दर्ज थी। इसके अलावा मृत्यु संबंधी प्रपत्र में भी COVID-19 वायरल निमोनिया को मृत्यु का मूल कारण बताया गया था।
कोर्ट ने कहा कि सरकारी अस्पताल के ऐसे रिकॉर्ड को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, जो मरीज के इलाज के दौरान तैयार किए गए हों और जिनमें संक्रमण की स्पष्ट पुष्टि हो।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मृत्यु संबंधी प्रपत्र में कार्डियोपल्मोनरी अरेस्ट का उल्लेख कोरोना संक्रमण को मृत्यु का मूल कारण मानने से इनकार करने का आधार नहीं बन सकता।
50 लाख रुपये की सहायता से जुड़ा मामला
उत्तर प्रदेश सरकार की योजना के तहत कोरोना संक्रमण की रोकथाम, बचाव या उपचार से संबंधित ड्यूटी करते हुए संक्रमण से मृत्यु होने पर संबंधित कर्मचारियों के आश्रितों को एकमुश्त 50 लाख रुपये की अनुग्रह सहायता देने का प्रावधान था।
हाईकोर्ट ने माना कि इस मामले में सरकारी अस्पताल के दस्तावेज कोरोना संक्रमण और मृत्यु के कारण की पुष्टि करते हैं। ऐसे में केवल RT-PCR रिपोर्ट उपलब्ध नहीं होने के आधार पर मुआवजे का दावा खारिज करना उचित नहीं था।
इसी आधार पर न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने अर्चना सिंह की याचिका स्वीकार कर ली।
