सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967 (UAPA) की धारा 43D(7) के तहत विदेशी नागरिकों की जमानत पर लगाई गई विशेष रोक तभी लागू होगी, जब संबंधित व्यक्ति का भारत में प्रारंभिक प्रवेश ही अनधिकृत या अवैध रहा हो। यदि कोई विदेशी नागरिक वैध वीजा पर भारत आया था और बाद में वीजा समाप्त होने के बावजूद देश में रह गया, तो केवल इस आधार पर उसके खिलाफ यह प्रावधान लागू नहीं किया जा सकता।
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने केंद्र सरकार की अपील खारिज करते हुए मद्रास हाईकोर्ट का वह आदेश बरकरार रखा, जिसमें UAPA मामले के एक आरोपी की जमानत बहाल की गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि UAPA की धारा 43D(7) के तहत प्रतिबंध, दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 167(2) के अंतर्गत मिलने वाली वैधानिक या डिफॉल्ट जमानत पर लागू नहीं होता।
वैध वीजा पर भारत आने और बाद में अवैध रूप से रहने का मामला
मामला मोहम्मद रिफास उर्फ मोहम्मद रिगबास से संबंधित है, जिस पर श्रीलंकाई नागरिक होने का आरोप लगाया गया था।
उसका नाम तमिलनाडु के कीलाकराई थाने में दर्ज FIR नंबर 46/2018 में आरोपी के रूप में शामिल था।
इस मामले में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 153A और 120B, UAPA की धारा 15, 17, 18, 19 और 20 तथा आर्म्स एक्ट के तहत आरोप लगाए गए थे।
आरोप था कि आरोपी ने सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने और सरकार के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष छेड़ने की साजिश रची थी।
जांच एजेंसी निर्धारित वैधानिक अवधि के भीतर चार्जशीट दाखिल नहीं कर सकी। इसके कारण रामनाथपुरम की सेशन कोर्ट ने 5 जुलाई 2018 को आरोपी को CrPC की धारा 167(2) के तहत डिफॉल्ट जमानत दे दी।
जनवरी 2019 में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने मामले की जांच अपने हाथ में ले ली।
इसके बाद 29 नवंबर 2019 को आरोपी के खिलाफ विदेशी नागरिक अधिनियम, पासपोर्ट अधिनियम और अन्य कानूनों के तहत FIR नंबर 188/2019 दर्ज की गई।
इस FIR का आधार ग्राम प्रशासनिक अधिकारी के समक्ष दिया गया कथित बयान था, जिसमें आरोपी ने स्वयं को श्रीलंकाई नागरिक बताया था।
आरोप के अनुसार वह वर्ष 2009 में भारत आया था, वीजा की अवधि समाप्त होने के बाद भी देश में रहा और अवैध तरीके से भारतीय पहचान संबंधी दस्तावेज प्राप्त किए।
NIA कोर्ट ने रद्द की थी जमानत, मद्रास हाईकोर्ट ने बहाल की
केंद्र सरकार ने 29 अप्रैल 2022 को आरोपी की जमानत रद्द करने के लिए आवेदन दाखिल किया।
सरकार का आरोप था कि आरोपी ने अपनी श्रीलंकाई नागरिकता छिपाई थी, ताकि UAPA की धारा 43D(7) के तहत जमानत पर लागू प्रतिबंध से बच सके।
चेन्नई की NIA विशेष अदालत ने 5 जुलाई 2022 को उसकी जमानत रद्द कर दी।
हालांकि, मद्रास हाईकोर्ट ने 12 दिसंबर 2023 को विशेष अदालत का आदेश रद्द करते हुए जमानत बहाल कर दी।
इस फैसले को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
केंद्र ने कहा, नागरिकता छिपाना जमानत रद्द करने का आधार
केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने दलील दी कि जमानत देने वाली अदालत नए तथ्य या सामग्री सामने आने पर उसे रद्द भी कर सकती है।
उन्होंने कहा कि आरोपी द्वारा अपनी श्रीलंकाई नागरिकता छिपाए जाने का तथ्य बाद में सामने आया और यह जमानत रद्द करने का महत्वपूर्ण आधार है।
केंद्र की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि यदि चार्जशीट में आरोपी के खिलाफ गंभीर मामला सामने आता है, तो डिफॉल्ट जमानत भी रद्द की जा सकती है।
ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि आरोपी का श्रीलंकाई पासपोर्ट प्रथम दृष्टया यह साबित करता है कि वह भारतीय नागरिक नहीं है।
दूसरी ओर, आरोपी की ओर से अधिवक्ता ए. वेलन ने कहा कि डिफॉल्ट जमानत का आदेश अंतिम हो चुका था।
उन्होंने बताया कि आरोपी के पास वोटर आईडी, आधार कार्ड, फैमिली कार्ड और जन्म प्रमाणपत्र जैसे दस्तावेज मौजूद थे।
उन्होंने यह भी दलील दी कि ग्राम प्रशासनिक अधिकारी के समक्ष दिए गए कथित स्वीकारोक्ति बयान का साक्ष्य अधिनियम की धारा 25 के तहत कोई प्रमाणिक महत्व नहीं है।
इसके अतिरिक्त उन्होंने कहा कि UAPA की धारा 43D(7) में शामिल विशेष प्रावधान केवल धारा 43D की उपधारा (5) और (6) पर प्रभाव डालता है, न कि उपधारा (2) के तहत मिलने वाली डिफॉल्ट जमानत पर।
UAPA की धारा 43D(7) लागू होने के लिए तीन शर्तें जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने धारा 43D(7) की व्याख्या करते हुए कहा कि इस प्रावधान को लागू करने के लिए तीन शर्तों का एक साथ पूरा होना आवश्यक है।
पहली शर्त यह है कि संबंधित व्यक्ति UAPA के तहत किसी अपराध का आरोपी हो।
दूसरी शर्त यह है कि वह भारतीय नागरिक न हो।
तीसरी और महत्वपूर्ण शर्त यह है कि उसने भारत में अनधिकृत या अवैध तरीके से प्रवेश किया हो।
बेंच ने कहा कि कानून में इन शर्तों के बीच ‘और’ (and) शब्द का इस्तेमाल किया गया है। इसलिए तीनों शर्तों को एक साथ पढ़ना आवश्यक है।
केवल विदेशी नागरिक होने या बाद में भारत में अवैध रूप से रहने से धारा 43D(7) स्वतः लागू नहीं हो जाती।
वीजा समाप्त होने से पहले किया गया वैध प्रवेश अवैध नहीं बन जाता
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारत में प्रवेश की वैधता का निर्धारण उस समय की परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिए, जब संबंधित व्यक्ति ने देश में प्रवेश किया था।
बेंच ने कहा:
“जब कोई विदेशी नागरिक वैध वीजा जैसी अनुमति या कानूनी प्रक्रिया के तहत भारत में प्रवेश करता है, तो बाद में उस अनुमति के रद्द हो जाने या उसका भारत में रहना अवैध हो जाने मात्र से पहले किया गया वैध प्रवेश पिछली तारीख से ‘अनधिकृत या अवैध प्रवेश’ नहीं बन जाता।”
कोर्ट ने कहा कि यदि धारा 43D(7) की सभी आवश्यक शर्तें पूरी होती हैं, तब भी अत्यंत असाधारण परिस्थितियों में जमानत दी जा सकती है।
हालांकि, ऐसी परिस्थितियों में अदालत को जमानत देने के कारण लिखित रूप में दर्ज करने होंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
“ऐसी ‘अत्यंत असाधारण परिस्थितियों’ को साबित करने का भार पूरी तरह आरोपी व्यक्ति पर ही होगा।”
ग्राम प्रशासनिक अधिकारी के सामने दिया गया बयान पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता
सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी के कथित स्वीकारोक्ति बयान से संबंधित तर्क पर भी विचार किया।
बेंच ने कहा कि साक्ष्य अधिनियम की धारा 25 के उद्देश्य से ग्राम प्रशासनिक अधिकारी को पुलिस अधिकारी नहीं माना जा सकता।
इसलिए उसके समक्ष दिए गए कथित बयान को केवल इसी आधार पर पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा:
“प्रथम दृष्टया इस कथित स्वीकारोक्ति बयान में कुछ सत्यता प्रतीत होती है और इसे पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।”
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस बयान का वास्तविक साक्ष्य मूल्य क्या होगा, इसका निर्धारण ट्रायल कोर्ट करेगा।
बेंच ने यह भी पाया कि वर्ष 2019 की FIR में स्वयं दर्ज था कि आरोपी वैध वीजा पर भारत आया था और वीजा की अवधि समाप्त होने के बाद उसका देश में रहना अवैध हुआ।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार ने ऐसा कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया, जिससे यह साबित हो कि आरोपी का भारत में प्रारंभिक प्रवेश ही अवैध था।
डिफॉल्ट जमानत पर लागू नहीं होगी धारा 43D(7) की रोक
सुप्रीम कोर्ट ने डिफॉल्ट जमानत और UAPA की विशेष जमानत संबंधी शर्तों के बीच अंतर स्पष्ट किया।
बेंच ने कहा कि आरोपी को CrPC की धारा 167(2) के तहत वैधानिक अधिकार के रूप में जमानत दी गई थी।
इस अधिकार पर धारा 43D(7) के प्रतिबंध का प्रभाव नहीं पड़ता।
कोर्ट ने कहा:
“धारा 43D की उपधारा (7) का अधिभावी प्रभाव केवल धारा 43D की उपधारा (5) और (6) तक सीमित है, उपधारा (2) तक नहीं। इसलिए यह वैधानिक जमानत दिए जाने पर रोक नहीं लगाता।”
इस प्रकार सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि UAPA के तहत विदेशी नागरिकों के लिए निर्धारित विशेष प्रतिबंध का इस्तेमाल डिफॉल्ट जमानत के वैधानिक अधिकार को समाप्त करने के लिए नहीं किया जा सकता।
जमानत रद्द करने के लिए ठोस और विशेष आधार नहीं मिला
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की ओर से जमानत रद्द करने के लिए प्रस्तुत कारणों को भी पर्याप्त नहीं पाया।
बेंच ने कहा कि जमानत रद्द करने के लिए कोई विशेष और मजबूत आधार स्थापित नहीं किया गया था।
कोर्ट ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि चार्जशीट 23 जनवरी 2021 को दाखिल की गई थी, लेकिन जमानत रद्द करने का आवेदन 29 अप्रैल 2022 को दिया गया।
केंद्र सरकार इस देरी का संतोषजनक कारण नहीं बता सकी।
सरकार ने कहा था कि इस दौरान आरोपी की नागरिकता की जांच की जा रही थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट इस स्पष्टीकरण से संतुष्ट नहीं हुआ।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की अपील खारिज की
सभी तथ्यों और कानूनी प्रावधानों पर विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि आरोपी का भारत में प्रारंभिक प्रवेश अवैध होने का कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया था।
इसके अलावा आरोपी को वैधानिक अधिकार के तहत मिली डिफॉल्ट जमानत रद्द करने के लिए भी पर्याप्त आधार मौजूद नहीं था।
बेंच ने केंद्र सरकार की अपील खारिज करते हुए मद्रास हाईकोर्ट के 12 दिसंबर 2023 के आदेश को बरकरार रखा।
इस फैसले के साथ सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि UAPA की धारा 43D(7) के तहत जमानत संबंधी विशेष रोक लागू करने के लिए विदेशी नागरिक का भारत में प्रारंभिक प्रवेश अवैध होना आवश्यक है।
केस डिटेल्स
केस का नाम: Union of India v. Mohamed Rifas @ Mohamed Rigbas
केस नंबर: Criminal Appeal No. ___ of 2026 (Arising out of SLP (Crl.) No. 7177 of 2024)
पीठ: जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली
फैसले की तारीख: 27 अक्टूबर 2026
