दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी आरोपी के ऐसे पते पर समन, गिरफ्तारी वारंट या फरार घोषित करने की उद्घोषणा भेजना, जहां वह सामान्य रूप से नहीं रहता, कानूनी रूप से वैध तामील नहीं माना जा सकता। ऐसी स्थिति में अदालत के सामने पेश न होने के आधार पर आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 174A या भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 209 के तहत अपराध नहीं बनता।
जस्टिस गिरीश कठपालिया ने चेक बाउंस मामले में गलत तरीके से फरार घोषित किए गए तजिंदर मोहन सिंह के खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द करते हुए यह फैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को फरार घोषित करने से पहले निचली अदालतों को समन और वारंट की तामील से जुड़ी रिपोर्ट की सावधानीपूर्वक जांच करनी चाहिए। कोर्ट ने दिल्ली की सभी आपराधिक अदालतों के लिए इस संबंध में महत्वपूर्ण निर्देश भी जारी किए हैं।
क्या था पूरा मामला?
तजिंदर मोहन सिंह के खिलाफ नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत चेक बाउंस की शिकायत दर्ज की गई थी। ट्रायल कोर्ट ने 31 जुलाई 2018 को मामले का संज्ञान लेते हुए उन्हें समन जारी किया।
समन लुधियाना के दो पतों पर भेजे गए, लेकिन उनकी तामील नहीं हो सकी। इसके बाद 11 जनवरी 2019 को ट्रायल कोर्ट ने स्वयं मामले की सुनवाई करते हुए यह मान लिया कि आरोपी जानबूझकर समन लेने से बच रहा है और उसके खिलाफ जमानती वारंट जारी कर दिया।
हालांकि, वारंट की रिपोर्ट में साफ बताया गया था कि आरोपी पिछले लगभग चार वर्षों से दिए गए दोनों पतों पर न तो रह रहा था और न ही काम कर रहा था।
इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने गैर-जमानती वारंट जारी कर दिया। बाद में सीआरपीसी की धारा 82 के तहत फरार घोषित करने की प्रक्रिया शुरू की गई।
29 जनवरी 2024 को ट्रायल कोर्ट ने सिंह को फरार घोषित कर दिया और पुलिस को उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया। इसके आधार पर दिल्ली के कालकाजी थाने में धारा 174A आईपीसी के तहत एफआईआर संख्या 335/2024 दर्ज की गई।
सिंह ने इस एफआईआर को रद्द कराने के लिए दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हाईकोर्ट में दोनों पक्षों ने क्या कहा?
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि जिन पतों पर समन और वारंट भेजे गए थे, वहां वह वर्ष 2018 से न तो रह रहे थे और न ही काम कर रहे थे।
उनके वकील ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 82 के तहत किसी आरोपी को फरार घोषित करने से पहले अदालत को ठोस तथ्यों के आधार पर संतुष्ट होना जरूरी है। केवल अनुमान के आधार पर ऐसा आदेश नहीं दिया जा सकता।
यह भी बताया गया कि जिस चेक बाउंस मामले के कारण यह कार्रवाई शुरू हुई थी, उसका पक्षकारों के बीच समझौते के बाद निपटारा हो चुका है।
दूसरी ओर, राज्य सरकार ने याचिका का विरोध किया। सरकारी वकील ने कहा कि आरोपी को समन या वारंट की सही तरीके से तामील हुई थी या नहीं और वह संबंधित पते पर रहता था या नहीं, इन सवालों का फैसला ट्रायल के दौरान ही किया जा सकता है।
जहां आरोपी सामान्य रूप से नहीं रहता, वहां समन भेजना वैध तामील नहीं
हाईकोर्ट ने सीआरपीसी और बीएनएसएस के प्रावधानों का विश्लेषण करते हुए कहा कि कानून में समन, वारंट और उद्घोषणा की प्रक्रिया को आरोपी के सामान्य निवास स्थान से जोड़ा गया है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति को ऐसे स्थान पर समन या वारंट भेजा जाता है, जहां वह सामान्य रूप से नहीं रहता, तो उसे वैध तामील नहीं माना जा सकता।
जस्टिस कठपालिया ने कहा:
“दूसरे शब्दों में, यदि समन, वारंट या उद्घोषणा ऐसे स्थान पर भेजी जाती है, जहां संबंधित व्यक्ति सामान्य रूप से नहीं रहता, तो समन की वैध तामील, वारंट का निष्पादन या उद्घोषणा का वैध प्रकाशन नहीं माना जा सकता।”
कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया:
“ऐसी स्थिति में यह नहीं कहा जा सकता कि संबंधित व्यक्ति ने अदालत के आदेश का पालन नहीं किया और इस प्रकार आईपीसी की धारा 174A या बीएनएस की धारा 209 के तहत अपराध किया।”
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के इंदर मोहन गोस्वामी बनाम उत्तरांचल राज्य मामले का उल्लेख किया। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि गिरफ्तारी वारंट जारी करने की शक्ति का इस्तेमाल अत्यंत सावधानी से किया जाना चाहिए, क्योंकि इससे व्यक्ति की स्वतंत्रता पर गंभीर प्रभाव पड़ता है।
कोर्ट ने संजाबिज तारी बनाम किशोर एस. बोरकर मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने चेक बाउंस मामलों में समन की तामील के संबंध में निर्देश जारी किए थे।
ट्रायल कोर्ट ने रिपोर्ट की अनदेखी कर आरोपी को फरार घोषित किया
हाईकोर्ट ने निचली अदालत के रिकॉर्ड की जांच करने के बाद पाया कि समन और वारंट की रिपोर्ट में लगातार बताया गया था कि आरोपी संबंधित पतों पर नहीं रहता।
इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने बिना ठोस कारण दर्ज किए यह मान लिया कि आरोपी जानबूझकर गिरफ्तारी और समन की तामील से बच रहा है।
हाईकोर्ट ने विशेष रूप से 11 जनवरी 2019 की कार्यवाही पर सवाल उठाया, जब ट्रायल कोर्ट ने पहले से जारी समन की अगली तारीख आने से पहले ही स्वयं मामला उठाकर जमानती वारंट जारी कर दिया था।
कोर्ट ने टिप्पणी की:
“ट्रायल कोर्ट के सामने ऐसा कोई साक्ष्य नहीं था, जिसके आधार पर यह माना जा सके कि याचिकाकर्ता जानबूझकर समन की तामील से बच रहा था।”
हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि ट्रायल कोर्ट ने समन और वारंट की तामील करने वाले अधिकारियों की रिपोर्ट को ठीक से नहीं पढ़ा और अदालत के कर्मचारियों की रिपोर्ट पर भरोसा किया।
राज्य सरकार की इस दलील को भी खारिज कर दिया गया कि आरोपी के निवास स्थान से जुड़े विवाद का फैसला ट्रायल में होना चाहिए।
हाईकोर्ट ने कहा कि जब रिकॉर्ड से ही तथ्य स्पष्ट हो रहे हों, तो उस मुद्दे पर अलग से ट्रायल कराने की आवश्यकता नहीं है।
मुकदमों का बोझ किसी आरोपी को जल्दबाजी में फरार घोषित करने का आधार नहीं
हाईकोर्ट ने निचली अदालतों को आगाह किया कि लंबित मुकदमों की अधिक संख्या के कारण किसी आरोपी को जल्दबाजी में फरार घोषित नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा:
“लेकिन इसे किसी भी अदालत द्वारा जल्दबाजी में किसी आरोपी को फरार घोषित करने का वैध औचित्य नहीं माना जा सकता।”
जस्टिस कठपालिया ने कहा कि समन और वारंट की तामील से जुड़े कानूनी प्रावधानों का उद्देश्य निर्दोष व्यक्तियों को कानून की कठोर कार्रवाई से बचाना है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि ये प्रावधान ऐसे शिकायतकर्ताओं पर भी अंकुश लगाते हैं, जो आरोपी का गलत पता देकर उसे फरार घोषित कराने और उसके खिलाफ धारा 174A के तहत एफआईआर दर्ज कराने की कोशिश कर सकते हैं।
दिल्ली की सभी आपराधिक अदालतों के लिए पांच महत्वपूर्ण निर्देश
हाईकोर्ट ने भविष्य में ऐसी स्थिति से बचने के लिए दिल्ली की आपराधिक अदालतों को निम्नलिखित निर्देश दिए:
- केवल लंबित मामलों के दबाव में किसी आरोपी को फरार या घोषित अपराधी नहीं बनाया जाए। इसके लिए ठोस आधार होना चाहिए कि आरोपी जानबूझकर समन या वारंट से बच रहा है।
- शिकायत दर्ज होने के शुरुआती चरण में ही शिकायतकर्ता से हलफनामा लिया जाए, जिसमें आरोपी के सामान्य निवास का सही पता और इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से समन भेजने के लिए उपलब्ध अन्य पते दिए गए हों।
- समन की तामील और वारंट के निष्पादन से संबंधित निष्कर्ष रिकॉर्ड की निष्पक्ष जांच पर आधारित हों। संबंधित जज को अपने निष्कर्ष के समर्थन में लिखित कारण दर्ज करने होंगे।
- यदि समन या वारंट की रिपोर्ट में बताया जाता है कि आरोपी दिए गए पते पर नहीं रहता या काम नहीं करता, तो शिकायतकर्ता से उस पते पर आरोपी के सामान्य रूप से रहने का ठोस प्रमाण मांगा जाए।
- किसी आरोपी को जानबूझकर समन या वारंट से बचने वाला घोषित करने से पहले संबंधित जज स्वयं प्रक्रिया तामील करने वाले अधिकारी या पुलिसकर्मी की रिपोर्ट की जांच करें।
हाईकोर्ट ने एफआईआर रद्द की
सभी तथ्यों और रिकॉर्ड की जांच के बाद हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि तजिंदर मोहन सिंह को गलत तरीके से फरार घोषित किया गया था।
कोर्ट ने कहा:
“उपरोक्त चर्चा के आधार पर मुझे यह मानने में कोई संकोच नहीं है कि याचिकाकर्ता को गलत तरीके से फरार घोषित किया गया था और परिणामस्वरूप उसके खिलाफ दर्ज एफआईआर कायम नहीं रह सकती।”
इसके साथ ही हाईकोर्ट ने कालकाजी थाने में दर्ज एफआईआर संख्या 335/2024 और उससे जुड़ी सभी कार्यवाहियों को रद्द कर दिया।
हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि फैसले की प्रति रजिस्ट्रार जनरल के माध्यम से दिल्ली के सभी प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीशों और दिल्ली न्यायिक अकादमी को भेजी जाए, ताकि आपराधिक मामलों की सुनवाई करने वाली सभी अदालतों को इन निर्देशों की जानकारी दी जा सके और उनका सख्ती से पालन सुनिश्चित हो।
केस विवरण
केस टाइटल: तजिंदर मोहन सिंह बनाम राज्य (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार)
केस नंबर: सीआरएल.एम.सी. 500/2025 और सीआरएल.एम.ए. 2359/2025
बेंच: जस्टिस गिरीश कठपालिया
फैसले की तारीख: 9 अक्टूबर 2026

