धोखाधड़ी से किए गए भूमि अधिग्रहण को देरी या पूर्व निर्णय के आधार पर वैध नहीं ठहराया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक में एक सहकारी हाउसिंग सोसायटी के लिए किए गए भूमि अधिग्रहण को रद्द करते हुए कहा है कि धोखाधड़ी और सरकारी शक्तियों के अनुचित इस्तेमाल से किए गए अधिग्रहण को याचिका दाखिल करने में देरी या पूर्व निर्णय से बाधित होने के सिद्धांत (Res Judicata) के आधार पर संरक्षण नहीं दिया जा सकता।

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने कर्नाटक हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच का फैसला रद्द करते हुए सिंगल जज के आदेश को बहाल कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने अधिग्रहित जमीन का कब्जा मूल भू-स्वामियों को वापस सौंपने का भी निर्देश दिया।

जस्टिस विनोद चंद्रन द्वारा लिखे गए फैसले की शुरुआत इस टिप्पणी से हुई,

“मुआवजा कितना भी उचित क्यों न हो, यदि कानून का अधिकार नहीं है या सार्वजनिक उद्देश्य मौजूद नहीं है, तो भूमि अधिग्रहण की शक्ति का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।”

क्या था मामला?

विवाद बेंगलुरु उत्तर तालुक के नेलाकादिरनहल्ली गांव में एक सहकारी हाउसिंग सोसायटी के लिए किए गए भूमि अधिग्रहण से संबंधित था।

21 सितंबर 1984 को सोसायटी ने भाग्य एंटरप्राइजेज नामक निजी संस्था के साथ समझौता किया था। यह समझौता भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 की धारा 3(f)(vi) लागू होने से तीन दिन पहले हुआ था। यह प्रावधान 24 सितंबर 1984 से प्रभावी हुआ, जिसके तहत सहकारी समितियों की आवासीय योजनाओं को सार्वजनिक उद्देश्य माना गया।

इसके बाद 13 नवंबर 1987 को राज्य सरकार ने 97 एकड़ जमीन के अधिग्रहण को मंजूरी दी।

22 नवंबर 1988 को अधिनियम की धारा 4(1) के तहत 79 एकड़ 25 गुंटा जमीन के लिए अधिसूचना जारी की गई। इसके बाद 4 दिसंबर 1989 को धारा 6 के तहत घोषणा जारी हुई, जिसमें अधिग्रहण का क्षेत्रफल घटाकर 59 एकड़ 6 गुंटा कर दिया गया।

अपीलकर्ता चार मूल भू-स्वामियों के कानूनी उत्तराधिकारी हैं।

साल 2007 में जब उनकी जमीन के कब्जे में हस्तक्षेप करने का प्रयास हुआ, तो भू-स्वामियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

हाईकोर्ट के सिंगल जज ने अधिग्रहण में धोखाधड़ी पाते हुए पूरी प्रक्रिया रद्द कर दी थी। साथ ही गलत हलफनामा दाखिल करने के मामले में एक अवर सचिव को अवमानना नोटिस जारी किया और जुर्माना भी लगाया।

हालांकि, हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने याचिका दाखिल करने में देरी और रेस जुडिकाटा के आधार पर सिंगल जज का फैसला पलट दिया।

डिवीजन बेंच ने करिथिम्मैया मामले के पहले के फैसले पर भरोसा किया था, जिसमें इसी भूमि अधिग्रहण को वैध माना गया था।

भू-स्वामियों और सोसायटी की दलीलें

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अपीलकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता किरण सूरी और वरिष्ठ अधिवक्ता बसव प्रभु एस. पाटिल ने अधिग्रहण प्रक्रिया पर सवाल उठाए।

उन्होंने कहा कि सोसायटी की आवासीय योजना को कभी मंजूरी नहीं दी गई थी। सरकार ने केवल अधिग्रहण के लिए प्रस्तावित जमीन के क्षेत्रफल के आधार पर स्वीकृति दी थी।

उन्होंने तर्क दिया कि भाग्य एंटरप्राइजेज के साथ किया गया समझौता सरकारी शक्तियों के अनुचित इस्तेमाल को दर्शाता है। जब अधिग्रहण में धोखाधड़ी स्पष्ट रूप से साबित हो जाए, तो याचिका दाखिल करने में देरी के आधार पर राहत देने से इनकार नहीं किया जा सकता।

अपीलकर्ताओं ने यह भी कहा कि जमीन का वास्तविक कब्जा कभी नहीं लिया गया, क्योंकि कब्जा लेने के संबंध में कोई महजर (Mahazar) तैयार नहीं किया गया था।

दूसरी ओर, सोसायटी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने कहा कि प्रस्ताव की जांच तीन सदस्यीय समिति और राज्य स्तरीय समन्वय समिति ने की थी। इसके बाद राज्य सरकार ने मंजूरी दी।

उन्होंने दावा किया कि निजी संस्था केवल सेवा प्रदाता थी। उन्होंने यह भी कहा कि अधिग्रहण के लगभग 19 साल बाद रिट याचिकाएं दाखिल की गई थीं और करिथिम्मैया मामले का फैसला बाध्यकारी था।

राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने पक्ष रखा। उनकी सहायता अपर महाधिवक्ता उमर होदा ने की।

राज्य ने कर्नाटक सरकार (कार्य संचालन) नियम, 1977 का हवाला देते हुए करिथिम्मैया फैसले के आधार पर रेस जुडिकाटा का तर्क दिया।

निजी संस्था के साथ समझौते में धोखाधड़ी के संकेत

सुप्रीम कोर्ट ने सोसायटी की इस दलील को खारिज कर दिया कि भाग्य एंटरप्राइजेज केवल एक सेवा प्रदाता थी।

कोर्ट ने पाया कि समझौते के तहत निजी संस्था ने यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी ली थी कि जमीन का अधिग्रहण सरकार के माध्यम से सोसायटी के लिए किया जाए।

समझौते में कमीशन के भुगतान को धारा 4 और धारा 6 के तहत अधिग्रहण प्रक्रिया के अलग-अलग चरणों से जोड़ा गया था।

इस पर बेंच ने कहा,

“यह धोखाधड़ी करने के प्रयास की स्पष्ट अभिव्यक्ति है।”

आवासीय योजना को नहीं मिली थी आवश्यक मंजूरी

सुप्रीम कोर्ट ने भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा 3(f)(vi) की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया कि सरकार को केवल जमीन अधिग्रहण के अनुरोध को नहीं, बल्कि वास्तविक आवासीय योजना को मंजूरी देनी होती है।

बेंच ने कहा,

“मंजूरी योजना के लिए होनी चाहिए, केवल विचाराधीन योजना के लिए नहीं, बल्कि उसके वास्तविक स्वरूप और विवरण यानी लेआउट और ब्लूप्रिंट के लिए, जिसे सक्षम प्राधिकारी के समक्ष प्रस्तुत किया गया हो।”

कोर्ट ने पाया कि सरकार के सामने कोई लेआउट प्लान प्रस्तुत ही नहीं किया गया था।

बेंच ने समितियों द्वारा प्रस्ताव पर किए गए विचार को लापरवाहीपूर्ण और बिना विवेक के इस्तेमाल के बताया।

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सुप्रीम कोर्ट ने 13 नवंबर 1987 की सरकारी मंजूरी को भी संक्षिप्त और अस्पष्ट आदेश माना।

कोर्ट ने पाया कि यह आदेश 1977 के नियमों के नियम 18 के अनुसार राज्यपाल के नाम से जारी नहीं किया गया था।

मुआवजे के भुगतान में भी नियमों का उल्लंघन

सरकारी फाइलों की जांच में सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि सोसायटी ने बकाया राशि का केवल कुछ हिस्सा जमा किया था।

इसके अलावा ₹19,60,000 सीधे भू-स्वामियों को दिए गए थे।

अधिकारियों ने पूरी रकम सरकारी प्रक्रिया के तहत जमा कराने के बजाय निजी तौर पर किए गए भुगतान को स्वीकार कर लिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने इसे भूमि अधिग्रहण अधिनियम का स्पष्ट उल्लंघन माना।

जमीन का कब्जा लेने के दावे पर भी सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 16(2) के तहत कब्जे से संबंधित कानूनी अनुमान का खंडन किया जा सकता है।

कोर्ट ने पाया कि सोसायटी के अपने दस्तावेजों से स्पष्ट था कि धारा 47 का इस्तेमाल किया गया था। यह हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के निष्कर्ष के विपरीत था।

धोखाधड़ी साबित होने पर देरी और रेस जुडिकाटा का तर्क महत्वहीन

सुप्रीम कोर्ट ने करिथिम्मैया मामले के फैसले की भी जांच की।

बेंच ने पाया कि उस मामले में रिकॉर्ड की जांच किए बिना यह मान लिया गया था कि आवासीय योजना को मंजूरी मिल चुकी थी।

इसके अलावा भाग्य एंटरप्राइजेज के साथ किया गया समझौता भी उस समय अदालत के सामने नहीं था।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि करिथिम्मैया फैसले के खिलाफ दाखिल विशेष अनुमति याचिका केवल खारिज की गई थी।

इस संबंध में बेंच ने कहा,

“उस फैसले को इस कोर्ट के पूर्व निर्णय का दर्जा प्राप्त नहीं है।”

सुप्रीम कोर्ट ने एस.पी. चेंगलवराय नायडू और ए.वी. पपय्या शास्त्री मामलों के फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा,

“धोखाधड़ी सभी गंभीर और औपचारिक कार्यों को दूषित कर देती है, यह ऐसा सिद्धांत है जिसे केवल कहने भर तक सीमित नहीं किया जा सकता।”

कोर्ट ने कहा कि जब धोखाधड़ी और अनुचित प्रभाव के जरिए अवैध भूमि अधिग्रहण के आरोप स्थापित हो जाएं, तो याचिका में देरी और पूर्व निर्णय के आधार पर मामले को रोकने के तर्क महत्वहीन हो जाते हैं।

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बेंच ने कहा,

“विशेष रूप से धोखाधड़ी और अनुचित प्रभाव के माध्यम से अवैध अधिग्रहण के स्थापित आरोपों के सामने रेस जुडिकाटा और देरी के आधार महत्वहीन हो जाते हैं।”

समिति की जांच में भी सामने आई थीं अनियमितताएं

सुप्रीम कोर्ट ने जी.वी.के. राव समिति की रिपोर्ट का भी उल्लेख किया।

समिति ने पाया था कि सोसायटी के सदस्यों से संबंधित रिकॉर्ड एक पूर्व कर्मचारी अपने साथ ले गया था।

इसके अलावा एजेंटों को बड़ी रकम का भुगतान किया गया था।

सोसायटी के पदाधिकारियों ने यह भी बताया था कि सरकारी अधिकारियों को रिश्वत दी गई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने अधिग्रहण रद्द कर जमीन लौटाने का आदेश दिया

सुप्रीम कोर्ट ने अपीलें स्वीकार करते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच का फैसला रद्द कर दिया और सिंगल जज के आदेश को बहाल कर दिया।

हालांकि, लंबा समय बीत जाने के कारण कोर्ट ने अवमानना कार्यवाही शुरू करने संबंधी निर्देश हटा दिया।

बेंच ने प्रत्येक याचिकाकर्ता या कानूनी उत्तराधिकारियों के समूह के लिए जुर्माने की राशि बढ़ाकर ₹50,000 कर दी।

कोर्ट ने निर्देश दिया कि सभी मूल भू-स्वामियों को उनकी जमीन का कब्जा वापस दिया जाए, चाहे उन्होंने भूमि अधिग्रहण को अदालत में चुनौती दी हो या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जिन भू-स्वामियों ने सरकार से मुआवजा प्राप्त किया है, उन्हें वह रकम बिना ब्याज लौटानी होगी।

हालांकि, निजी लेनदेन के तहत प्राप्त रकम वापस करने की आवश्यकता नहीं होगी।

बेंच ने साफ किया कि संबंधित सहकारी हाउसिंग सोसायटी का इन जमीनों पर कोई दावा नहीं रहेगा।

वापस नहीं ली गई जमीन की होगी नीलामी

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि जिन जमीनों को मूल मालिक वापस नहीं लेते हैं, उनकी नीलामी राजस्व अधिकारी करेंगे।

यह नीलामी जिला जज (सेलेक्शन ग्रेड) से नीचे के स्तर के नहीं होने वाले न्यायिक अधिकारी की निगरानी में होगी।

नीलामी से प्राप्त रकम का इस्तेमाल पीड़ितों को मुआवजा देने के लिए किया जाएगा।

इस संबंध में कर्नाटक हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस, कर्नाटक विधिक सेवा प्राधिकरण से परामर्श करके आवश्यक निर्देश देंगे।

केस डिटेल्स

केस टाइटल: एन. अरसप्पा बनाम कर्नाटक राज्य एवं अन्य

केस नंबर: सिविल अपील संख्या 13744-13747/2015 (संबंधित अपीलों सहित)

बेंच: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन

फैसले की तारीख: 26 अक्टूबर 2026

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