केरल हाईकोर्ट ने केरल के निलंबूर को कर्नाटक के नंजनगुड से जोड़ने वाली प्रस्तावित अंतरराज्यीय रेल लाइन की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) 14 अक्टूबर तक हर हाल में पूरी करने का निर्देश रेलवे प्रशासन को दिया है। चीफ जस्टिस सौमेन सेन और जस्टिस श्याम कुमार वी. एम. की खंडपीठ ने रेलवे को निर्देश दिया कि वह 14 अक्टूबर को एक हलफनामा दाखिल कर यह भी स्पष्ट करे कि क्या परियोजना की औपचारिक मंजूरी और वित्तीय स्वीकृति के लिए इस रिपोर्ट को सक्षम प्राधिकारी के पास भेज दिया गया है।
डीपीआर की प्रगति पर हाईकोर्ट की टिप्पणी
अदालत ने सुनवाई के दौरान रेखांकित किया कि दक्षिण रेलवे ने इस मामले में 27 जुलाई 2026 को अपना हलफनामा दायर किया था। खंडपीठ ने टिप्पणी की कि जुलाई के बाद से अब तक का समय देखते हुए डीपीआर का काम पूरा हो जाना चाहिए था। अदालत ने निर्देश दिया कि यदि रिपोर्ट अब तक तैयार नहीं हुई है, तो इसे अगली सुनवाई की तारीख (14 अक्टूबर) तक अनिवार्य रूप से पूरा किया जाए। इसके साथ ही रेलवे को हलफनामे में यह साफ करना होगा कि परियोजना की मंजूरी के लिए डीपीआर सक्षम प्राधिकारी के समक्ष प्रस्तुत की गई है या नहीं।
सर्वेक्षण कार्य और प्रशासनिक प्रक्रिया
इससे पहले दक्षिण रेलवे ने अदालत को बताया था कि रेलवे बोर्ड ने निलंबूर-नंजनगुड रेल लाइन के लिए ‘फाइनल लोकेशन सर्वे’ (एफएलएस) की मंजूरी दे दी है। इसके तहत डीपीआर तैयार करने के लिए जरूरी लिडार (LIDAR) सर्वेक्षण और ट्रैफिक अध्ययन कराया जा रहा है। रेलवे ने अदालत को यह भी अवगत कराया था कि यह कार्य पूरा होते ही रिपोर्ट रेलवे बोर्ड के विचारार्थ भेजी जाएगी। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया था कि परियोजना का वास्तविक क्रियान्वयन सक्षम प्राधिकारी की अंतिम मंजूरी और स्वीकृति मिलने पर ही निर्भर करेगा।
मालाबार में रेल विस्तार को लेकर दायर हुई थी याचिका
हाईकोर्ट का यह आदेश कोझिकोड के ‘कैंसर एंड एलाइड एलमेंट रिसर्च फाउंडेशन’ (CARE) के चेयरमैन सी. एन. विजयकृष्णन की ओर से दाखिल याचिका पर आया है। यह संस्था एमवीआर कैंसर सेंटर एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट का संचालन करती है। याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि मालाबार क्षेत्र के विकास और आवागमन के लिए इस रेल संपर्क का निर्माण अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि संबंधित अधिकारियों को कई बार ज्ञापन और प्रतिवेदन सौंपे गए, लेकिन लंबे समय से इस पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा था, जिसके चलते उन्हें अदालत की शरण लेनी पड़ी।

