भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्य कांत ने सोमवार को स्पष्ट किया कि किसी भी मानवाधिकार संस्था की वास्तविक सफलता केवल उसके द्वारा निपटाए गए मुकदमों की संख्या से तय नहीं होती, बल्कि इस बात से आंकी जाती है कि वह समाज के सबसे कमजोर और बेबस लोगों की आवाज बन पा रही है या नहीं। उन्होंने दो टूक कहा कि जो अधिकार केवल साधन-संपन्न लोगों के काम आए और वंचितों को न्याय दिलाने में विफल रहे, वह वास्तविक अर्थों में अधिकार नहीं बल्कि ‘बेहतर ब्रांडिंग वाला विशेषाधिकार’ मात्र है।
सीजेआई राष्ट्रीय राजधानी के विज्ञान भवन में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के 33वें स्थापना दिवस समारोह को संबोधित कर रहे थे। इस मौके पर एनएचआरसी के अध्यक्ष और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज वी. रामासुब्रमण्यन सहित कई गणमान्य व्यक्ति मौजूद रहे। संसद द्वारा तीन दशक से भी अधिक समय पहले स्थापित इस आयोग को सीजेआई ने संवैधानिक वादों का प्रमुख संरक्षक और पीड़ितों का ‘भरोसेमंद ठिकाना’ बताया।
नैतिक साख बैंक बैलेंस की तरह, जवाबदेही तय करना जरूरी
सीजेआई सूर्य कांत ने कहा कि मानवाधिकार आयोग ऐसे दायरों तक पहुंचता है जहां अदालतें आसानी से नहीं पहुंच सकतीं। यह स्वतः संज्ञान (सुओ मोटो) लेकर कार्रवाई करने में सक्षम है और उन लोगों की पीड़ा सुनता है जो अपनी आवाज उठाने में असमर्थ हैं। उन्होंने रेखांकित किया कि किसी मानवाधिकार संस्था का प्रभाव आदेशों की बाध्यकारी शक्ति से नहीं, बल्कि समय के साथ अर्जित उसकी नैतिक साख से तय होता है।
इस नैतिक अधिकार की तुलना बैंक बैलेंस से करते हुए उन्होंने कहा कि इसे निष्पक्ष जांच, त्वरित हस्तक्षेप और पारदर्शी रिपोर्टिंग के जरिए बूंद-बूंद करके धीरे-धीरे बनाया जाता है, लेकिन यह बहुत तेजी से खत्म भी हो सकता है।
हिरासत में प्रताड़ना या मौत, बंधुआ मजदूरी, सिलिकोसिस जैसी औद्योगिक बीमारियों और हाशिए के तबकों के अधिकारों के मामलों में आयोग की भूमिका का उल्लेख करते हुए सीजेआई ने कहा कि मानवाधिकार संरक्षण केवल उल्लंघन की पहचान करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि संस्थागत कार्रवाई का उद्देश्य जवाबदेही तय करना, पीड़ितों को ठोस राहत दिलाना और व्यवस्थागत सुधार लाकर पुनरावृत्ति रोकना होना चाहिए।
आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि 33 वर्षों के सफर में एनएचआरसी ने 24 लाख से अधिक मामले दर्ज किए और 23 लाख से ज्यादा शिकायतों का निस्तारण किया, जो 98 प्रतिशत से अधिक की निस्तारण दर को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि यह केवल संस्थागत कामकाज की संख्या नहीं है, बल्कि यह उन अनगिनत मौकों का प्रमाण है जब गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों को सार्वजनिक पटल पर लाया गया।
अनुच्छेद 21 का दायरा और गरिमापूर्ण जीवन
सीजेआई ने संविधान के अनुच्छेद 21 के निरंतर विकसित होते स्वरूप की चर्चा करते हुए कहा कि यह केवल जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के हनन से सुरक्षा देने वाला प्रावधान नहीं रहा, बल्कि गरिमापूर्ण जीवन की समग्र गारंटी बन चुका है। न्यायिक व्याख्याओं के जरिए अब स्वास्थ्य, भोजन, आश्रय, आजीविका और स्वच्छ पर्यावरण के अधिकार को मानवीय गरिमा के अनिवार्य हिस्से के रूप में मान्यता मिल चुकी है।
उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के पर्यावरण न्यायशास्त्र ने यह स्पष्ट किया है कि जीवन के अधिकार में प्रदूषण मुक्त पानी और स्वच्छ हवा का अधिकार स्वतः शामिल है। ऐसे में राज्य का दायित्व केवल नुकसान पहुंचाने से बचना नहीं है, बल्कि ऐसे अनुकूल हालात तैयार करना भी है जिससे नागरिक सम्मानपूर्वक जीवन जी सकें।
सूखे पाइप पानी नहीं कहलाते, सुरक्षित आपूर्ति वर्तमान और भविष्य की जिम्मेदारी
स्थापना दिवस के साथ आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन ‘जल ही जीवन का अमृत: जल के अधिकार के जरिए मानवीय गरिमा को बढ़ावा’ का संदर्भ देते हुए सीजेआई ने कहा कि पानी की उपलब्धता सीधे तौर पर मानवीय गरिमा से जुड़ी है। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में नल कनेक्शन पहुंचाने के प्रयासों की सराहना की, लेकिन साथ ही आगाह किया कि बुनियादी ढांचा खड़ा कर देना ही वास्तविक पहुंच नहीं है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि सूखा पाइप अपने वादे को पूरा नहीं करता और आर्सेनिक या फ्लोराइड से दूषित पानी कोई नागरिक सेवा नहीं, बल्कि जीवन और स्वास्थ्य के लिए सीधा खतरा है।
सीजेआई ने जल सुरक्षा को एक साझा संस्थागत जिम्मेदारी बताया। उन्होंने कहा कि सरकार को जल वितरण तंत्र का निर्माण और रखरखाव करना होगा, संवैधानिक अधिकारों के हनन पर अदालतों को दखल देना होगा, और मानवाधिकार आयोगों को व्यवस्थागत खामियों की जांच कर अनदेखे मुद्दों को सामने लाना होगा। उन्होंने चेतावनी दी कि भूजल का अंधाधुंध दोहन और नदियों का प्रदूषण आने वाली पीढ़ियों पर असहनीय बोझ डाल रहा है, इसलिए स्वच्छ जल के अधिकार को तात्कालिक अधिकार के साथ-साथ भविष्य के प्रति जिम्मेदारी के रूप में देखा जाना चाहिए।
डिजिटलीकरण और आधुनिक तकनीक की सराहना
समारोह के अंत में सीजेआई ने आयोग के आधुनिकीकरण की दिशा में उठाए गए कदमों की सराहना की। उन्होंने ‘एनएचआरसी इंडिया’ मोबाइल ऐप्लिकेशन की शुरुआत और ऐतिहासिक अभिलेखों के डिजिटलीकरण का स्वागत करते हुए विश्वास जताया कि आयोग न्याय के मार्ग को प्रशस्त करते हुए अपनी पहुंच का निरंतर विस्तार करेगा।

