सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भारतीय दंड संहिता, 1860 (आईपीसी) की धारा 307 (हत्या का प्रयास) के तहत अपराध साबित करने के लिए यह अनिवार्य नहीं है कि पीड़ित को जानलेवा या गंभीर शारीरिक चोट लगी ही हो, और न ही शरीर के गैर-घातक हिस्से पर चोट लगना इस धारा के दायरे को समाप्त करता है। राजस्थान हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द करते हुए, जिसमें चोटों के गैर-घातक अंगों पर होने के आधार पर धारा 307 के आरोप को घटाकर धारा 308 (गैर-इरादतन हत्या का प्रयास) कर दिया गया था, जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी के खिलाफ तय किए गए हत्या के प्रयास के आरोप को बहाल कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 26 नवंबर 2020 को राजस्थान के नागौर जिले की डेगाना तहसील स्थित पोलास गांव के एक कृषि खेत में हुई घटना से जुड़ा है। अपीलकर्ता अभिषेक अपने खेत में खेजड़ी के पेड़ों की छंटाई कर रहा था। इसी दौरान प्रतिवादी संख्या 2 अपने परिवार के अन्य सदस्यों (प्रतिवादी संख्या 3 और 4) के साथ तेज रफ्तार में ट्रैक्टर चलाते हुए खेत में घुस आया। उसने अपीलकर्ता और उसके परिजनों को कुचलने के इरादे से ट्रैक्टर को बार-बार उनकी ओर दौड़ाया, जिसकी चपेट में आकर अपीलकर्ता की मां इंद्र देवी की कमर पर चोट लगी और वह जमीन पर गिर पड़ीं।
इसके बाद, प्रतिवादी संख्या 2 और अन्य सह-आरोपियों ने तेज धारदार कृषि हथियारों (कुल्हाड़ी/काशी) से परिवार पर हमला बोल दिया। इस हमले में अपीलकर्ता के बाएं हाथ पर 7 सेमी × 3 सेमी का हड्डी तक गहरा घाव हो गया। अपीलकर्ता के पिता दिलीप कुमार को दो धारदार चोटें आईं, जिनमें दाहिनी कलाई पर 7 सेमी × 3 सेमी का हड्डी तक गहरा घाव और अग्रबाहु (फोरआर्म) पर 6 सेमी × 3 सेमी का मांसपेशियों तक गहरा घाव शामिल था। वहीं, अपीलकर्ता की मां को 2 सेमी × 1 सेमी की खरोंच आई।
घटना के अगले दिन 27 नवंबर 2020 को मेड़ता रोड पुलिस थाने में आईपीसी की धारा 143, 307, 323, 341 और 447 के तहत एफआईआर दर्ज की गई। जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की और मामला मेड़ता के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश की अदालत में भेजा गया। 28 नवंबर 2023 को सत्र अदालत ने प्रतिवादी संख्या 2 के खिलाफ आईपीसी की धारा 447, 323, 324, 326 सहपठित धारा 34 और धारा 307 के तहत आरोप तय किए, जबकि शेष आरोपियों पर धारा 307 को छोड़कर अन्य धाराओं में आरोप तय किए गए।
आरोप तय किए जाने के खिलाफ आरोपियों ने राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ में पुनरीक्षण याचिका (रिवीजन पिटीशन) दायर की। 1 अप्रैल 2025 को हाईकोर्ट ने याचिका आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए कहा कि चूंकि चोटें कलाई और हाथ जैसे गैर-घातक हिस्सों पर थीं और मां को केवल खरोंच आई थी, इसलिए “याचिकाकर्ता संख्या 1 के खिलाफ धारा 307 आईपीसी के तहत अपराध नहीं बनता है। अधिक से अधिक, यह मामला धारा 308 आईपीसी से आगे नहीं जा सकता।” हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को धारा 308 के तहत आरोप तय करने का निर्देश दिया, जिसके बाद अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
अदालत के समक्ष दलीलें
अपीलकर्ता की ओर से पेश वकील निशांत बिश्नोई ने दलील दी कि हाईकोर्ट ने आरोप में बदलाव करके गंभीर कानूनी भूल की है। उन्होंने कहा कि स्थापित कानून के अनुसार, धारा 307 के लिए मृत्यु कारित करने में सक्षम चोट का वास्तव में लगना आवश्यक नहीं है। आरोपी का इरादा और ज्ञान हथियारों की प्रकृति, पुरानी रंजिश और हमले के तरीके जैसी समग्र परिस्थितियों से तय होता है।
उन्होंने बताया कि आरोपी कुल्हाड़ी और ट्रैक्टर जैसे घातक साधनों से लैस होकर आए थे, जो सामान्य परिस्थितियों में जान लेने में पूरी तरह सक्षम हैं। अपीलकर्ता और उसके पिता के हाथों और कलाई पर आए गहरे घाव आत्मरक्षा के दौरान लगे थे, जब वे अपने सिर पर किए जा रहे कुल्हाड़ी के वार को रोकने की कोशिश कर रहे थे। स्टेट ऑफ मध्य प्रदेश बनाम सलीम उर्फ चमरू और जागे राम बनाम स्टेट ऑफ हरियाणा मामलों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि आरोप तय करने के चरण में अदालत को केवल प्रथम दृष्टया मामला देखना होता है, न कि मिनी-ट्रायल चलाना।
राजस्थान राज्य की ओर से पेश वकील एस. उदय कुमार सागर ने अपील का समर्थन किया। उन्होंने स्टेट ऑफ महाराष्ट्र बनाम बलराम बामा पाटिल का हवाला देते हुए कहा कि धारा 307 का मुख्य पैमाना आरोपी की मंशा और ज्ञान है, न कि चिकित्सीय परिणाम। उन्होंने साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत बरामद किए गए धारदार हथियारों और मुख्य आरोपी के आपराधिक इतिहास की ओर भी अदालत का ध्यान आकर्षित किया।
नोटिस की तामील पूरी होने के बावजूद आरोपी प्रतिवादियों की ओर से कोई भी अदालत में उपस्थित नहीं हुआ।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और कानूनी नजीरें
आईपीसी की धारा 307 के वैधानिक पहलुओं की पड़ताल करते हुए पीठ ने रेखांकित किया कि इस संबंध में कानूनी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट है। इस प्रावधान को लागू करने के लिए अदालत को यह देखना होता है कि क्या कृत्य ऐसे इरादे या ज्ञान के साथ और ऐसी परिस्थितियों में किया गया था कि यदि उससे मौत हो जाती, तो अपराधी हत्या का दोषी होता।
स्टेट ऑफ महाराष्ट्र बनाम बलराम बामा पाटिल, स्टेट ऑफ मध्य प्रदेश बनाम सलीम उर्फ चमरू और जागे राम बनाम स्टेट ऑफ हरियाणा (जिसमें स्टेट ऑफ मध्य प्रदेश बनाम काशीराम को उद्धृत किया गया था) के निर्णयों का उल्लेख करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया:
“धारा 307 के तहत दोषसिद्धि को उचित ठहराने के लिए इतना पर्याप्त है कि अभियुक्त का इरादा मौजूद हो और उसके क्रियान्वयन में कोई प्रत्यक्ष कृत्य किया गया हो। यह आवश्यक नहीं है कि मृत्यु कारित करने में सक्षम शारीरिक चोट वास्तव में पहुंचाई ही गई हो। यह धारा अभियुक्त के कृत्य और उसके परिणाम (यदि कोई हो) के बीच अंतर करती है। अदालत को यह देखना होता है कि क्या वह कृत्य, उसके परिणाम की परवाह किए बिना, उस इरादे या ज्ञान के साथ और धारा में उल्लिखित परिस्थितियों के तहत किया गया था। इसलिए, धारा 307 आईपीसी के तहत आरोपित व्यक्ति को केवल इस आधार पर बरी नहीं किया जा सकता कि पीड़ित को लगी चोटें साधारण चोट की प्रकृति की थीं।”
पीठ ने जागे राम मामले की इस टिप्पणी को भी दोहराया:
“निर्णायक प्रश्न इरादा या ज्ञान है, जैसा भी मामला हो, न कि चोट की प्रकृति।”
सुप्रीम कोर्ट ने हालिया फैसले सुरेंद्र कुमार बनाम स्टेट ऑफ हरियाणा का भी संदर्भ दिया और कहा कि शरीर के गैर-घातक अंग पर चोट लगने मात्र से धारा 307 की प्रयोज्यता खारिज नहीं हो जाती।
अदालत ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 227 और 228 के तहत आरोप तय करने के स्तर पर अदालतों को कोई मिनी-ट्रायल नहीं चलाना होता और न ही अंतिम दोषसिद्धि की तरह साक्ष्यों का मूल्यांकन करना होता है। अदालत को केवल यह देखना होता है कि क्या रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री प्रथम दृष्टया मामला बनाती है और आरोपी पर पुख्ता संदेह पैदा करती है।
मौजूदा मामले के तथ्यों का जिक्र करते हुए अदालत ने पाया कि मुख्य आरोपी ने भारी ट्रैक्टर से जानलेवा तरीके से खेत में घुसकर हमला किया, मां को टक्कर मारी और साथियों के साथ मिलकर कुल्हाड़ी से वार किए। चार्जशीट के अनुसार, आरोपियों ने सिर पर वार करने की नीयत से हमला किया था और पीड़ितों द्वारा सिर बचाने के लिए हाथ आगे करने की वजह से घाव उनके हाथों व कलाई पर लगे।
अदालत ने माना कि हाईकोर्ट ने केवल चोटों के स्थान के आधार पर धारा 307 न बनने का निष्कर्ष निकालकर तकनीकी और संक्षिप्त मूल्यांकन करने की गलती की। इसके अलावा, हाईकोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 216 के तहत दिए गए वैधानिक प्रावधानों को भी नजरअंदाज किया, जो ट्रायल कोर्ट को फैसला सुनाए जाने से पहले किसी भी समय आरोप में बदलाव या संशोधन करने की शक्ति देता है। यदि ट्रायल के दौरान सबूतों से धारा 307 के तत्व सिद्ध नहीं होते, तो निचली अदालत के पास आरोप बदलने का विकल्प हमेशा खुला रहता है। ऐसे में शुरुआत में ही हाईकोर्ट का दखल अनुचित था।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट के 1 अप्रैल 2025 के आदेश को निरस्त कर दिया और मेड़ता की सत्र अदालत द्वारा 28 नवंबर 2023 को प्रतिवादी संख्या 2 के खिलाफ धारा 307 आईपीसी के तहत तय किए गए आरोपों को बहाल कर दिया।
पीठ ने स्पष्ट किया कि ये टिप्पणियां केवल इस अपील के निपटारे तक सीमित हैं और ट्रायल कोर्ट मामले के गुण-दोष पर किसी भी पूर्वाग्रह के बिना स्वतंत्र रूप से सुनवाई आगे बढ़ाएगा।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: अभिषेक बनाम राजस्थान राज्य एवं अन्य
वाद संख्या: आपराधिक अपील संख्या 4767/2026
पीठ: जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली
निर्णय की तिथि: 7 अक्टूबर, 2026

