अलग-अलग क्षेत्रों में प्रभावी समझौतों पर लागू होंगे उनके अपने क्लॉज, मूल लाइसेंस समझौते की विदेशी मध्यस्थता सीट संदर्भ से इनकार का आधार नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अलग-अलग कार्यक्षेत्रों में लागू होने वाले समझौतों से उपजे विवाद उनके अपने स्वतंत्र विवाद समाधान क्लॉज के तहत ही तय होंगे, भले ही उससे पहले हुए किसी तकनीकी लाइसेंस समझौते में विदेशी क्षेत्राधिकार की मध्यस्थता का प्रावधान क्यों न किया गया हो। CJI सूर्य कांत, जस्टिस जोयमाल्य बागची, और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 11 के तहत दायर दो याचिकाओं का निपटारा करते हुए विवादों को घरेलू मध्यस्थता के लिए भेज दिया। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने बॉम्बे हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रमेश देवकीनंदन धानुका को एकमात्र मध्यस्थ नियुक्त किया।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता संख्या 1, शुभम इक्विपमेंट प्राइवेट लिमिटेड (एसईपीएल), ठाणे (महाराष्ट्र) स्थित एक भारतीय कंपनी है, जो ‘टैनक्लीन’ और ‘शुभम’ ब्रांड नामों के तहत पेयजल टैंकों की सफाई के कारोबार में संलग्न है। याचिकाकर्ता संख्या 2, सुनील सुरेश उपलप इसके मुख्य प्रमोटरों में से एक हैं। वहीं, प्रत्यर्थी संख्या 1, रॉथवेल वॉटर कंपनी लिमिटेड (आरडब्ल्यूसीएल), दक्षिण कोरिया की एक कंपनी है जिसके पास अपशिष्ट जल उपचार में बायोलॉजिकल न्यूट्रिएंट रिमूवल प्रोसेस तकनीक के कई पेटेंट हैं। इसके प्रमोटर और प्रेसिडेंट कीन्हो ली (प्रत्यर्थी संख्या 2) हैं। प्रत्यर्थी संख्या 3, रॉथवेल बिजनेस इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड (आरबीआईपीएल), पुणे में स्थित आरडब्ल्यूसीएल की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी है, जिसे कीन्हो ली, उनकी बेटी रयूरी ली और सयाजी कृष्णराव शिंदे द्वारा निगमित किया गया था।

दोनों पक्षों के बीच व्यावसायिक संबंध तीन अलग-अलग समझौतों के जरिए आगे बढ़े:

  1. तकनीकी सहयोग लाइसेंस समझौता (30 जनवरी 2019): आरडब्ल्यूसीएल ने एसईपीएल को अपशिष्ट जल उपचार पेटेंट के लिए एक विशेष, रॉयल्टी-आधारित लाइसेंस दिया। क्लॉज 12.1 के तहत तय हुआ कि विवादों का निपटारा दक्षिण कोरिया के कानूनों के तहत सियोल में मध्यस्थता द्वारा किया जाएगा।
  2. संयुक्त उद्यम एवं शेयरहोल्डिंग समझौता (1 अक्टूबर 2021): उपलप (‘भारतीय समूह’) और ली (‘दक्षिण कोरियाई समूह’) के बीच यह समझौता हुआ, जिसके तहत ‘रॉथवेल’ ब्रांड के तहत सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाने और उनके रखरखाव के लिए रॉथवेल वॉटर (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड (आरडब्ल्यूआईपीएल) नामक एक संयुक्त उद्यम कंपनी बनाई गई। इसके आर्टिकल 43 में भारतीय कानून के तहत मुंबई में मध्यस्थता का प्रावधान था, जबकि आर्टिकल 25 में पूर्व समझौतों को निष्प्रभावी करने वाला सुपरसेशन क्लॉज शामिल था।
  3. समझौता ज्ञापन (1 फरवरी 2023): जेडब्ल्यूआईएल इंफ्रा लिमिटेड और आरडब्ल्यूसीएल के बीच बृहन्मुंबई महानगरपालिका की भांडुप परियोजना को लेकर एक उप-अनुबंध हुआ। इसके बाद एसईपीएल और आरडब्ल्यूसीएल ने समझौता ज्ञापन (एमओयू) किया, जिसके तहत एसईपीएल ने संपर्क, सीमा शुल्क निकासी, रसद और पोर्ट हैंडलिंग जैसी सेवाएं प्रदान कीं। इसके क्लॉज 9 में मुंबई में मध्यस्थता और क्लॉज 10.8 में संबंधित विषय पर पिछले सभी समझौतों को रद्द करने का प्रावधान था।
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विवाद तब गहराया जब 11 अक्टूबर 2024 को एसईपीएल ने संयुक्त उद्यम समझौते (जेवीए) को समाप्त करने का नोटिस जारी कर दिया। एसईपीएल ने आरोप लगाया कि आरडब्ल्यूसीएल ने गैर-प्रतिस्पर्धा समझौते का उल्लंघन करते हुए आरबीआईपीएल बनाई, तकनीकी इनपुट में देरी करके परियोजनाओं को रद्द करवाया जिससे भारी नुकसान हुआ, और एमओयू के तहत मंगाए गए 15,27,72,420 रुपये के डिकैन्टर सिस्टम में से 4,24,35,647 रुपये का भुगतान नहीं किया। एसईपीएल ने व्यापारिक नुकसान के लिए 20 करोड़ रुपये और एमओयू के तहत 4.24 करोड़ रुपये से अधिक की मांग की।

आरडब्ल्यूसीएल ने 28 अक्टूबर 2024 को इस समाप्ति नोटिस का विरोध किया और तर्क दिया कि यह विवाद 2019 के लाइसेंस समझौते से जुड़ा है, इसलिए कोरियाई मध्यस्थता क्लॉज ही लागू होगा। इसके बाद एसईपीएल ने 28 नवंबर 2024 को जेवीए और एमओयू के तहत अलग-अलग मध्यस्थता नोटिस जारी किए और अंततः सुप्रीम कोर्ट में धारा 11 के तहत याचिकाएं दाखिल कीं। अदालत द्वारा मामले को मध्यस्थता (मीडिएशन) के लिए भी भेजा गया था, लेकिन वहां कोई समाधान नहीं निकल सका।

पक्षों की दलीलें

प्रत्यर्थियों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सुधांशु चौधरी ने दलील दी कि जेवीए और एमओयू दोनों अपनी ‘मदर एग्रीमेंट’ यानी 2019 के लाइसेंस समझौते से पूरी तरह जुड़े हुए हैं। उन्होंने कहा कि लाइसेंस समझौते का क्लॉज 12.1, जो कोरिया में मध्यस्थता का प्रावधान करता है, प्रभावी होना चाहिए। उन्होंने यह भी बताया कि आरडब्ल्यूसीएल ने लाइसेंस समझौते के उल्लंघन को लेकर 8 अगस्त 2025 को कोरिया में मध्यस्थता का नोटिस पहले ही जारी कर दिया है। इसके अलावा, उन्होंने तर्क दिया कि आरबीआईपीएल एक गैर-हस्ताक्षरकर्ता इकाई है और उसे मध्यस्थता से नहीं बांधा जा सकता।

इसके विपरीत, याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सी.यू. सिंह ने कहा कि जेवीए और एमओयू दोनों ही लाइसेंस समझौते से पूरी तरह स्वतंत्र हैं। उन्होंने जेवीए के आर्टिकल 25 और एमओयू के क्लॉज 10.8 का हवाला दिया, जिसमें स्पष्ट रूप से लिखा है कि ये समझौते पिछले सभी समझौतों को निष्प्रभावी करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि आरबीआईपीएल वास्तव में आरडब्ल्यूसीएल की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी है, जिसे संयुक्त उद्यम से अनुचित प्रतिस्पर्धा करने के लिए दुर्भावना से बनाया गया था, इसलिए वह इस संदर्भ में एक आवश्यक पक्ष है।

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सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

पीठ की ओर से फैसला लिखते हुए जस्टिस जोयमाल्य बागची ने 1996 के अधिनियम की धारा 11(6-ए) के तहत मध्यस्थता अदालत के सीमित क्षेत्राधिकार को रेखांकित किया और इन री: इंटरप्ले बिटवीन आर्बिट्रेशन एग्रीमेंट्स अंडर द आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलिएशन एक्ट, 1996 एंड द इंडियन स्टाम्प एक्ट, 1899 मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की:

“1996 के अधिनियम की धारा 11(6-ए) मध्यस्थता समझौते के प्रथम दृष्टया अस्तित्व तक जांच के दायरे को सीमित करके न्यूनतम न्यायिक हस्तक्षेप का सिद्धांत निर्धारित करती है। एक बार जब रेफरल कोर्ट के समक्ष मध्यस्थता समझौते का प्रथम दृष्टया अस्तित्व स्थापित हो जाता है, तो उसे मध्यस्थ नियुक्त करना चाहिए और पक्षों को मध्यस्थता के लिए भेजना चाहिए।”

तीनों समझौतों की शर्तों का विश्लेषण करते हुए पीठ ने पाया कि प्रत्येक अनुबंध का कार्यक्षेत्र अलग-अलग है—लाइसेंस समझौता पेटेंट देने से संबंधित है; जेवीए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के संचालन के लिए एक नई कंपनी बनाता है; और एमओयू नगर निगम परियोजना से जुड़ी संपर्क, लॉजिस्टिक्स व हैंडलिंग सेवाओं से जुड़ा है।

अदालत ने कहा:

“इस प्रकार, लाइसेंस समझौता, जेवीए और एमओयू प्रथम दृष्टया अलग-अलग क्षेत्रों में काम करते हैं और विशेष रूप से जेवीए तथा एमओयू के तहत उत्पन्न होने वाले विवाद उनमें समाहित विवाद समाधान क्लॉज के तहत विचारणीय हैं, न कि लाइसेंस समझौते के क्लॉज के तहत।”

कोरिया में चल रही मध्यस्थता और दावों के टकराव को लेकर अदालत ने स्पष्ट किया कि इसे शुरुआती स्तर पर ही मध्यस्थता से इनकार करने का कारण नहीं बनाया जा सकता:

“श्री चौधरी का यह तर्क कि जेवीए और एमओयू से संबंधित विवादों का अलग से निर्णय नहीं किया जा सकता और वे लाइसेंस समझौते के तहत दावों के साथ परस्पर जुड़े हैं, जिसके संबंध में उनके मुवक्किल पहले ही कोरिया में मध्यस्थता के लिए विवाद उठा चुके हैं, यह मध्यस्थ के अधिकार क्षेत्र में आएगा कि वह जेवीए/एमओयू के तहत मध्यस्थता के योग्य विवादों के दायरे और सीमा को तय करे, और यह प्रारंभिक स्तर पर ही संदर्भ से इनकार करने का आधार नहीं हो सकता।”

गैर-हस्ताक्षरकर्ता सहायक कंपनी आरबीआईपीएल के संबंध में अदालत ने माना:

“इसी प्रकार, दूसरा मुद्दा कि आरबीआईपीएल एक स्वतंत्र गैर-हस्ताक्षरकर्ता इकाई है जो मध्यस्थता समझौते से बाध्य नहीं है, एक विवादास्पद मुद्दा है क्योंकि आरबीआईपीएल आरडब्ल्यूसीएल (एक हस्ताक्षरकर्ता) की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी है और आरोप है कि इसे आरडब्ल्यूसीएल द्वारा जेवीए की शर्तों के उल्लंघन में निगमित किया गया था। इस स्थिति को देखते हुए, इस मुद्दे को उचित निर्णय के लिए मध्यस्थ के पास भेजा जाना आवश्यक है।”

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि जेवीए और एमओयू दोनों में वैध मध्यस्थता समझौते मौजूद हैं। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने दोनों मध्यस्थता याचिकाओं को स्वीकार करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रमेश देवकीनंदन धानुका को एकमात्र मध्यस्थ नियुक्त किया। मध्यस्थ को अपनी फीस स्वयं तय करने की स्वतंत्रता दी गई, तथा लागत के संबंध में कोई आदेश पारित नहीं किया गया।

मामले का विवरण

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मामले का शीर्षक: शुभम इक्विपमेंट प्राइवेट लिमिटेड एवं अन्य बनाम रॉथवेल वॉटर कंपनी लिमिटेड एवं अन्य

वाद संख्या: मध्यस्थता याचिका (सिविल) संख्या 7 / 2025 साथ में मध्यस्थता याचिका (सिविल) संख्या 8 / 2025 

पीठ: CJI सूर्य कांत, जस्टिस जोयमाल्य बागची, और जस्टिस वी. मोहना 

निर्णय की तिथि: 08 अक्टूबर 2026

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