सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना के रंगा रेड्डी जिले में एक मस्जिद से सटी माफी इनाम भूमि (Mafi Inam Land) के मामले में तेलंगाना राज्य वक्फ बोर्ड के पक्ष में स्थायी निषेधाज्ञा बहाल कर दी है। कोर्ट ने कहा कि संबंधित जमीन के मालिकाना हक पर कोई संदेह या विवाद की स्थिति नहीं है, क्योंकि जमीन मस्जिद, दरगाह और कब्रिस्तान के रखरखाव के लिए सौंपी गई थी।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने हाईकोर्ट का फैसला रद्द करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा वक्फ बोर्ड के पक्ष में दी गई स्थायी निषेधाज्ञा को अंतिम रूप से बरकरार रखा।
सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिवादी की ओर से दाखिल दो अवमानना याचिकाएं भी खारिज कर दीं। बेंच ने कहा कि संबंधित संपत्ति में प्रतिवादी का अब कोई वैध हित शेष नहीं है।
क्या था मामला?
विवाद तेलंगाना के रंगा रेड्डी जिले के शमशाबाद मंडल स्थित हमीदुल्लाह नगर की जमीन से संबंधित था।
तेलंगाना राज्य वक्फ बोर्ड सर्वे नंबर 89 में स्थित कुतुब शाही मस्जिद, शाह अमानुल्लाह साहब की दरगाह, कब्रिस्तान और एक कुएं का प्रबंधन कर रहा था।
वक्फ बोर्ड ने अपनी जमीन के कब्जे में प्रतिवादियों के हस्तक्षेप को रोकने के लिए स्थायी निषेधाज्ञा का मुकदमा दाखिल किया था।
विवादित जमीन का क्षेत्रफल 16 एकड़ 5 गुंटा था, जबकि विभिन्न सर्वे नंबरों में कुल 37 एकड़ 25 गुंटा जमीन शामिल थी।
ट्रायल कोर्ट ने सर्वे कमिश्नर की रिपोर्ट और सरकारी गजट अधिसूचना के आधार पर वक्फ बोर्ड के पक्ष में फैसला दिया था। इन दस्तावेजों में पूरी जमीन को वक्फ संस्था की संपत्ति बताया गया था।
ट्रायल कोर्ट ने यह भी पाया कि प्रतिवादियों द्वारा पेश किए गए वर्ष 1956-57 से 1958-59 के पहानी राजस्व रिकॉर्ड में जमीन को माफी इनाम संपत्ति बताया गया था।
यह ऐसी जमीन थी, जो वक्फ संस्था के रखरखाव और सेवा के लिए दी गई थी।
हालांकि, हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला पलट दिया।
हाईकोर्ट ने कहा कि तेलंगाना इनाम उन्मूलन अधिनियम, 1955 के तहत ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट या पहानी तथा अन्य राजस्व रिकॉर्ड के अभाव में जमीन को वक्फ संपत्ति नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने बालकृष्ण दत्तात्रेय गलांडे बनाम बालकृष्ण रामभरोसे गुप्ता फैसले का हवाला देते हुए कहा कि जब तक वादी संपत्ति पर अपना कब्जा साबित नहीं करता, तब तक स्थायी निषेधाज्ञा नहीं दी जा सकती।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने प्रतिवादियों के कब्जे को स्वीकार करते हुए वक्फ बोर्ड का मुकदमा खारिज कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट में दोनों पक्षों की दलीलें
वक्फ बोर्ड की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेश्वर ने पक्ष रखा, जबकि प्रतिवादियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नवीन पाहवा उपस्थित हुए।
प्रतिवादियों ने सुप्रीम कोर्ट के अनथुला सुधाकर बनाम पी. बुच्ची रेड्डी फैसले पर भी भरोसा किया, जिसमें अचल संपत्ति से संबंधित निषेधाज्ञा के मुकदमों के कानूनी सिद्धांतों की व्याख्या की गई थी।
जमीन के मालिकाना हक पर कोई संदेह नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों फैसलों की जांच करते हुए कहा कि अनथुला सुधाकर मामले में अलग-अलग बिक्री विलेखों और मालिकाना हक के परस्पर विरोधी दावों का विवाद था।
वहीं, बालकृष्ण दत्तात्रेय गलांडे मामले में वास्तविक कब्जे का प्रश्न निर्णायक था।
बेंच ने स्पष्ट किया कि मौजूदा मामले में ऐसी कोई स्थिति नहीं है।
कोर्ट ने कहा,
“यहां न तो पहले उद्धृत मामले की तरह मालिकाना हक पर कोई संदेह की स्थिति है और न ही दूसरे मामले की तरह वास्तविक कब्जे का कोई विवाद मौजूद है।”
सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 1968 की सर्वे कमिश्नर की रिपोर्ट का उल्लेख किया।
इस रिपोर्ट में उस व्यक्ति के पोते की आपत्ति पर विचार किया गया था, जिसका नाम राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज था। सर्वे कमिश्नर ने आपत्ति खारिज कर दी थी।
रिपोर्ट में पाया गया था कि जमीन मस्जिद और दरगाह की सेवा जारी रखने के लिए सौंपी गई थी। जिन व्यक्तियों के पास जमीन का कब्जा था, उन्हें इसे बेचने का कोई अधिकार नहीं था।
सर्वे कमिश्नर ने कुल 42 एकड़ 3 गुंटा इनाम भूमि को वक्फ संपत्ति माना था।
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि प्रतिवादियों को जमीन बेचने वाले व्यक्तियों ने सर्वे कमिश्नर के इस आदेश को कभी चुनौती नहीं दी।
इसके अलावा प्रतिवादियों ने केवल एग्रीमेंट टू सेल और जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी के आधार पर कब्जे का दावा किया था।
इन तथ्यों पर विचार करते हुए बेंच ने कहा,
“हम नहीं मानते कि विवादित संपत्ति के मालिकाना हक पर कोई संदेह है। प्रतिवादियों के कथित विक्रेताओं को, यदि वे कब्जे में थे भी, तो वह जमीन केवल मस्जिद, दरगाह और कब्रिस्तान के रखरखाव के उद्देश्य से सौंपी गई थी।”
वक्फ अधिसूचना को निर्धारित समय में चुनौती नहीं दी गई
सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ अधिनियम, 1954 के तहत जारी वर्ष 1989 की अधिसूचना पर भी विचार किया।
कोर्ट ने कहा कि वक्फ संपत्तियों की प्रकाशित सूची पर विवाद उठाने के लिए एक वर्ष की समयसीमा निर्धारित थी। न्यायिक व्याख्या के अनुसार यह अवधि जानकारी मिलने की तारीख से भी गिनी जा सकती है।
बेंच ने पाया कि प्रतिवादियों या उन्हें जमीन बेचने वाले व्यक्तियों ने निर्धारित समयसीमा के भीतर अधिसूचना को चुनौती नहीं दी थी।
कोर्ट ने कहा,
“अनुलग्नक पी-2 से एक वर्ष की निर्धारित अवधि के भीतर न तो प्रतिवादियों के विक्रेताओं और न ही स्वयं प्रतिवादियों ने कोई विवाद उठाया। यह दलील भी नहीं दी गई कि उन्हें पहली बार इसकी जानकारी किसी बाद की तारीख को हुई थी।”
इस आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने माना कि संबंधित जमीन पर वक्फ बोर्ड के अधिकार को चुनौती देने का कोई आधार नहीं बनता।
सुप्रीम कोर्ट ने दो अवमानना याचिकाएं भी खारिज कीं
मामले में प्रतिवादी ने सुप्रीम कोर्ट के 6 फरवरी 2024 के यथास्थिति बनाए रखने के आदेश के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए दो अवमानना याचिकाएं दाखिल की थीं।
पहली याचिका में धार्मिक गतिविधियों के आयोजन तथा प्रवेश द्वार और होर्डिंग लगाने को आदेश का उल्लंघन बताया गया था।
दूसरी याचिका में कोर्ट की अनुमति के बिना एक बिक्री विलेख रद्द किए जाने पर आपत्ति उठाई गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि इनमें से किसी भी कार्रवाई से संपत्ति की प्रकृति में हस्तक्षेप नहीं हुआ और न ही प्रतिवादी के अधिकार प्रभावित हुए।
बेंच ने कहा,
“किसी भी स्थिति में, हमने तेलंगाना राज्य वक्फ बोर्ड के पक्ष में फैसला दिया है और प्रतिवादी का इस संपत्ति में अब कोई हित शेष नहीं है।”
इसके साथ ही कोर्ट ने दोनों अवमानना याचिकाएं खारिज कर दीं।
वक्फ बोर्ड के पक्ष में ट्रायल कोर्ट का आदेश बहाल
सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ बोर्ड की अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया।
बेंच ने ट्रायल कोर्ट द्वारा वक्फ बोर्ड के पक्ष में दी गई स्थायी निषेधाज्ञा को अंतिम रूप से प्रभावी कर दिया।
इस आदेश के साथ प्रतिवादियों की दोनों अवमानना याचिकाएं खारिज कर दी गईं और लंबित आवेदनों को भी अस्वीकार कर दिया गया।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: आंध्र प्रदेश राज्य वक्फ बोर्ड (अब तेलंगाना राज्य वक्फ बोर्ड) बनाम सैयद मसूद अहमद एवं अन्य
केस नंबर: सिविल अपील संख्या 2804/2024 (अवमानना याचिका (सिविल) संख्या 842 और 635/2026 सहित)
बेंच: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन
फैसले की तारीख: 26 अक्टूबर 2026
