दिल्ली हाईकोर्ट ने ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा के खिलाफ शुरू की गई कार्रवाई को रद्द करने से इनकार कर दिया है। यह मामला दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान उनकी हिरासत के बाद शांति बनाए रखने के लिए ₹10,000 का निजी बॉन्ड भरने के नोटिस से जुड़ा है। हालांकि, कोर्ट ने विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट (SEM) को निर्देश दिया कि बोरा को सभी संबंधित दस्तावेज उपलब्ध कराए जाएं और बॉन्ड भरवाने से संबंधित कानूनी प्रावधानों पर विचार किया जाए।
जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि इस प्रक्रिया में पर्याप्त कानूनी सुरक्षा उपाय मौजूद हैं। कोर्ट ने मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया कि जांच के दौरान कोई आदेश पारित करने से पहले इन सुरक्षा उपायों का ध्यान रखा जाए।
हाईकोर्ट ने विशेष रूप से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 135 के तहत यह जांचने को कहा कि क्या किसी व्यक्ति से शुरुआती चरण में ही बॉन्ड भरवाया जा सकता है या इसकी आवश्यकता का निर्धारण जांच के दौरान किया जाना चाहिए।
विवादित नोटिस में नेहा बोरा को 19 अक्टूबर को विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के सामने पेश होकर जांच के दौरान शांति बनाए रखने के लिए ₹10,000 का निजी बॉन्ड और एक जमानतदार देने को कहा गया था।
शांति भंग की आशंका को लेकर विवाद
मामले में मुख्य विवाद यह था कि क्या पुलिस के पास BNSS की धारा 126 के तहत नेहा बोरा के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने के पर्याप्त आधार थे।
बोरा ने 17 अक्टूबर के नोटिस को चुनौती देते हुए कहा कि इसमें ऐसी कोई ठोस सामग्री नहीं बताई गई, जिससे यह साबित हो कि उनके कारण सार्वजनिक शांति भंग होने की आशंका थी। नोटिस में यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि शांति भंग होने की आशंका किस घटना या समय से जुड़ी थी।
उन्होंने नोटिस और उससे जुड़ी पूरी कार्रवाई रद्द करने के साथ अधिकारियों को उनके खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई करने से रोकने का निर्देश देने की मांग की थी।
पुलिस ने दिल्ली के अलग-अलग स्थानों पर हुए प्रदर्शनों का हवाला दिया था। इनमें मंडी हाउस में नारेबाजी, निषेधाज्ञा के बावजूद जंतर-मंतर के आसपास बार-बार प्रदर्शन करने और कनॉट प्लेस में लोगों को प्रदर्शन में शामिल होने के लिए उकसाने के आरोप शामिल थे।
यह नोटिस BNSS की धारा 126 और 130 के साथ धारा 135(3) के तहत जारी किया गया था। बोरा को यह नोटिस 18 अक्टूबर को मिला था।
शांतिपूर्ण प्रदर्शन और पुलिस की कार्रवाई पर बहस
नेहा बोरा की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने दलील दी कि राजनीतिक विरोध और शांतिपूर्ण प्रदर्शन का आह्वान अपने आप में निवारक कार्रवाई का आधार नहीं बन सकता।
उन्होंने कहा कि बोरा ने हमेशा शांतिपूर्ण विरोध और सुधारों की मांग की है। उन्होंने कभी हिंसा के लिए नहीं उकसाया। उनका यह भी तर्क था कि लोकतंत्र में सरकार बदलने की मांग करना गलत नहीं है।
उन्होंने पुलिस के उस आरोप का विरोध किया जिसमें बोरा को कनॉट प्लेस के प्रदर्शन से जोड़ा गया था। वकील के अनुसार, बोरा ने केवल मंडी हाउस में शांतिपूर्ण सभा का आह्वान किया था।
शंकरनारायणन ने 15 अक्टूबर को जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल के रूप में अधिसूचना से हटाए जाने के संबंध में बोरा की प्रेस कॉन्फ्रेंस का भी उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि अंतरिम बॉन्ड की मांग करने से पहले प्रारंभिक जांच जरूरी है। बिना ऐसी जांच के नोटिस जारी करने की प्रक्रिया पर उन्होंने सवाल उठाया।
बोरा के वकील ने यह भी बताया कि धारा 126 के तहत कार्रवाई शुरू करने के निर्देश वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने दिए थे। साथ ही, नोटिस जारी करने वाले विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट स्वयं सहायक पुलिस आयुक्त (ACP) भी हैं।
उन्होंने नोटिस में तथ्यों से जुड़ी गलतियों का मुद्दा उठाते हुए कहा कि राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए किसी अनुमति की आवश्यकता नहीं है।
दूसरी ओर, दिल्ली पुलिस की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने कार्रवाई का बचाव किया।
उन्होंने कहा कि BNSS के निवारक प्रावधानों का उद्देश्य शांति भंग होने की घटना का इंतजार करना नहीं, बल्कि संभावित स्थिति को पहले ही रोकना है।
शर्मा ने दलील दी कि धारा 126 के तहत मजिस्ट्रेट को मिली जानकारी के आधार पर शांति भंग होने की आशंका का आकलन करने का अधिकार है। इसके लिए जरूरी नहीं कि सभी तथ्य या साक्ष्य पहले से स्थापित हों।
उन्होंने यह भी कहा कि धारा 126 और 130 को एक साथ पढ़ा जाना चाहिए। इन प्रावधानों को तकनीकी आधार पर अलग-अलग करके देखने से निवारक कार्रवाई का उद्देश्य प्रभावित होगा।
पुलिस ने बोरा के घटनाक्रम संबंधी दावों का भी विरोध किया। शर्मा ने कहा कि मंडी हाउस सहित संबंधित क्षेत्र में धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा लागू थी।
उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मियों की संख्या कम पड़ गई थी और रोकने के प्रयासों के बावजूद बोरा कनॉट प्लेस की ओर बढ़ गई थीं।
16 अक्टूबर को क्या हुआ था?
यह विवाद 16 अक्टूबर के प्रदर्शन से शुरू हुआ। नेहा बोरा ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रदर्शन के सिलसिले में शाम 5 बजे मंडी हाउस में लोगों को एकत्र होने का आह्वान किया था।
याचिका में कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में राष्ट्रीय ध्वज फहराने के कार्यक्रम का भी उल्लेख किया गया था।
बोरा के अनुसार, पुलिस ने उन्हें शाम करीब 5:30 बजे मंडी हाउस से हिरासत में लिया। उनका आरोप था कि पुलिस पहले उन्हें किसी अज्ञात स्थान पर ले गई और बाद में आर.के. पुरम पुलिस स्टेशन पहुंचाया।
उन्होंने दावा किया कि उन्हें पूरी रात पुलिस स्टेशन में रखा गया और 17 अक्टूबर की सुबह 6 बजे छोड़ा गया।
इसके अगले दिन उन्हें विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट का नोटिस मिला, जिसमें पेश होने और शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरने को कहा गया था।
बोरा ने आरोप लगाया कि यह कार्रवाई शांतिपूर्ण विरोध को दबाने का प्रयास है और इससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सभा करने के अधिकार तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है।
BNSS की धारा 126, 130 और 135 का सवाल
मामले में BNSS के तीन प्रमुख प्रावधानों पर बहस हुई।
धारा 126 के तहत मजिस्ट्रेट किसी व्यक्ति के कारण शांति भंग होने की आशंका संबंधी जानकारी मिलने पर उससे यह स्पष्टीकरण मांग सकता है कि शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड क्यों न भरवाया जाए।
धारा 130 ऐसी कार्रवाई शुरू करने के लिए लिखित आदेश से संबंधित है। वहीं, धारा 135 उस जानकारी की सत्यता की जांच का प्रावधान करती है, जिसके आधार पर कार्रवाई शुरू की गई है।
धारा 135(3) के तहत मजिस्ट्रेट लिखित रूप में कारण दर्ज करके जांच के दौरान किसी व्यक्ति को बॉन्ड या जमानती बॉन्ड भरने का निर्देश दे सकता है। इस प्रावधान में निर्धारित शर्तों के अधीन बॉन्ड भरने या जांच समाप्त होने तक हिरासत में रखने की व्यवस्था भी है।
हाईकोर्ट के सामने मुख्य सवाल था कि क्या जांच किए बिना शुरुआती चरण में ही नेहा बोरा से अंतरिम बॉन्ड भरने को कहा जा सकता है।
हाईकोर्ट ने मजिस्ट्रेट को दिए निर्देश
जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने नोटिस रद्द करने से इनकार करते हुए विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट को आगे की कार्रवाई में कानूनी प्रावधानों का पालन करने का निर्देश दिया।
कोर्ट ने कहा कि नेहा बोरा को सभी संबंधित सामग्री उपलब्ध कराई जाए।
साथ ही, मजिस्ट्रेट यह विचार करें कि धारा 135 के तहत शुरुआत में ही बॉन्ड की मांग की जा सकती है या जांच के दौरान परिस्थितियों के आधार पर इसकी आवश्यकता तय की जानी चाहिए। इसमें बाद की किसी ऐसी घटना को भी ध्यान में रखा जा सकता है, जिससे शांति भंग होने की आशंका पैदा होती हो।
हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि जांच के दौरान कोई भी आदेश पारित करने से पहले कानून में उपलब्ध सुरक्षा उपायों का ध्यान रखा जाए।
नेहा बोरा की ओर से सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन के साथ एडवोकेट अभिक चिमनी, मोक्षा शर्मा, अयान दासगुप्ता समरेंद्र, प्रांजल अबरोल और गुरपाल सिंह पेश हुए।
दिल्ली पुलिस का पक्ष एडिशनल सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा और केंद्र सरकार के स्थायी वकील आशीष दीक्षित ने रखा।
