कर्नाटक हाईकोर्ट ने इंजीनियरों को अपने नाम के आगे ‘Er’ लगाने की अनुमति देने वाले राज्य सरकार के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस जारी किया है। याचिका में सवाल उठाया गया है कि जब सरकार इंजीनियरों को उनके पेशे के आधार पर विशेष पहचान दे सकती है, तो वकीलों को ऐसी मान्यता से वंचित क्यों रखा गया है।
जस्टिस सी एम पूनाचा ने शुक्रवार को एडवोकेट बीरप्पा एन की याचिका पर सुनवाई करते हुए कर्नाटक सरकार से जवाब मांगा। याचिकाकर्ता ने 15 सितंबर को जारी सरकारी आदेश को मनमाना और भेदभावपूर्ण बताते हुए इसे रद्द करने की मांग की है।
याचिका में यह भी सवाल उठाया गया है कि क्या राज्य सरकार बिना किसी कानून के केवल अपने आदेश से किसी पेशे के लिए विशेष संबोधन को आधिकारिक मान्यता दे सकती है।
वकीलों के साथ भेदभाव का आरोप
याचिकाकर्ता की ओर से पेश एडवोकेट त्रिविक्रम एस ने दलील दी कि सरकार ने इंजीनियरों को अपने नाम के आगे विशेष उपाधि लगाने की अनुमति देकर अलग-अलग पेशों के बीच अनुचित भेदभाव किया है।
उन्होंने कहा कि इंजीनियरों को सरकारी स्तर पर विशेष पहचान दी गई है, जबकि न्याय व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले वकीलों के लिए ऐसी कोई व्यवस्था नहीं की गई।
याचिका के अनुसार, वकील न्याय व्यवस्था का अहम हिस्सा हैं। वे अदालतों में आम नागरिकों की आवाज उठाते हैं, उनकी समस्याओं को कानूनी रूप से सामने रखते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि किसी भी व्यक्ति को अपनी बात रखने का मौका मिले।
याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 22(1) का भी हवाला दिया। यह प्रावधान गिरफ्तार व्यक्ति को अपनी पसंद के वकील से सलाह लेने और उसके माध्यम से अपना बचाव करने का अधिकार देता है।
याचिका में कहा गया कि जिस पेशे को संविधान ने इतनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी है, उसके साथ राज्य सरकार को समान सम्मान का व्यवहार करना चाहिए।
क्या सरकार को ऐसी उपाधि देने का अधिकार है?
याचिका में सरकारी आदेश की कानूनी वैधता पर भी सवाल उठाए गए हैं।
याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 18(1) का हवाला देते हुए कहा कि यह प्रावधान राज्य को उपाधियां देने से रोकता है। याचिका के मुताबिक, संविधान राज्य सरकार को किसी पेशे के लिए अपनी ओर से विशेष संबोधन बनाने या उसे आधिकारिक मान्यता देने का अधिकार नहीं देता।
याचिका में तर्क दिया गया कि 15 सितंबर का आदेश किसी कानून पर आधारित नहीं है और सरकार ने केवल प्रशासनिक आदेश के जरिए इंजीनियरों को विशेष पहचान देने का फैसला किया है।
इस मामले में अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) का भी उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ता के अनुसार, तकनीकी शिक्षा के मानकों को निर्धारित करने और बनाए रखने की जिम्मेदारी इस वैधानिक संस्था की है।
ऐसे में इंजीनियरिंग पेशे के लिए किसी विशेष संबोधन को मान्यता देने का फैसला संबंधित विशेषज्ञ संस्था को करना चाहिए, न कि राज्य सरकार को।
याचिका में यह आशंका भी जताई गई कि यदि हर राज्य अपनी मर्जी से अलग-अलग पेशों के लिए विशेष उपाधियां तय करने लगेगा, तो पूरे देश में एक समान व्यवस्था नहीं रह जाएगी। इससे पेशेवर पहचान सरकारों की पसंद और फैसलों पर निर्भर हो सकती है।
इंजीनियर्स डे पर की गई थी घोषणा
कर्नाटक सरकार ने 15 सितंबर को इंजीनियरों को अपने नाम के आगे ‘Er’ लगाने की अनुमति देने का आदेश जारी किया था। इससे पहले डी के शिवकुमार ने इंजीनियर्स डे के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में इस फैसले की घोषणा की थी।
यह दिन प्रसिद्ध इंजीनियर सर एम विश्वेश्वरैया की जयंती के अवसर पर मनाया जाता है।
सरकारी आदेश में मैसूर रियासत के 18वें दीवान के रूप में विश्वेश्वरैया के योगदान का उल्लेख किया गया था।
इसमें कृष्णराज सागर बांध के निर्माण, स्वचालित बाढ़ नियंत्रण गेट लगाने और मैसूर रियासत में उद्योगों के विकास में उनकी भूमिका को प्रमुखता से बताया गया था।
हालांकि, याचिकाकर्ता का कहना है कि इंजीनियरों के योगदान का सम्मान करने के बावजूद सरकार बिना उचित कानूनी आधार के किसी पेशे को विशेष आधिकारिक पहचान नहीं दे सकती।
फिलहाल कर्नाटक हाईकोर्ट ने इस मामले में राज्य सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

