सार्वजनिक पद पर अभ्यर्थी की पात्रता आवेदन की अंतिम तिथि या नियुक्ति की तारीख पर लागू नियमों से तय होगी: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी भी सार्वजनिक पद पर नियुक्ति के लिए किसी अभ्यर्थी की पात्रता आवेदन पत्र जमा करने की अंतिम तिथि या अधिकतम नियुक्ति की तिथि पर लागू सेवा नियमों के आधार पर परखी जानी चाहिए। पटना हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के उस आदेश को खारिज करते हुए, जिसमें राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) से गैर-मान्यता प्राप्त संस्थान के प्रशिक्षण प्रमाण पत्र पर नियुक्त एक प्रशिक्षित प्रखंड शिक्षक को सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया गया था, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने निर्णय दिया कि अभ्यर्थी वर्ष 2007 में अपनी नियुक्ति के समय लागू वैधानिक पात्रता शर्तों को पूरा नहीं करता था।

मामले की पृष्ठभूमि

प्रतिवादी नंदेश्वर कुमार को 2 जनवरी 1995 को डॉ. बी. सी. रॉय कॉलेज ऑफ एजुकेशन, कलकत्ता द्वारा सीनियर टीचर ट्रेनिंग सर्टिफिकेट जारी किया गया था। इसके कुछ माह बाद, 1 जुलाई 1995 को राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद अधिनियम, 1993 (एनसीटीई एक्ट) पूरे देश में प्रभावी हुआ।

वर्ष 2007 में, बिहार पंचायत प्रारंभिक शिक्षक (नियोजन एवं सेवा शर्त) नियमावली, 2006 के तहत प्रतिवादी को 11 सितंबर 2007 को प्रशिक्षित प्रखंड शिक्षक के पद पर नियुक्त किया गया।

नियुक्ति के लगभग आठ वर्ष बाद, 31 अक्टूबर 2015 को जिला कार्यक्रम पदाधिकारी ने जांच में पाया कि प्रतिवादी का शिक्षक प्रशिक्षण प्रमाण पत्र एक गैर-मान्यता प्राप्त संस्थान से जारी हुआ था। इसके बाद 26 नवंबर 2015 को प्रतिवादी को कारण बताओ नोटिस जारी कर पूछा गया कि उसकी सेवाएं क्यों न समाप्त कर दी जाएं।

प्रतिवादी ने 28 नवंबर 2015 को अपना स्पष्टीकरण देते हुए तर्क दिया कि उसने अपनी शैक्षणिक योग्यता एनसीटीई कानून लागू होने से काफी पहले हासिल कर ली थी। उसने यह भी कहा कि उक्त कॉलेज पश्चिम बंगाल सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम, 1961 के तहत पंजीकृत था और इसी कॉलेज के प्रमाण पत्र पर विनोद कुमार नाम का एक अन्य अभ्यर्थी भी प्रशिक्षित प्रखंड शिक्षक के रूप में कार्यरत है। संबंधित प्राधिकारी प्रतिवादी के इस जवाब से संतुष्ट नहीं हुए और 2 दिसंबर 2015 को उसकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं।

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अपीलीय प्राधिकार और हाईकोर्ट का रुख

सेवा समाप्ति के खिलाफ प्रतिवादी ने पटना हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट ने सीडब्ल्यूजेसी संख्या 19322/2015 में मामले के गुण-दोष पर विचार किए बिना प्रतिवादी को जिला शिक्षक अपीलीय प्राधिकार के समक्ष जाने की छूट दी।

जिला शिक्षक अपीलीय प्राधिकार ने 20 फरवरी 2016 को बर्खास्तगी आदेश को रद्द कर दिया और सभी परिणामी लाभों के साथ प्रतिवादी को सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया।

हालांकि, राज्य अपीलीय प्राधिकार ने 16 सितंबर 2022 को जिला प्राधिकार के आदेश को पलट दिया। राज्य प्राधिकार ने अपने निर्णय में मुख्य रूप से दो आधारों का उल्लेख किया:

  1. एलपीए संख्या 244/2011 में 14 सितंबर 2012 का पूर्व आदेश, जिसमें पाया गया था कि डॉ. बी. सी. रॉय कॉलेज ऑफ एजुकेशन, कलकत्ता न तो एनसीटीई से मान्यता प्राप्त था और न ही बिहार सरकार द्वारा।
  2. झारखंड हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच द्वारा एलपीए संख्या 235/2004 में 30 मार्च 2005 को दिया गया फैसला। उस मामले में अदालत ने पक्षकारों की ओर से समुचित सहायता न मिलने पर डॉ. बी. सी. रॉय कॉलेज सहित नौ संस्थानों के प्रमाण पत्रों का स्व-मूल्यांकन किया था और पाया था कि सभी संस्थानों के प्रमाण पत्र प्रारूप, प्राचार्यों के हस्ताक्षर और परीक्षकों के हस्ताक्षर एक जैसे थे, तथा डॉ. बी. सी. रॉय कॉलेज केवल कागजों पर ही अस्तित्व में था।

राज्य अपीलीय प्राधिकार के फैसले को चुनौती देते हुए प्रतिवादी ने पटना हाईकोर्ट की सिंगल बेंच में याचिका दायर की, जिसे सिंगल जज ने 10 नवंबर 2022 को खारिज कर दिया।

इसके बाद प्रतिवादी ने डिवीजन बेंच के समक्ष लेटर पेटेंट अपील (एलपीए संख्या 669/2022) दायर की। 8 जुलाई 2025 को डिवीजन बेंच ने सिंगल जज का आदेश रद्द करते हुए प्रतिवादी को चार महीने के भीतर सभी मौद्रिक व परिणामी लाभों के साथ सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया। डिवीजन बेंच का मानना था कि एनसीटीई कानून 1 जुलाई 1995 से भविष्यलक्षी प्रभाव से लागू हुआ था, इसलिए इसका असर जनवरी 1995 में जारी प्रमाण पत्र पर नहीं पड़ेगा। डिवीजन बेंच ने यह भी टिप्पणी की थी कि राज्य सरकार ने पश्चिम बंगाल के सक्षम प्राधिकारियों से यह सत्यापित नहीं कराया कि संस्थान वैध था या नहीं।

डिवीजन बेंच के इस फैसले के खिलाफ बिहार सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।

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सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और वैधानिक स्थिति

सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए रेखांकित किया कि पूर्व में डॉ. बी. सी. रॉय कॉलेज ऑफ एजुकेशन के प्रमाण पत्रों की वैधता परखने के दौरान अदालतों ने आवश्यक साक्ष्यों के अभाव में स्वयं मूल्यांकन का सहारा लिया था। शीर्ष अदालत ने सीमा कुमारी एवं अन्य बनाम झारखंड राज्य एवं अन्य (2006) 12 SCC 215 के फैसले का भी संदर्भ दिया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड हाईकोर्ट द्वारा एलपीए संख्या 235/2004 में इन संस्थानों की सत्यता पर संदेह व्यक्त करने वाली टिप्पणियों और निष्कर्षों को निरस्त कर दिया था।

पीठ ने स्पष्ट किया कि भले ही संस्थानों की सत्यता को लेकर पहले कानूनी अनिश्चितता रही हो, लेकिन इस मामले में एक स्पष्ट वैधानिक बाधा मौजूद है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। प्रतिवादी की नियुक्ति 11 सितंबर 2007 को बिहार पंचायत प्रारंभिक शिक्षक (नियोजन एवं सेवा शर्त) नियमावली, 2006 के तहत हुई थी। इस नियमावली के नियम 8(क) के तहत प्रखंड शिक्षक पद के लिए न्यूनतम पात्रता तय की गई थी:

“राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एन.सी.टी.ई.) से मान्यता प्राप्त प्रशिक्षण संस्थान से दो वर्षीय शिक्षक प्रशिक्षण, डिप्लोमा या प्रमाण पत्र अथवा प्रारंभिक शिक्षा में स्नातक (बी.एल.एड.) या बी.एड. या समकक्ष योग्यता।”

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि प्रतिवादी के पास प्रमाण पत्र तो था, लेकिन वह संस्थान एनसीटीई से मान्यता प्राप्त नहीं था, क्योंकि प्रमाण पत्र जारी होने के समय एनसीटीई एक्ट लागू ही नहीं हुआ था। चूंकि प्रतिवादी की नियुक्ति 2007 में हुई थी और उस समय 2006 की नियमावली लागू थी, इसलिए एनसीटीई द्वारा मान्यता प्राप्त संस्थान की योग्यता होना एक अनिवार्य वैधानिक शर्त थी।

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हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के तर्क को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा:

“आक्षेपित आदेश में अपनाया गया यह दृष्टिकोण त्रुटिपूर्ण है, क्योंकि किसी भी सार्वजनिक पद पर नियुक्ति के लिए किसी अभ्यर्थी की पात्रता आवेदन पत्र जमा करने की अंतिम तिथि या अधिक से अधिक नियुक्ति की तिथि के आधार पर देखी जाती है। इसमें स्पष्ट रूप से निर्धारित किया गया था कि पद की पेशकश प्रतिवादी को बिहार पंचायत प्रारंभिक शिक्षक (नियोजन एवं सेवा शर्त) नियमावली, 2006 के तहत की जा रही है। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि जैसा ऊपर उल्लेख किया गया है, प्रशिक्षित प्रखंड शिक्षक बनने की पात्रता एनसीटीई द्वारा मान्यता प्राप्त संस्थान से डिप्लोमा/प्रमाण पत्र थी, जो संबंधित समय पर प्रतिवादी के पास नहीं थी।”

पीठ ने अपने निष्कर्ष में कहा:

“चाहे जो भी हो, हमारा यह सुविचारित मत है कि वर्ष 2007 में अपनी नियुक्ति के समय 2006 की नियमावली के तहत प्रतिवादी की उम्मीदवारी को पात्र नहीं माना जा सकता था।”

अदालत का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि प्रतिवादी अपनी नियुक्ति के समय लागू वैधानिक पात्रता मानदंडों को पूरा नहीं करता था, इसलिए पटना हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच द्वारा एलपीए संख्या 669/2022 में पारित आदेश टिकने योग्य नहीं है।

तदनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने डिवीजन बेंच के आदेश को दरकिनार करते हुए बिहार सरकार द्वारा दायर सिविल अपील संख्या 13079/2026 को स्वीकार कर लिया और प्रतिवादी की लेटर पेटेंट अपील को खारिज कर दिया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: बिहार राज्य और अन्य बनाम नंदेश्वर कुमार
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 13079/2026
पीठ: जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू
निर्णय की तिथि: 07 अक्टूबर, 2026

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