केरल हाईकोर्ट ने स्कूल जाने वाली एक नाबालिग छात्रा के साथ यौन उत्पीड़न के मामले में 55 वर्षीय ऑटो रिक्शा चालक की दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है। मामले की सुनवाई के दौरान ही दोषी की मौत हो चुकी थी, इसके बावजूद अदालत ने मेरिट के आधार पर विचार करते हुए उसकी अपील खारिज कर दी।
जस्टिस राजा विजयाराघवन वी और जस्टिस के. वी. जयकुमार की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि सत्र अदालत द्वारा दिए गए निर्णय और दोषसिद्धि में दखल देने का कोई औचित्य नहीं बनता।
यह पूरा मामला वर्ष 2012-13 का है। उस समय आरोपी ऑटो रिक्शा चालक पीड़िता को स्कूल लाने और ले जाने का काम करता था। घटना के वक्त पीड़िता चौथी कक्षा की छात्रा थी। मामले में निचली अदालत (सत्र न्यायालय) ने आरोपी को दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई थी, जिसके खिलाफ उसने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।
दोषी की मौत के बावजूद जारी रही सुनवाई
अपील लंबित रहने के दौरान ही आरोपी की मौत हो गई थी, लेकिन हाईकोर्ट ने कानूनी प्रावधानों के तहत मामले की कार्यवाही बंद नहीं की। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब किसी मामले में कारावास के साथ जुर्माने की संयुक्त सजा सुनाई गई हो, तो अपीलकर्ता के निधन के बाद भी अपील की सुनवाई समाप्त नहीं होती और उस पर कानूनी आधार पर निर्णय लिया जाता है।
पीड़िता की गवाही को बताया पूरी तरह सुसंगत और भरोसेमंद
बचाव पक्ष की ओर से पीड़िता के बयानों में कथित विरोधाभासों का हवाला देकर राहत की मांग की गई थी। इस पर पीठ ने कहा कि बच्ची की गवाही पूरी तरह सुसंगत और विश्वसनीय है। अदालत ने रेखांकित किया कि बयानों में बताई गई कथित कमियां ऐसी नहीं हैं जो अभियोजन पक्ष के मामले की जड़ पर प्रहार करती हों या बच्ची के मूल बयान को कमजोर करती हों।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट के पास गवाही के समय पीड़िता के हाव-भाव और आचरण को प्रत्यक्ष रूप से देखने का अवसर था, जिससे अन्य साक्ष्यों के साथ उसकी गवाही का सही संदर्भ में मूल्यांकन किया जा सका। अदालत ने पूरे रिकॉर्ड और साक्ष्यों का स्वतंत्र विश्लेषण करने के बाद पाया कि गवाही में ऐसा कोई गंभीर विरोधाभास नहीं है जिसके आधार पर उसे खारिज किया जाए।
निचली अदालत के फैसले में दखल से इनकार
सभी साक्ष्यों और सत्र अदालत के निष्कर्षों का स्वतंत्र परीक्षण करने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि निचली अदालत के फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई कानूनी आधार मौजूद नहीं है। इसके साथ ही अदालत ने दोषी की अपील को खारिज करते हुए उसके दोष, दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा पर मुहर लगा दी।

