सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि जब किसी टेंडर में बिड सिक्योरिटी (धरोहर राशि) का भुगतान ऑनलाइन ई-पेमेंट गेटवे के जरिए सीधे खाते में कर दिया गया हो, तब भी उसकी भौतिक “मूल प्रति” (ओरिजिनल रसीद) जमा न करने के आधार पर बोली निरस्त करना पूरी तरह से मनमाना और एक असंभव अनुपालन की मांग करना है। जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने पटना हाईकोर्ट की खंडपीठ के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसने टेंडर निरस्त करने के निर्णय को सही ठहराया था। शीर्ष अदालत ने बोलीदाता के पक्ष में फैसला सुनाते हुए निर्देश दिया कि उसकी वित्तीय बोली (फाइनेंशियल बिड) को खोलकर अन्य बोलियों के साथ उसका मूल्यांकन किया जाए।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला रेल मंत्रालय द्वारा शुरू की गई एक ईपीसी (इंजीनियरिंग प्रोक्योरमेंट एंड कंस्ट्रक्शन) टेंडर प्रक्रिया से जुड़ा है। यह टेंडर “बिक्रमशिला-कटारिया नई रेल लाइन लिंक परियोजना” के तहत गाइड बंड, लॉन्चिंग एप्रन और नदी सुरक्षा कार्यों के निर्माण के लिए जारी किया गया था (पैकेज संख्या: ECR-CAO-C-S-EPC-05-25-26, दिनांक 06.01.2026)।
हरदेव कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड ने इस परियोजना के लिए अपनी बोली जमा की थी। हालांकि, टेंडर आमंत्रित करने वाले प्राधिकारी ने रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (आरएफपी) के क्लॉज 2.20.6(ii) का हवाला देते हुए तकनीकी मूल्यांकन के स्तर पर ही कंपनी की बोली खारिज कर दी। प्राधिकारी का कहना था कि कंपनी ने बिड सिक्योरिटी की भौतिक मूल प्रति जमा नहीं की।
कंपनी ने बिड सिक्योरिटी की पूरी राशि प्राधिकारी के ई-पेमेंट गेटवे के जरिए सीधे उनके खाते में ट्रांसफर की थी और उससे उत्पन्न डिजिटल पेमेंट रसीद को स्कैन करके ई-प्रोक्योरमेंट पोर्टल पर अपलोड कर दिया था। जब पटना हाईकोर्ट की खंडपीठ ने इस निरस्तीकरण को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी, तो कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता कंपनी की ओर से वरिष्ठ वकील ए. के. डे ने दलील दी कि बिड खारिज करने का एकमात्र आधार बिड सिक्योरिटी की मूल रसीद जमा न करना था। उन्होंने अदालत को बताया कि राशि सीधे विभाग के खाते में ई-पेमेंट के जरिए जमा हो चुकी थी और डिजिटल रसीद भी पोर्टल पर अपलोड थी। इसके अलावा, वकील ने यह भी रेखांकित किया कि अपीलकर्ता की वित्तीय बोली सफल घोषित किए गए तीसरे प्रतिवादी की तुलना में काफी कम थी, जिससे सरकारी खजाने को नुकसान से बचाया जा सकता था।
रेल मंत्रालय की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) कनकमेडाला रविंद्र कुमार ने तर्क दिया कि टेंडर के क्लॉज 2.20.6(ii) के तहत बिड सिक्योरिटी के मूल दस्तावेज को भौतिक रूप से जमा कराना अनिवार्य था, इसलिए बोली निरस्त करने का फैसला नियमों के अनुसार था। एएसजी ने यह भी कहा कि चूंकि तकनीकी स्तर पर ही बोली खारिज हो गई थी, इसलिए कंपनी की वित्तीय बोली कभी खोली ही नहीं गई, ऐसे में दरों की तुलना करने का कोई सवाल ही नहीं उठता।
सफल बोलीदाता (तीसरे प्रतिवादी) की वकील नीना आर. नरीमन ने प्रकाश डामरीकरण एवं टोल हाईवे (इंडिया) लिमिटेड बनाम मनदीप एंटरप्राइजेज एवं अन्य (2026) 4 SCC 310 मामले का हवाला दिया। उन्होंने तर्क दिया कि टेंडर जारी करने वाला विभाग ही अपनी आवश्यकताओं और शर्तों को सबसे बेहतर समझता है। संवैधानिक अदालतों को विभाग की व्याख्या का सम्मान करना चाहिए और टेंडर में मूल दस्तावेज जमा करने की शर्त पर कोई ढिलाई नहीं दी जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और कानूनी व्याख्या
पीठ ने आरएफपी के क्लॉज 2.20.6 का विस्तार से परीक्षण किया। इस नियम के तहत बिड सिक्योरिटी पांच माध्यमों से दी जा सकती है:
- बैंक गारंटी
- अकाउंट पेयी डिमांड ड्राफ्ट
- फिक्स्ड डिपॉजिट रसीद (एफडीआर)
- बैंकर्स चेक
- प्राधिकारी का ई-पेमेंट गेटवे
अदालत ने स्पष्ट किया कि बैंक गारंटी, डिमांड ड्राफ्ट या बैंकर्स चेक जैसे वित्तीय साधनों में जब तक मूल भौतिक दस्तावेज विभाग के हाथ में न आ जाए, तब तक वह उस पर अपना अधिकार या लियन (lien) लागू नहीं कर सकता। इसलिए ऐसे मामलों में भौतिक मूल प्रति सौंपना आवश्यक होता है। लेकिन ई-पेमेंट के मामले में राशि पहले ही सीधे विभाग के बैंक खाते में जमा हो जाती है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
“जहां तक अपीलकर्ता का संबंध है, राशि प्रतिवादियों के खाते में जमा करा दी गई थी और किए गए ई-पेमेंट के संबंध में आगे कुछ भी प्रस्तुत करने की आवश्यकता नहीं थी, विशेष रूप से तब जब डिजिटल भुगतान रसीद पहले ही बिड दस्तावेज के साथ अपलोड कर दी गई थी।”
पीठ ने प्रकाश डामरीकरण एवं टोल हाईवे (इंडिया) लिमिटेड के फैसले पर विचार करते हुए स्पष्ट किया कि उस मामले में एक बोलीदाता ने कुल 100.65 करोड़ रुपये की जगह गलती से एक दिन की दर 9,72,999 रुपये भर दी थी और टेंडर की शर्तों को दरकिनार करना चाहा था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हालांकि अदालतें आमतौर पर टेंडर की शर्तों की व्याख्या में दखल नहीं देती हैं, लेकिन यदि व्याख्या दुर्भावनापूर्ण या पूरी तरह से विकृत (perverse) हो, तो अदालत का हस्तक्षेप अनिवार्य हो जाता है।
वर्तमान मामले में अदालत ने टिप्पणी की:
“हम इस बात से पूरी तरह संतुष्ट हैं कि यहां स्पष्ट रूप से मनमानापन (विकृति) है; जहां टेंडर दस्तावेज की मांग के अनुसार ई-पेमेंट किया गया था, जिसकी डिजिटल रसीद स्कैन करके अपलोड की गई थी, उसे सिर्फ इसलिए खारिज कर दिया गया क्योंकि मूल प्रति प्रस्तुत नहीं की गई; जो कि अपने आप में एक असंभव बात है।”
पीठ ने आगे जोड़ा:
“दस्तावेज के शब्दों का कठोरता से पालन करना स्वीकार्य नहीं हो सकता, खासकर तब जब उसका पालन करना पूरी तरह असंभव हो। जैसा कि हमने पाया, अन्य सभी रूपों में दी गई बिड सिक्योरिटी तब तक लागू नहीं की जा सकती जब तक कि मूल प्रति प्रतिवादियों के पास न आ जाए। हालांकि, ई-पेमेंट के मामले में धन पहले ही प्रतिवादियों के खाते में ट्रांसफर हो चुका होता है और उस पर उनका पूरा नियंत्रण होता है।”
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय और निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के आदेश को निरस्त कर दिया।
चूंकि बोली खारिज होने के बाद पोर्टल द्वारा ई-पेमेंट की राशि अपीलकर्ता को वापस (रिफंड) कर दी गई थी, इसलिए अदालत ने प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए निम्नलिखित निर्देश दिए:
- प्रतिवादी संख्या 1 और 2 (रेलवे प्रशासन) आज से दो सप्ताह के भीतर अपीलकर्ता के लिए ई-पेमेंट की सुविधा उपलब्ध कराएंगे।
- यदि कोई तकनीकी समस्या आती है, तो अपीलकर्ता को अगले दो सप्ताह के भीतर अनुमेय किसी अन्य माध्यम से बिड सिक्योरिटी की राशि जमा करने का अवसर दिया जाएगा।
- बिड सिक्योरिटी जमा होते ही अपीलकर्ता की वित्तीय बोली खोली जाएगी और अन्य बोलियों के साथ उसकी तुलना कर टेंडर की निर्धारित शर्तों के अनुसार प्रक्रिया को अंतिम रूप दिया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने इन निर्देशों के साथ अपील स्वीकार कर ली।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: हरदेव कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य
वाद संख्या: एसएलपी (सी) संख्या 25855/2026
पीठ: जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन
निर्णय की तिथि: 12 अक्टूबर 2026

