पीड़िता का बयान अंतिम सत्य नहीं, विश्वसनीयता की कसौटी पर परखना जरूरी: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1983 के मामले में तीन लोगों को किया बरी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि पीड़िता के बयान को हर परिस्थिति में अंतिम सत्य (गॉस्पेल ट्रुथ) नहीं माना जा सकता, खासकर तब जब उसमें गंभीर अंतर्विरोध हों और एफआईआर दर्ज कराने में बिना किसी उचित कारण के लंबा विलंब हुआ हो। जस्टिस अब्दुल शाहिद की एकल पीठ ने करीब चार दशक पुराने कथित सामूहिक दुष्कर्म के मामले में तीन लोगों की दोषसिद्धि और सजा को रद्द करते हुए उन्हें बरी कर दिया। हाईकोर्ट ने फतेहपुर के सप्तम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा 22 अप्रैल 1985 को पारित उस फैसले के खिलाफ दाखिल अपील स्वीकार कर ली, जिसमें आरोपियों को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 147 के तहत एक वर्ष और धारा 376 के तहत 10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी।

मामले की पृष्ठभूमि

मामले की शुरुआत 23 अक्टूबर 1983 को एक पीड़िता द्वारा दी गई लिखित शिकायत से हुई थी। शिकायत के अनुसार, घटना 17 अक्टूबर 1983 की रात करीब 11:00 बजे की बताई गई, जब शिकायतकर्ता अपनी ननद के साथ छप्पर के नीचे सो रही थी। आरोप लगाया गया कि चार नामजद व्यक्ति—जिनमें से एक के पास बंदूक थी—दो अज्ञात लोगों के साथ जबरन घर में घुस आए। उन्होंने दोनों महिलाओं के कपड़े उतारकर उनके साथ दुष्कर्म किया और विरोध करने पर परिजनों को बंदूक दिखाकर जान से मारने की धमकी दी।

इस घटना के संबंध में छह दिन बाद यानी 23 अक्टूबर 1983 को फतेहपुर के बिंदकी थाने में केस क्राइम नंबर 263/1983 के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी। पुलिस जांच और ट्रायल के बाद निचली अदालत ने चारों आरोपियों को दोषी ठहराया था। हाईकोर्ट में अपील लंबित रहने के दौरान पहले अपीलार्थी का निधन हो गया, जिसके बाद 16 मार्च 2026 को उनके खिलाफ अपील की कार्यवाही समाप्त (abate) कर दी गई। इसके बाद यह मामला शेष तीन जीवित अपीलार्थियों तक ही सीमित रहा।

पक्षों की दलीलें

अपीलार्थियों के वकील ने दलील दी कि कथित घटना के छह दिन बाद बिना किसी संतोषजनक या उचित स्पष्टीकरण के एफआईआर दर्ज कराई गई। बचाव पक्ष ने रेखांकित किया कि घटना के समय पीड़ितों द्वारा पहने गए फटे या खून के धब्बे वाले कपड़े न तो बरामद किए गए और न ही अदालत में पेश किए गए। इसके अलावा मेडिकल जांच में शरीर पर अंदरूनी या बाहरी चोट का कोई निशान नहीं मिला और दुष्कर्म की कोई चिकित्सकीय पुष्टि नहीं हुई। यह भी कहा गया कि पीड़िता के पति और ससुर मौके पर मौजूद होने के बावजूद अभियोजन पक्ष के गवाह के रूप में पेश नहीं किए गए और पुरानी रंजिश के चलते झूठा मुकदमा दर्ज कराया गया था।

वहीं दूसरी ओर, राज्य सरकार की तरफ से पेश अपर शासकीय अधिवक्ता (एजीए) ने अपील का विरोध करते हुए कहा कि दोनों पीड़िताओं ने अभियोजन के कथानक का पूरा समर्थन किया है। उन्होंने दलील दी कि चश्मदीद गवाहों की गवाही मेडिकल साक्ष्यों पर भारी पड़ती है। राज्य की ओर से कहा गया कि अभियोजन पक्ष ने बिना किसी उचित संदेह के अपना मामला साबित किया है और निचली अदालत के निष्कर्षों में कोई त्रुटि नहीं है, इसलिए दोषसिद्धि बरकरार रखी जानी चाहिए।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण

पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि “अभियोजन पक्ष का मामला तात्विक अंतर्विरोधों, एफआईआर दर्ज कराने में अनुचित देरी, पीड़िताओं के बयानों में किए गए महत्वपूर्ण सुधारों और विश्वसनीय पुष्टिपरक साक्ष्यों के अभाव से ग्रस्त है।”

एफआईआर दर्ज कराने में छह दिन की देरी पर विचार करते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि “एफआईआर दर्ज कराने में महज देरी अपने आप में अभियोजन के मामले के लिए घातक नहीं होती, विशेष रूप से यौन अपराधों के मामलों में, जहां आसपास की परिस्थितियां देरी को स्पष्ट कर सकती हैं। हालांकि, जहां देरी अस्पष्ट रह जाती है या दिया गया स्पष्टीकरण रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों के आलोक में संतोषजनक नहीं पाया जाता, वहां यह अभियोजन मामले की विश्वसनीयता का आकलन करने में एक प्रासंगिक परिस्थिति बन जाती है।”

अदालत ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के बाल्कू ओराम बनाम ओडिशा राज्य (जिसमें राम दास एवं अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य पर भरोसा किया गया था), रवि कुमार सिंह मल्होत्रा बनाम मध्य प्रदेश राज्य, और किशन चंद (मृतक) विधिक प्रतिनिधि के माध्यम से बनाम गुरपाल सिंह एवं अन्य के फैसलों का हवाला दिया। अदालत ने कहा कि जानबूझकर की गई अनुचित देरी जांच की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करती है और कहानी गढ़ने की गुंजाइश बनाती है। हालांकि पीड़िताओं का दावा था कि आरोपियों के डर और रास्ता रोके जाने के कारण वे थाने नहीं जा सकीं, लेकिन पहली पीड़िता (पीडब्ल्यू-1) ने जिरह में स्वीकार किया कि घटना की अगली सुबह ही वह धमकी मिलने की शिकायत लेकर थाने गई थी, फिर भी उसने यौन उत्पीड़न की बात नहीं बताई थी।

हाईकोर्ट ने लिखित शिकायत और बयानों के बीच कई गंभीर विसंगतियों को भी रेखांकित किया:

  • ट्रायल के दौरान आरोप लगाया गया कि दो अन्य व्यक्तियों ने परिजनों को पकड़ रखा था, जबकि मूल लिखित शिकायत में उनके नाम नहीं थे। जांच अधिकारी (पीडब्ल्यू-5) ने भी पुष्टि की कि विवेचना के दौरान पीड़िता ने इन दोनों के नाम नहीं बताए थे।
  • अदालत में पीड़िताओं ने कहा कि उनके कपड़े फाड़े गए थे, जबकि मूल शिकायत में केवल कपड़े उतारे जाने का जिक्र था। इसके अतिरिक्त कोई भी फटा या खून से सना कपड़ा न तो पुलिस को दिया गया और न ही जब्त हुआ।
  • 23 अक्टूबर 1983 को हुई मेडिकल जांच में किसी भी पीड़िता के शरीर पर अंदरूनी या बाहरी चोट नहीं पाई गई, हाइमन पुराना फटा हुआ था और शुक्राणु (स्पर्मेटोजोआ) की मौजूदगी नहीं मिली। डॉक्टरों ने राय दी थी कि दुष्कर्म के संबंध में कोई निश्चित राय नहीं दी जा सकती। यह तथ्य पीड़िता के उस दावे के विपरीत था जिसमें उसने अत्यधिक रक्तस्राव और चोट की बात कही थी।
  • दोनों पीड़िताओं द्वारा बताए गए घटनाक्रम और क्रमवार कृत्य के विवरण में एक से डेढ़ घंटे की कथित अवधि को लेकर भारी विरोधाभास था।
  • स्वतंत्र गवाह (पीडब्ल्यू-3) ने स्वीकार किया कि वह दुष्कर्म का चश्मदीद नहीं था और उसने केवल लोगों को बाहर निकलते देखा था। वहीं अन्य गवाह (पीडब्ल्यू-4) मुकर गया (होस्टाइल हो गया) और उसने घटना की किसी भी जानकारी से इनकार किया।
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सुप्रीम कोर्ट के कृष्णा कुमार मलिक बनाम हरियाणा राज्य फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि गंभीर कमियों, अंतर्विरोधों और मेडिकल पुष्टि के अभाव में किसी को दोषी ठहराना सुरक्षित नहीं है। अदालत ने शरद बिरधी चंद सारदा बनाम महाराष्ट्र राज्य के सिद्धांत का भी उल्लेख किया कि अभियोजन पक्ष को अपने पैरों पर खड़ा होना पड़ता है और वह बचाव पक्ष की कमजोरियों से बल प्राप्त नहीं कर सकता। इसके अलावा अदालत ने बाबू राम एवं अन्य बनाम पंजाब राज्य (संदेह से परे साबित करने का दायित्व), बलदेव सिंह बनाम पंजाब राज्य (अविश्वसनीय गवाहों पर दोषसिद्धि न होना) और कुलदीप यादव बनाम बिहार राज्य (आपसी विरोधाभासी बयानों की स्थिति) का भी संदर्भ दिया।

कानूनी स्थिति स्पष्ट करते हुए हाईकोर्ट ने माना कि “यह स्थापित सिद्धांत है कि पीड़िता की गवाही, यदि विश्वसनीय, भरोसेमंद और उच्च कोटि की पाई जाती है, तो वह बिना किसी स्वतंत्र पुष्टि के भी दोषसिद्धि का एकमात्र आधार बन सकती है।” इसके साथ ही पीठ ने जोर देकर कहा:

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“यह कानून का स्थापित प्रस्ताव है कि पीड़िता का बयान घायल गवाह की तुलना में उच्च पायदान पर होता है, फिर भी, पीड़िता का बयान कोई निरपेक्ष, निर्विवाद तथ्य या अंतिम सत्य नहीं है; इसकी वास्तविकता, सच्चाई और सत्यनिष्ठा की जांच प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के मद्देनजर विश्वसनीयता, प्रामाणिकता और संभाव्यता की कसौटी पर की जानी चाहिए।”

अदालत ने आगे कहा कि “एफआईआर दर्ज कराने में जानबूझकर देरी की गई। आरोपियों और पीड़िताओं के परिवार के बीच पुरानी रंजिश स्वीकार की गई है, जो कि दोधारी तलवार होती है। गवाहों/दोनों पीड़िताओं की विश्वसनीयता सत्य, प्रशंसनीय और भरोसेमंद नहीं पाई गई।”

कोर्ट का फैसला

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि निचली अदालत अभियोजन पक्ष के बयानों में मौजूद तात्विक अंतर्विरोधों, चूकों और कमियों के समग्र प्रभाव का सही मूल्यांकन करने में विफल रही। परिणामस्वरूप अभियोजन पक्ष तीनों जीवित अपीलार्थियों के खिलाफ संदेह से परे अपराध साबित नहीं कर सका।

हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए तीनों जीवित अपीलार्थियों की दोषसिद्धि और सजा को पूरी तरह रद्द कर दिया और उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया। अदालत ने उनके जमानत मुचलके निरस्त कर दिए और जमानतियों को दायित्वमुक्त कर दिया, जो कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 437-ए के प्रावधानों के अनुपालन के अधीन रहेगा।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: मोहम्मद अनीस खान एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 1118/1985
पीठ: जस्टिस अब्दुल शाहिद
निर्णय की तिथि: 12 अक्टूबर 2026

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