मद्रास हाईकोर्ट ने एक वैवाहिक विवाद पर फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि पति-पत्नी के बीच तलाक हो जाने का मतलब यह कतई नहीं है कि पिता अपने बच्चों के प्रति नैतिक, भावनात्मक और परवरिश से जुड़ी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ ले। अदालत ने कहा कि वैवाहिक संबंध समाप्त होने के बाद भी एक पिता का यह कर्तव्य बना रहता है कि वह बच्चों की देखभाल करे, उन्हें स्नेह और मार्गदर्शन दे तथा उनकी भावनात्मक सुरक्षा सुनिश्चित करे।
जस्टिस जी. आर. स्वामीनाथन और जस्टिस एम. डी. सुमति की खंडपीठ ने 8 अक्टूबर को यह आदेश दिया। पीठ ने पारिवारिक अदालत (फैमिली कोर्ट) के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें पत्नी को तलाक की डिक्री दी गई थी और पति की दांपत्य अधिकारों की बहाली (रेस्टीट्यूशन ऑफ कॉन्जुगल राइट्स) से जुड़ी याचिका खारिज कर दी गई थी। पति ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
बच्चों की खातिर टूटे रिश्ते में जबरन रहने को मजबूर नहीं किया जा सकता
सुनवाई के दौरान पति ने दलील दी थी कि दोनों पक्षों के दो बच्चों के हित और भविष्य को ध्यान में रखते हुए शादी को बरकरार रखा जाना चाहिए। इस पर खंडपीठ ने कहा कि वैवाहिक मामलों में बच्चों की भलाई निश्चित रूप से एक बेहद अहम पहलू है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं निकाला जा सकता कि पक्षों को किसी ऐसे रिश्ते में जबरन बने रहने के लिए बाध्य किया जाए जो व्यावहारिक रूप से पूरी तरह खत्म हो चुका हो।
पीठ ने रेखांकित किया कि कानूनी रूप से विवाह भले ही समाप्त हो जाए, लेकिन बच्चों के प्रति पिता का दायित्व केवल आर्थिक मदद तक सीमित नहीं होता। बच्चों को सिर्फ पैसों की नहीं, बल्कि इस भरोसे की भी जरूरत होती है कि माता-पिता के अलग होने के बावजूद उनका पिता हर हाल में उनके साथ मजबूती से खड़ा है। अदालत ने टिप्पणी की कि दोनों अभिभावकों पर यह लगातार जिम्मेदारी बनी रहती है कि वे बच्चों की उचित देखभाल और भावनात्मक सहयोग सुनिश्चित करें।
एकतरफा सुलह की पेशकश से दोबारा नहीं जुड़ सकते बिखरे रिश्ते
इस मामले में दोनों पक्षों का विवाह वर्ष 2005 में हुआ था और उनके दो बच्चे हैं। पत्नी ने पति पर गंभीर मानसिक क्रूरता, उत्पीड़न और शारीरिक हिंसा के आरोप लगाते हुए तलाक की अर्जी दाखिल की थी। महिला का कहना था कि पति उसके चरित्र पर संदेह करता था, उसे नुकसान पहुंचाने की कोशिश करता था और जान के खतरे के चलते उसे पुलिस की शरण भी लेनी पड़ी थी।
दूसरी तरफ, पति ने इन आरोपों से इनकार करते हुए उल्टे पत्नी पर अवैध संबंधों के आरोप लगाए और दावा किया कि वह 2019 में ससुराल छोड़कर चली गई थी। पति का कहना था कि वह बच्चों के भविष्य के लिए पत्नी को माफ करने और साथ रहने को तैयार है। उसने दावा किया कि पारिवारिक अदालत ने क्रूरता के आरोपों को ठीक से परखे बिना फैसला सुनाया।
हाईकोर्ट ने पति की इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि जब रिश्ते की बुनियादी नींव ही पूरी तरह दरक चुकी हो, तो सिर्फ एक पक्ष की साथ रहने की इच्छा से वैवाहिक जीवन दोबारा पटरी पर नहीं लौट सकता। दोनों पक्षों द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों, पुलिस शिकायतों और मुकदमों के दौर को देखते हुए अदालत ने माना कि अब शांतिपूर्ण दांपत्य जीवन की कोई गुंजाइश नहीं बची है। अदालत ने दोहराया कि बच्चों की भलाई का तर्क देकर पारिवारिक अदालत के तलाक के आदेश में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता और पति की अपीलें खारिज कर दीं।

