दिल्ली हाईकोर्ट ने निजी स्कूलों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) और वंचित समूह के छात्रों को यूनिफॉर्म खरीदने के लिए नकद सब्सिडी देने की दिल्ली सरकार की नीति को बरकरार रखा है। कोर्ट ने इस व्यवस्था को मंजूरी देने वाले अपने पुराने फैसले पर फिर से विचार करने से इनकार कर दिया।
जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद और जस्टिस रेणु भटनागर की बेंच ने 12 अक्टूबर के अपने आदेश में गैर-सरकारी संगठन ‘जस्टिस फॉर ऑल’ की पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी। जजों ने कहा कि यह याचिका पूरे मामले पर फिर से पुरानी बहस छेड़ने की कोशिश है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक सरकार का कोई नीतिगत फैसला इतना मनमाना और अजीबोगरीब न हो कि वह अदालत के अंतःकरण को झकझोर दे, तब तक उसमें न्यायिक हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।
बेंच ने कहा कि जमीनी दिक्कतों के कारण कपड़े खरीदकर बांटने के बजाय सीधे आर्थिक सहायता देने का फैसला मनमाना या सनक भरा नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि रिकॉर्ड पर रखे गए सभी दस्तावेजों और कैबिनेट नोट पर विचार करने के बाद यह साफ है कि 10 जून 2025 की सरकारी नीति कानून के प्रावधानों के खिलाफ नहीं है।
कानूनी बाध्यता को लेकर याचिकाकर्ता की चुनौती
याचिकाकर्ता संगठन ने 23 जनवरी के फैसले पर पुनर्विचार की मांग करते हुए दलील दी थी कि शिक्षा का अधिकार (आरटीई) कानून के तहत सहायता प्राप्त और गैर-सहायता प्राप्त निजी स्कूलों में पढ़ने वाले ईडब्ल्यूएस और वंचित वर्ग के बच्चों को सरकार द्वारा सीधे यूनिफॉर्म दी जानी चाहिए, न कि उसके बदले नकद राशि।
इसके जवाब में दिल्ली सरकार ने कहा था कि यूनिफॉर्म की केंद्रीय खरीद और वितरण व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। प्रशासनिक बाधाओं को देखते हुए कैबिनेट ने जून 2025 में नई नीति को मंजूरी दी थी, जिसके तहत पात्र विद्यार्थियों को यूनिफॉर्म के लिए सीधे उपयुक्त राशि का भुगतान करने का रास्ता चुना गया।
अदालत ने मानी व्यवस्था से जुड़ी व्यावहारिक कठिनाइयां
याचिका खारिज होने के साथ ही हाईकोर्ट का 23 जनवरी का पुराना फैसला यथावत लागू रहेगा, जिसमें डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) के जरिए सहायता राशि देने को आरटीई कानून और उसके नियमों के पूरी तरह अनुकूल माना गया था।
अपने जनवरी के फैसले में अदालत ने रेखांकित किया था कि हर छात्र के लिए अलग-अलग यूनिफॉर्म तैयार कराने में सरकारी तंत्र के सामने वास्तविक बाधाएं थीं। बेंच ने कहा था कि नया शैक्षणिक सत्र शुरू होने से पहले प्रत्येक बच्चे का नाप लेना, सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM) पोर्टल से तरह-तरह के कपड़े मंगाना, नाप के अनुसार सिलाई कराना और फिर उन्हें स्कूलों में बांटना व्यावहारिक रूप से बेहद कठिन काम है। ऐसे में समय पर छात्रों तक यूनिफॉर्म पहुंचना सुनिश्चित करने के लिए नकद सहायता देना ही एक व्यावहारिक विकल्प है।
