झारखंड हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि पत्नी की अपनी कोई आमदनी नहीं है, तो उसके भरण-पोषण की प्राथमिक जिम्मेदारी पति की है। केवल इस आधार पर पति अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता कि पत्नी अपने माता-पिता के साथ रह रही है या उसके माता-पिता आर्थिक रूप से उसकी मदद करने में सक्षम हैं।
जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की डिवीजन बेंच ने इस टिप्पणी के साथ एक व्यक्ति को अपनी पूर्व पत्नी को स्थायी गुजारा भत्ते के रूप में 20 लाख रुपये देने का निर्देश दिया है।
हाईकोर्ट ने 9 अक्टूबर को दिए फैसले में पति की आमदनी, उसकी आर्थिक जिम्मेदारियों और पत्नी की भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए यह रकम तय की। मामला 47 वर्षीय महिला की अपील से जुड़ा था, जिसने वर्ष 2016 में फैमिली कोर्ट द्वारा दिए गए तलाक के फैसले को चुनौती दी थी।
पत्नी की कोई आमदनी नहीं, पति को मिलते हैं हर महीने 34,372 रुपये
स्थायी गुजारा भत्ते की रकम तय करते समय हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की आर्थिक स्थिति पर विचार किया।
अदालत के सामने आए विवरण के अनुसार, पति का मासिक सकल वेतन लगभग 47,498 रुपये था। विभिन्न कटौतियों के बाद उसे हर महीने 34,372 रुपये मिलते थे।
दूसरी ओर, पत्नी की अपनी कोई नियमित आमदनी नहीं थी। अदालत ने उसकी उम्र, भविष्य की जरूरतों और जीवनयापन के लिए आवश्यक आर्थिक सहायता को भी ध्यान में रखा।
हाईकोर्ट ने माना कि इन परिस्थितियों में 20 लाख रुपये का स्थायी गुजारा भत्ता उचित और न्यायसंगत होगा। अदालत के अनुसार, यह रकम पति की आर्थिक क्षमता और पत्नी के भविष्य को सुरक्षित रखने की जरूरत के बीच संतुलन बनाती है।
2003 में हुई थी शादी, 2016 में मिला तलाक
मामले के अनुसार, दोनों की शादी फरवरी 2003 में हुई थी। हालांकि, शादी के कुछ समय बाद ही उनके वैवाहिक जीवन में विवाद शुरू हो गए।
पति का दावा था कि शादी बिना दहेज के हुई थी और पत्नी शुरुआत में केवल 24 घंटे ससुराल में रही थी। इसके बाद वह पति के साथ उसके कार्यस्थल चली गई थी।
पति के अनुसार, कुछ समय बाद पत्नी ने अपने मायके जाने की जिद की। इसके बाद पति के माता-पिता उसे लगभग डेढ़ महीने बाद वापस जमशेदपुर स्थित ससुराल लेकर आए।
बाद में महिला के पिता ने क्रूरता का आरोप लगाते हुए मामला दर्ज कराया।
पति ने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी का स्वभाव चिड़चिड़ा था और अपने माता-पिता तथा परिवार के अन्य सदस्यों के व्यवहार के कारण वह मानसिक रूप से परेशान रहती थी।
उसका दावा था कि पत्नी के माता-पिता उससे बातचीत नहीं करते थे, जिससे वह अवसाद में चली जाती थी। पति ने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी ने दो बार आत्महत्या करने की कोशिश की, लेकिन उसने दोनों बार उसे बचा लिया।
पति ने यह आरोप भी लगाया कि पत्नी रसोई का काम नहीं करती थी, जिसके कारण उसकी 79 वर्षीय मां को घर का सारा काम करना पड़ता था।
इन परिस्थितियों का हवाला देते हुए पति ने वर्ष 2008 में क्रूरता के आधार पर तलाक के लिए फैमिली कोर्ट में याचिका दाखिल की थी।
फैमिली कोर्ट ने अप्रैल 2016 में तलाक की डिक्री दे दी। इसके खिलाफ पत्नी ने झारखंड हाईकोर्ट का रुख किया।
पति ने 2018 में कर ली दूसरी शादी
हाईकोर्ट में अपील की सुनवाई के दौरान सामने आया कि पति ने 10 जुलाई 2018 को दूसरी शादी कर ली थी।
पति ने अपने हलफनामे में बताया कि वह अपनी दूसरी पत्नी और मां के साथ पैतृक मकान में रह रहा है।
महिला की ओर से पेश अधिवक्ता जितेंद्र नाथ उपाध्याय ने अदालत को बताया कि पति की दूसरी शादी हो चुकी है। ऐसे में दोनों पक्ष स्थायी गुजारा भत्ते के जरिए विवाद का समाधान करने पर सहमत हुए हैं।
वहीं, पति की ओर से अधिवक्ता दिलीप कुमार कर्मकार ने कहा कि दूसरी शादी हो जाने के कारण अब दोनों के बीच सुलह या दोबारा साथ रहने की कोई संभावना नहीं है। इसलिए केवल स्थायी गुजारा भत्ते की रकम तय करने का मुद्दा बचा है।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों से सीधे बातचीत भी की।
पत्नी ने कहा कि यदि उसे स्थायी गुजारा भत्ता दिया जाता है, तो वह तलाक की डिक्री स्वीकार करने के लिए तैयार है। दूसरी ओर, पति ने अपनी आर्थिक स्थिति का हवाला देते हुए कहा कि उसके पास इतनी रकम देने की क्षमता नहीं है।
गुजारा भत्ते के मामलों में दोनों पक्षों की परिस्थितियों को समझना जरूरी
हाईकोर्ट ने कहा कि गुजारा भत्ते से जुड़े प्रत्येक मामले में पति और पत्नी, दोनों की अपनी परिस्थितियां होती हैं।
अदालत के अनुसार, दोनों पक्ष अपने अनुभवों, शिकायतों और व्यक्तिगत दृष्टिकोण के आधार पर वैवाहिक संबंधों की अलग-अलग तस्वीर प्रस्तुत करते हैं।
बेंच ने कहा कि ऐसे मामलों का फैसला केवल औपचारिक या यांत्रिक तरीके से नहीं किया जाना चाहिए। अदालतों को उपलब्ध साक्ष्यों के साथ सामाजिक वास्तविकताओं को भी ध्यान में रखना चाहिए।
हाईकोर्ट ने विशेष रूप से स्पष्ट किया कि यदि पत्नी स्वयं कमाने में सक्षम नहीं है, तो उसके भरण-पोषण की प्राथमिक जिम्मेदारी पति पर ही रहेगी।
केवल इसलिए यह जिम्मेदारी कम नहीं हो सकती कि पत्नी फिलहाल अपने माता-पिता के साथ रह रही है या उसके माता-पिता उसकी आर्थिक सहायता कर सकते हैं।
हाईकोर्ट ने 20 लाख रुपये का स्थायी गुजारा भत्ता तय किया
दोनों पक्षों की दलीलों और आर्थिक परिस्थितियों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने पत्नी के लिए 20 लाख रुपये का स्थायी गुजारा भत्ता उचित पाया।
अदालत ने कहा कि पत्नी की अपनी कोई आमदनी नहीं है और जीवनयापन तथा भविष्य की जरूरतों के लिए उसे आर्थिक सहायता की आवश्यकता है।
साथ ही, पति के मासिक वेतन और उसकी अन्य जिम्मेदारियों को देखते हुए अदालत ने 20 लाख रुपये की रकम तय की।
इस प्रकार हाईकोर्ट ने तलाक के फैसले के खिलाफ महिला की अपील में उठे स्थायी गुजारा भत्ते के मुद्दे का निपटारा किया।

