मद्रास हाईकोर्ट ने 24 करोड़ रुपये के अस्पताल साझेदारी समझौते से जुड़े कथित जबरन वसूली के मामले में एक पुलिस इंस्पेक्टर की गिरफ्तारी और न्यायिक हिरासत को अवैध करार दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति पर लगे आरोपों की प्रकृति चाहे जो भी हो, उसे संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 के तहत मिले अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।
जस्टिस जी. आर. स्वामीनाथन और जस्टिस पी. मुरुगन की डिवीजन बेंच ने 23 अक्टूबर के आदेश में 46 वर्षीय पुलिस इंस्पेक्टर को तत्काल और बिना किसी शर्त के रिहा करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने पाया कि अपराध शाखा-आपराधिक जांच विभाग (CB-CID) यह साबित नहीं कर सका कि गिरफ्तारी के दौरान जरूरी कानूनी प्रक्रिया का पालन किया गया था।
हाईकोर्ट ने साफ किया कि वह आरोपी को जमानत नहीं दे रहा है, बल्कि उसकी हिरासत अवैध पाए जाने के कारण बिना शर्त रिहाई का आदेश दे रहा है।
गिरफ्तारी के कारण बताने की प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ
हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि इंस्पेक्टर को गिरफ्तारी के आधार बताए गए थे। इसके अलावा, ट्रायल मजिस्ट्रेट के रिकॉर्ड में भी ऐसा कोई निष्कर्ष दर्ज नहीं था जिससे यह पुष्टि हो कि आरोपी को गिरफ्तारी के आधार उपलब्ध कराए गए थे।
बेंच ने इस संबंध में मजिस्ट्रेट के तर्क की भी आलोचना की।
मजिस्ट्रेट ने यह कहते हुए आपत्ति खारिज कर दी थी कि आरोपी स्वयं पुलिस अधिकारी है और उसकी पत्नी वकील है, इसलिए वे संबंधित अधिकारियों से गिरफ्तारी की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
हाईकोर्ट ने इस तर्क को अस्वीकार करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति के पेशे या कानूनी जानकारी के आधार पर उसके संवैधानिक अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
कोर्ट ने याद दिलाया कि संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा मनमानी गिरफ्तारी और हिरासत के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करते हैं। इन प्रावधानों की सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गई व्याख्या देश का कानून है और उसका पूरी तरह पालन करना अनिवार्य है।
बेंच ने स्पष्ट किया कि कुछ मौलिक अधिकारों से किसी भी परिस्थिति में समझौता नहीं किया जा सकता।
आरोपों की गंभीरता से खत्म नहीं होते संवैधानिक अधिकार
मामले में पुलिस इंस्पेक्टर पर कट्टापंचायत, यानी गैरकानूनी और संविधान से बाहर विवाद निपटाने की प्रक्रिया में शामिल होने का आरोप था।
हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे आरोपों का सामना कर रहे पुलिस अधिकारी को भी कानून के तहत निर्धारित प्रक्रिया का लाभ मिलना चाहिए।
बेंच ने टिप्पणी की कि जब आतंकवाद के आरोपियों को राहत देने के लिए संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 लागू किए जाते हैं, तो कानून के गलत पक्ष में खड़े पुलिस अधिकारियों को संविधान के भाग तीन के संरक्षण से वंचित करना अनुचित होगा।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसके सामने विचारणीय प्रश्न आरोपी का चरित्र या उस पर लगे आरोपों की प्रकृति नहीं, बल्कि यह था कि उसकी गिरफ्तारी और हिरासत के दौरान कानूनी तथा संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ या नहीं।
24 करोड़ रुपये के समझौते से जुड़ा है मामला
यह विवाद तंजावुर के एक अस्पताल के दो साझेदारों के बीच शुरू हुआ था।
एक साझेदार ने आरोप लगाया था कि दूसरे साझेदार ने उसके खिलाफ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत झूठी शिकायत दर्ज कराने के लिए एक व्यक्ति की व्यवस्था की थी। बाद में मामले की जांच CB-CID को सौंप दी गई।
इसी दौरान दोनों साझेदारों के बीच 24 करोड़ रुपये में एक साझेदार की हिस्सेदारी खरीदने का समझौता हुआ।
समझौते के तहत 5 करोड़ रुपये का भुगतान कर दिया गया, जबकि शेष 19 करोड़ रुपये बाद में देने पर सहमति बनी।
CB-CID द्वारा जांच संभालने के बाद भुगतान करने वाले साझेदार ने आरोप लगाया कि उसे समझौता करने के लिए मजबूर किया गया था। उसने यह भी दावा किया कि 5 करोड़ रुपये पुलिस इंस्पेक्टर और उसके वरिष्ठ अधिकारियों के लिए थे।
इन आरोपों के आधार पर CB-CID ने 9 अक्टूबर को इंस्पेक्टर को जबरन वसूली, आपराधिक साजिश और लोक सेवक द्वारा कानून की अवहेलना से जुड़े आरोपों में गिरफ्तार किया।
16 अक्टूबर को ट्रायल कोर्ट ने उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी।
इसके बाद इंस्पेक्टर की पत्नी ने पति की गिरफ्तारी और हिरासत को अवैध बताते हुए हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की।
इंस्पेक्टर की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीचरण रंगराजन और राज्य सरकार की ओर से अपर लोक अभियोजक सी. क्रिस्टोफर पेश हुए।
एक मिनट की भी अवैध हिरासत बर्दाश्त नहीं की जा सकती
याचिका पर सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने अंग्रेज न्यायाधीश लॉर्ड अल्फ्रेड थॉम्पसन डेनिंग की उस टिप्पणी का उल्लेख किया, जिसके अनुसार व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए और न्यायाधीश को अन्य कार्य छोड़कर ऐसे मामलों की सुनवाई करनी चाहिए।
बेंच ने कहा कि एक मिनट की भी अवैध हिरासत बर्दाश्त नहीं की जा सकती। इसी कारण कोर्ट ने याचिका का तत्काल निस्तारण करना उचित समझा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का शीघ्र या तत्काल निस्तारण किए जाने पर कोई आपत्ति नहीं हो सकती।
गिरफ्तारी और रिमांड की प्रक्रिया की जांच के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि गंभीर कानूनी खामियों के कारण दोनों कार्रवाई अवैध हो गई थीं।
इसके बाद बेंच ने इंस्पेक्टर की गिरफ्तारी, हिरासत और उसके बाद के न्यायिक रिमांड को अवैध घोषित करते हुए तत्काल रिहाई का आदेश दिया।
हाईकोर्ट ने दोहराया कि यह जमानत देने का मामला नहीं है। चूंकि हिरासत ही अवैध थी, इसलिए आरोपी को बिना किसी शर्त के रिहा किया जाना आवश्यक है।
