सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को केंद्र सरकार को एक विशेष समिति गठित करने का निर्देश दिया है। यह समिति दवा कंपनियों द्वारा अपनाए जाने वाले अनैतिक विपणन (मार्केटिंग) तौर-तरीकों पर रोक लगाने के उपायों और विभिन्न पक्षों से मिले सुझावों पर विचार कर सरकार को अपनी सिफारिशें सौंपेगी।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने यह आदेश उस याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया, जिसमें मांग की गई थी कि जब तक इस विषय पर कोई प्रभावी कानून नहीं बन जाता, तब तक सुप्रीम कोर्ट दवा कंपनियों के अनैतिक प्रचार को नियंत्रित करने के लिए अंतरिम दिशानिर्देश जारी करे।
29 जनवरी को होगी अगली सुनवाई
पीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार को एक समिति गठित करने का निर्देश दिया गया है, जो इस संबंध में प्राप्त ज्ञापनों और सुझावों की समीक्षा कर अपनी सिफारिशें केंद्र को सौंपेगी। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 29 जनवरी तय की है, जिस दिन केंद्र सरकार द्वारा दाखिल किए जाने वाले अनुपालन हलफनामे (कम्प्लायंस एफिडेविट) पर विचार किया जाएगा।
वैधानिक ढांचे के लिए तीन सदस्यीय समिति
इससे पहले 8 सितंबर को हुई सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने शीर्ष अदालत को सूचित किया था कि वह एक तीन सदस्यीय समिति गठित करने जा रही है। सरकार ने अदालत में यह स्वीकार किया था कि दवा कंपनियों को अनैतिक गतिविधियों में शामिल होने से रोकने के लिए वर्तमान निगरानी तंत्र को और मजबूत करने की आवश्यकता है।
केंद्र ने पीठ को बताया था कि व्यापक चर्चा के बाद यह तय किया गया है कि तीन सदस्यीय समिति इस बात का अध्ययन करेगी कि फार्मा कंपनियों के अनैतिक तौर-तरीकों पर अंकुश लगाने के लिए क्या कोई वैधानिक ढांचा (कानून) बनाया जा सकता है और यदि हां, तो उसका प्रारूप क्या हो। इस रिपोर्ट को अंतिम रूप देकर अदालत की मंजूरी के लिए पेश करने के वास्ते सरकार ने दो महीने का समय मांगा था।
अंतिम फैसले तक यूसीपीएमपी 2024 रहेगा प्रभावी
केंद्र सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक समिति अपनी रिपोर्ट नहीं सौंप देती और उसके आधार पर कोई प्रशासनिक निर्णय नहीं ले लिया जाता, तब तक दवा उद्योग में प्रचार और विपणन की गतिविधियां ‘यूनिफॉर्म कोड फॉर फार्मास्युटिकल मार्केटिंग प्रैक्टिसेज (यूसीपीएमपी), 2024’ के तहत ही संचालित की जाएंगी।

