बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन के लिए विशिष्ट यूजीसी नियम सामान्य कॉमर्स फैकल्टी के मानदंडों पर प्रभावी होंगे: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लखनऊ विश्वविद्यालय के दो एसोसिएट प्रोफेसरों की नियुक्तियां बहाल कीं

लखनऊ: सामान्य संकाय (फैकल्टी) वर्गीकरण के मुकाबले विषय-विशिष्ट नियामक नियमों की प्रधानता को स्पष्ट करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय ने लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलाधिपति (चांसलर) के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसके तहत बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन विभाग में दो एसोसिएट प्रोफेसरों की नियुक्तियां रद्द कर दी गई थीं। डिवीजन बेंच ने माना कि विश्वविद्यालय के प्रथम परिनियम (फर्स्ट स्टैच्यूट्स) के तहत यूजीसी विनियम, 2010 के अनुरूप शामिल किया गया विशिष्ट पात्रता नियम स्टैच्यूट 11.03.04(G) सामान्य कॉमर्स फैकल्टी के मानदंडों पर प्रभावी होगा। इसके साथ ही अदालत ने दोनों चयनित शिक्षकों को उनकी सेवा से जुड़े सभी परिणामी लाभ प्रदान करने का निर्देश दिया।

विवाद की पृष्ठभूमि

यह विवाद 10 अगस्त 2015 को लखनऊ विश्वविद्यालय द्वारा जारी भर्ती विज्ञापन संख्या R-45/2015 से शुरू हुआ था। इस विज्ञापन के जरिए बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन विभाग में विश्वविद्यालय के फर्स्ट स्टैच्यूट्स के तहत निर्धारित अर्हताओं के आधार पर एसोसिएट प्रोफेसर के पदों के लिए आवेदन आमंत्रित किए गए थे। डॉ. हिमांशु मोहन और डॉ. संगीता साहू ने इन पदों के लिए आवेदन किया। 15 जनवरी 2016 को उनका साक्षात्कार हुआ और इसके बाद कार्यपरिषद (एग्जीक्यूटिव काउंसिल) के अनुमोदन से उनका चयन कर लिया गया। 11 फरवरी 2016 को नियुक्ति पत्र जारी किए गए और दोनों ने 18 फरवरी 2016 को पदभार ग्रहण कर लिया।

चयन प्रक्रिया में असफल रहीं एक अभ्यर्थी, डॉ. रितु नारंग ने उत्तर प्रदेश राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम, 1973 की धारा 68 के तहत कुलाधिपति के समक्ष एक विलंबित प्रत्यावेदन (रिप्रजेंटेशन) प्रस्तुत किया। उन्होंने तर्क दिया कि चूंकि स्टैच्यूट 7.07 के अनुसार बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन विभाग कॉमर्स फैकल्टी के अंतर्गत आता है, इसलिए इस चयन पर स्टैच्यूट 11.03.01 (सामान्य पात्रता मानदंड) के साथ पठित स्टैच्यूट 11.03.04(A) लागू होना चाहिए था। उनका कहना था कि चयनित अभ्यर्थियों ने शोधार्थियों और पीएचडी छात्रों को निर्देशित (गाइड) करने का दस्तावेजी प्रमाण जमा नहीं किया था, इसलिए उनका चयन अमान्य है।

कुलाधिपति ने 27 नवंबर 2017 को विलंब माफ करते हुए इस आपत्ति को स्वीकार कर लिया और माना कि दोनों चयनित शिक्षक स्टैच्यूट 11.03.04(A) सहपठित 11.03.01 के तहत निर्धारित आवश्यक न्यूनतम अर्हता पूरी नहीं करते थे। इसके आधार पर कुलाधिपति ने दोनों नियुक्तियों को रद्द करने का आदेश दे दिया। इसके बाद दोनों शिक्षकों ने कुलाधिपति के इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता संदीप दीक्षित ने तर्क दिया कि 1973 के अधिनियम की धारा 50(6) के तहत जारी राज्य सरकार के 3 दिसंबर 2013 के आदेश के अनुपालन में विश्वविद्यालय के फर्स्ट स्टैच्यूट्स में यूजीसी विनियम, 2010 को स्टैच्यूट 11.03.04(G) के रूप में शामिल किया गया था। यह दलील दी गई कि स्टैच्यूट 11.03.04(G) एक विशिष्ट प्रावधान है जो विशेष रूप से मैनेजमेंट और बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में नियुक्तियों को नियंत्रित करता है, इसलिए यह सामान्य पात्रता नियमों पर प्रभावी होगा। याचिकाकर्ताओं के वकील ने जोर दिया कि दोनों अभ्यर्थी स्टैच्यूट 11.03.04(G) के तहत सभी आवश्यक योग्यताएं पूरी करते थे, चयन समिति ने इसी विशिष्ट प्रावधान के तहत उनका मूल्यांकन किया था और उनसे कभी भी शोध निर्देशन से संबंधित प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने की मांग नहीं की गई थी—हालांकि वे यह योग्यता भी रखते थे।

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दूसरी ओर, प्रतिवादियों के वकील ने कुलाधिपति के आदेश का समर्थन करते हुए दलील दी कि बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन विभाग कॉमर्स फैकल्टी के तहत आता है, इसलिए विश्वविद्यालय को स्टैच्यूट 11.03.04(A) सहपठित 11.03.01 के अंतर्गत सामान्य कॉमर्स अर्हताओं को ही सख्ती से लागू करना चाहिए था। उन्होंने इस कानूनी सिद्धांत का हवाला दिया कि यदि कानून किसी कार्य को एक विशेष तरीके से करने का निर्देश देता है, तो उसे उसी तरीके से किया जाना चाहिए अन्यथा नहीं। प्रतिवादियों का कहना था कि निर्धारित प्रक्रिया से किसी भी प्रकार का भटकाव नियुक्तियों को अवैध बना देता है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

फर्स्ट स्टैच्यूट्स के अध्याय XI का परीक्षण करते हुए हाईकोर्ट की पीठ ने रेखांकित किया कि स्टैच्यूट 11.03.01 में सामान्य पात्रता मानदंड दिए गए हैं, जबकि स्टैच्यूट 11.03.04(G) को 3 दिसंबर 2013 को यूजीसी विनियम, 2010 के रेगुलेशन 4.4.5 को लागू करने के लिए जोड़ा गया था, जो विशेष रूप से मैनेजमेंट और बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन के शिक्षण संकाय से संबंधित है।

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प्रावधानों के टकराव पर विचार करते हुए अदालत ने स्पष्ट किया:

“हमारा यह विचार है कि स्टैच्यूट 11.03.04(G) को विनियम, 2010 को अपनाने के परिणामस्वरूप ‘फर्स्ट स्टैच्यूट्स’ में शामिल किया गया था और यह मैनेजमेंट/बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन पाठ्यक्रमों में शिक्षकों की नियुक्ति के लिए विशिष्ट पात्रता अर्हताएं निर्धारित करता है। एक विशिष्ट प्रावधान होने के नाते, यह लखनऊ विश्वविद्यालय के ‘फर्स्ट स्टैच्यूट्स’ के स्टैच्यूट 11.03.01 के तहत निर्धारित सामान्य पात्रता मानदंडों पर प्रभावी होगा।”

अदालत ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि कॉमर्स फैकल्टी के तहत विभाग के प्रशासनिक रूप से आने के कारण विषय की अर्हताएं बदल जाएंगी:

“‘शिक्षण संकाय’ (टीचिंग फैकल्टी) शब्द का आशय उन शिक्षकों से है जिन्हें मैनेजमेंट/बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन पाठ्यक्रमों में नामांकित छात्रों को शिक्षा प्रदान करने के लिए नियुक्त किया गया है, और इसके दायरे में बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन विभाग का शिक्षण स्टाफ भी शामिल है। महज इसलिए कि बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन विभाग कॉमर्स फैकल्टी के तहत आता है, यह मैनेजमेंट/बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन के पाठ्यक्रमों में शिक्षकों की नियुक्ति के संबंध में विनियम, 2010 के तहत निर्धारित न्यूनतम पात्रता योग्यताओं को किसी भी तरह से कमजोर या निष्प्रभावी नहीं करता है।”

पीठ ने आगे टिप्पणी की:

“विनियम, 2010 के तहत पात्रता इस आधार पर निर्धारित होती है कि मास्टर या पीएचडी डिग्री का विषय/अनुशासन विज्ञापित शिक्षण पद की आवश्यकताओं के अनुरूप है या नहीं, भले ही नियुक्ति किसी विभाग में की गई हो या किसी संकाय में। पात्रता तय करने के लिए स्टैच्यूट 11.03.04(A) सहपठित 11.03.01 का सहारा लेना घातक होगा, क्योंकि ऐसा करना मैनेजमेंट/बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में शिक्षकों की नियुक्ति हेतु विनियम, 2010 के तहत निर्धारित न्यूनतम पात्रता अर्हताओं को दरकिनार करने के समान होगा।”

अदालत ने यह भी माना कि विश्वविद्यालय अपनी ही चयन समिति के रुख के विपरीत नहीं जा सकता, जिसने स्टैच्यूट 11.03.04(G) के तहत पूरी भर्ती प्रक्रिया संचालित की थी। इसके अलावा, शोधार्थियों के निर्देशन से जुड़े दस्तावेज प्रस्तुत न करने के लिए याचिकाकर्ताओं को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि चयन समिति ने कभी उनसे ऐसे दस्तावेजों की मांग ही नहीं की थी।

हाईकोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने माना कि कुलाधिपति का आदेश तथ्य और कानून की भ्रामक समझ पर आधारित था, जिसने 3 दिसंबर 2013 के वैधानिक संशोधनों को नजरअंदाज कर दिया। इसके साथ ही अदालत ने 27 नवंबर 2017 के आदेश को रद्द कर दिया। पीठ ने निर्देश दिया कि डॉ. हिमांशु मोहन और डॉ. संगीता साहू का चयन पूर्णतः उचित एवं वैध था और वे अपने पदों से संबंधित सभी परिणामी सेवा लाभों के हकदार हैं। हाईकोर्ट ने दोनों याचिकाओं को स्वीकार करते हुए वाद व्यय पर कोई आदेश पारित नहीं किया।

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मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: डॉ. हिमांशु मोहन बनाम चांसलर, लखनऊ यूनिवर्सिटी, लखनऊ एवं अन्य (संबद्ध वाद: डॉ. संगीता साहू बनाम चांसलर, लखनऊ यूनिवर्सिटी, लखनऊ एवं अन्य)

वाद संख्या: रिट – ए संख्या 29510 / 2017 एवं रिट – ए संख्या 29508 / 2017 

पीठ: जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय 

निर्णय की तिथि: 12 अक्टूबर 2026

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