प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन की विशिष्ट दलील वाली रिट याचिका को वैकल्पिक उपाय के आधार पर शुरुआत में ही खारिज नहीं किया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी रिट याचिका में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विशिष्ट और तथ्यात्मक उल्लंघन की दलीलें दी गई हैं, तो उसे वैधानिक वैकल्पिक उपाय की उपलब्धता के आधार पर शुरुआती स्तर (थ्रेशोल्ड) पर ही खारिज नहीं किया जा सकता। लखनऊ के श्री जयनारायण मिश्र स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्राचार्य की वरिष्ठता और नियुक्ति से जुड़े विवाद में सिंगल जज के आदेश को रद्द करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि याचिका की ‘पोषणीयता’ (मेंटेनेबिलिटी) और उसकी ‘स्वीकार्यता’ (एंटरटेनेबिलिटी) दो भिन्न कानूनी अवधारणाएं हैं। कोर्ट ने माना कि वैकल्पिक वैधानिक उपाय के इस्तेमाल का नियम न्यायिक स्व-नियंत्रण और विवेक का नियम है, न कि कोई पूर्ण संवैधानिक रोक।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता विनोद चंद्रा को उत्तर प्रदेश उच्च शिक्षा सेवा आयोग, इलाहाबाद की संस्तुतियों के आधार पर 28 अगस्त 1991 को प्रवक्ता पद पर नियुक्त किया गया था। बाद में उन्हें श्री जयनारायण मिश्र स्नातकोत्तर महाविद्यालय, लखनऊ में प्राचार्य के पद पर पदोन्नत किया गया। अपनी सेवा के दौरान चंद्रा ने कॉमनवेल्थ एकेडमिक स्टाफ स्कॉलरशिप स्कीम के तहत विदेश अध्ययन हेतु 1995 से 1998 और 1998 से 1999 के दौरान कुल 3 वर्ष 335 दिनों का सवेतन अवकाश लिया। इसके अतिरिक्त, उन्होंने 1999–2000, 2004–2006 और 2014 के दौरान कुल 3 वर्ष 338 दिनों का अवैतनिक अवकाश लिया। चंद्रा के अनुसार, ये सभी अवकाश सक्षम प्राधिकारी द्वारा विधिवत स्वीकृत किए गए थे।

10 जून 2020 को कॉलेज के प्राचार्य ने आपत्तियां आमंत्रित करने के बाद शिक्षकों की वरिष्ठता सूची जारी की। इस सूची में चंद्रा को क्रम संख्या 6 पर रखा गया, जबकि निजी प्रतिवादी (प्रतिवादी संख्या 4) को क्रम संख्या 15 पर रखा गया। प्रतिवादी संख्या 4 की नियमित नियुक्ति 21 जून 1990 को हुई थी और उनका नियमितीकरण 14 जून 1992 को हुआ था। लखनऊ विश्वविद्यालय की प्रथम नियमावली और उत्तर प्रदेश राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम, 1973 के तहत निर्धारित 60 दिनों की वैधानिक अवधि के भीतर प्रतिवादी संख्या 4 या किसी अन्य व्यक्ति ने उस वरिष्ठता सूची के खिलाफ कोई अपील नहीं की।

लगभग तीन साल बाद, 14 मार्च 2023 को प्रतिवादी संख्या 4 ने प्राचार्य के समक्ष प्रत्यावेदन देकर आरोप लगाया कि चंद्रा द्वारा लिया गया अवकाश अनाधिकृत था और इससे उनकी सेवा में व्यवधान (ब्रेक इन सर्विस) आया। हालांकि, प्राचार्य द्वारा 30 जून 2023 को जारी नई वरिष्ठता सूची में भी चंद्रा को वरिष्ठता क्रम संख्या 4 पर और प्रतिवादी संख्या 4 को क्रम संख्या 8 पर रखा गया। वरिष्ठतम शिक्षक होने के नाते चंद्रा को 1 जुलाई 2023 को प्राचार्य पद पर नियुक्त कर दिया गया।

इस नियुक्ति से असंतुष्ट होकर प्रतिवादी संख्या 4 ने चंद्रा की सेवा निरंतरता और वरिष्ठता को चुनौती देते हुए लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति के समक्ष अपील दायर की। कुलपति ने मामले की जांच के लिए एक समिति गठित की, जिसे बाद में भंग करके पुनर्गठित कर दिया गया। पुनर्गठित समिति ने 3 नवंबर 2025 को अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसमें निष्कर्ष निकाला गया कि चंद्रा की सेवा अवधि प्रतिवादी संख्या 4 की तुलना में 40 दिन कम थी और इस आधार पर प्रतिवादी संख्या 4 को वरिष्ठ माना गया। इस रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए कुलपति ने 14 नवंबर 2025 को आदेश पारित कर प्रतिवादी संख्या 4 को वरिष्ठ घोषित कर दिया। इसके बाद कॉलेज प्रबंधन ने वरिष्ठता सूची में संशोधन किया और 30 नवंबर 2025 को प्रस्ताव पारित कर प्राचार्य पद का कार्यभार प्रतिवादी संख्या 4 को सौंप दिया।

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चंद्रा ने इन निर्णयों को संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत सिंगल जज के समक्ष रिट याचिका दायर कर चुनौती दी। हालांकि, सिंगल जज ने 17 दिसंबर 2025 को प्रतिवादियों से कोई जवाबी हलफनामा (काउंटर एफिडेविट) मांगे बिना ही रिट याचिका को इस आधार पर खारिज कर दिया कि उत्तर प्रदेश राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम, 1973 की धारा 68 के तहत एक प्रभावी वैकल्पिक वैधानिक उपाय उपलब्ध है। इसके बाद चंद्रा ने इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में विशेष अपील (स्पेशल अपील) दायर की।

पक्षकारों की दलीलें और वकीलों की मौजूदगी

अपीलकर्ता की ओर से अधिवक्ता अनुपम मेहरोत्रा, सहयोगी अधिवक्ता देश दीपक सिंह और अधिवक्ता रजत श्रीवास्तव उपस्थित हुए। मेहरोत्रा ने दलील दी कि सिंगल जज का आदेश कानूनी रूप से टिकने योग्य नहीं है क्योंकि कुलपति का निर्णय दुर्भावना से ग्रस्त था और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के घोर उल्लंघन में पारित किया गया था। उन्होंने बताया कि मूल जांच समिति को अपीलकर्ता को बिना कोई सूचना दिए पुनर्गठित किया गया, पुनर्गठित समिति के समक्ष अपीलकर्ता को सुनवाई का उचित अवसर नहीं दिया गया और कुलपति के पास विधिवत स्वीकृत अवकाश को सेवा में व्यवधान घोषित करने का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं था। उन्होंने यह भी कहा कि प्रतिवादी संख्या 4 ने 2020 की वरिष्ठता सूची को संविधि 18.14 के तहत निर्धारित 60 दिनों की अवधि के भीतर चुनौती नहीं दी थी। अपनी दलीलों के समर्थन में अपीलकर्ता के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों—डॉ. बाल कृष्ण अग्रवाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, मैनेजिंग डायरेक्टर, ईसीआईएल, हैदराबाद बनाम बी. करुणाकर, उत्तर प्रदेश राज्य बनाम राम प्रकाश सिंह, और यूनियन ऑफ इंडिया बनाम मोहम्मद रमजान खान का हवाला दिया।

प्रतिवादी संख्या 4 का पक्ष रखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव मेहरोत्रा, जिनके साथ सहयोगी अधिवक्ता अकबर अहमद, ज्ञानेश बाजपेयी, अतुल दीक्षित और सुश्री मंजरी मौजूद थे, ने दलील दी कि रिट कोर्ट द्वारा एक बार विवेकाधिकार का प्रयोग किए जाने के बाद केवल इसलिए इंट्रा-कोर्ट अपील स्वीकार नहीं की जा सकती क्योंकि दूसरा दृष्टिकोण संभव था। उन्होंने इसके समर्थन में बिहार इंडस्ट्रियल एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी बनाम स्कोप सेल्स लिमिटेड का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि समिति की रिपोर्ट केवल संस्तुति मात्र थी, अपीलकर्ता ने प्रक्रिया में भाग लिया था और उन्हें पर्याप्त अवसर मिला था, जिसके लिए उन्होंने एसबीआई बनाम अमित आयरन (पी) लिमिटेड पर भरोसा जताया। वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया कि अपीलकर्ता के पास 1973 के अधिनियम की धारा 68 के तहत समान रूप से प्रभावी वैकल्पिक उपाय उपलब्ध था और उन्होंने लीलावती एन. बनाम कर्नाटक राज्य का हवाला दिया। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि प्रतिवादी संख्या 4 सिंगल जज के समक्ष गुण-दोष के आधार पर मामले के निस्तारण के लिए तैयार हैं और उन्होंने जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए दस दिनों का समय मांगा।

मामले में प्रतिवादी संख्या 2 का प्रतिनिधित्व अधिवक्ता सावित्र वर्धन सिंह और अधिवक्ता अनुराग कुमार सिंह ने किया, प्रतिवादी संख्या 3 की ओर से अधिवक्ता अवधेश शुक्ला उपस्थित हुए, तथा राज्य की ओर से मुख्य स्थायी अधिवक्ता (सीएससी) पेश हुए।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण

जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि सिंगल जज द्वारा शुरुआती स्तर पर खारिज किए जाने का फैसला स्कोप सेल्स के सिद्धांत के तहत अपीलीय हस्तक्षेप से मुक्त है। पीठ ने टिप्पणी की कि वह नियम तब लागू होता है जब रिट कोर्ट ने पूरे रिकॉर्ड पर दोनों पक्षों के तर्कों का आकलन किया हो। कोर्ट ने कहा कि “उस निर्णय के खिलाफ इंट्रा-कोर्ट अपील किसी सुलझे हुए विवाद पर दूसरी राय मांगने की याचिका नहीं है। हमारे विचार में, यह दूसरी तरफ से बिना किसी साक्ष्य के तय किए गए शुरुआती निष्कर्ष को चुनौती है।”

वैकल्पिक उपाय के सिद्धांत का विश्लेषण करते हुए पीठ ने माना कि अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट का अधिकार क्षेत्र “पूर्ण (प्लेनरी) प्रकृति का है और संविधान के किसी अन्य प्रावधान से सीमित नहीं है” और यह प्रतिबंध पूरी तरह से “स्वतः लागू किया गया (सेल्फ-इम्पोज्ड)” है। पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों—व्हर्लपूल कॉरपोरेशन बनाम रजिस्ट्रार ऑफ ट्रेड मार्क्स, मुंबई, राधा कृष्ण इंडस्ट्रीज बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य, और तीन-न्यायाधीशों की पीठ के फैसले असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ स्टेट टैक्स बनाम कमर्शियल स्टील लिमिटेड का उल्लेख किया, जिनमें वैकल्पिक उपाय के नियम के चार स्पष्ट अपवाद तय किए गए हैं: मौलिक अधिकारों का प्रवर्तन, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन, अधिकार क्षेत्र का अभाव या उसका अतिक्रमण, और किसी कानून की वैधानिकता को चुनौती।

हाईकोर्ट ने कहा कि सिंगल जज ने जवाबी हलफनामे के बिना ही यह मानकर तय कानूनी प्रक्रिया को उलट दिया कि चंद्रा का मामला इन अपवादों के दायरे में नहीं आता। पीठ ने इस बात पर जोर दिया:

“प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन की विवादित दलील को केवल खारिज मानकर नहीं सुलझाया जा सकता, जैसा कि आक्षेपित आदेश में करने का प्रयास किया गया है।”

कोर्ट ने रेखांकित किया कि चंद्रा ने विशिष्ट और तथ्यात्मक उल्लंघन के आधार रखे थे: समिति को उन्हें सूचित किए बिना भंग और पुनर्गठित किया गया, उनकी सेवा अवधि की पुनर्गणना करते समय 13 मार्च 2012 के उस सरकारी आदेश पर विचार नहीं किया गया जिसमें उनके अवकाश को मंजूरी दी गई थी, और कुलपति ने चंद्रा को बदले हुए आधारों पर अपना पक्ष रखने का अवसर दिए बिना ही रिपोर्ट पर कार्रवाई कर दी।

यह देखते हुए कि प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन हुआ है या नहीं, यह स्वयं एक तथ्यात्मक प्रश्न है, खंडपीठ ने निर्णय दिया कि सिंगल जज केवल याचिका की सामग्री के आधार पर ऐसा निष्कर्ष नहीं निकाल सकते थे। पीठ ने उचित कानूनी प्रक्रिया निर्धारित करते हुए कहा:

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“जवाबी हलफनामा (काउंटर एफिडेविट) मंगाना, फिर दोनों पक्षों के तर्कों के आधार पर दलील का परीक्षण करना, उसके बाद यह तय करना कि क्या अपवाद लागू होता है और अंत में यह तय करना कि क्या याचिकाकर्ता को वैकल्पिक उपाय के पास भेजने के पक्ष में विवेकाधिकार का प्रयोग किया जाना चाहिए।”

सुप्रीम कोर्ट के मेसर्स गोदरेज सारा ली लिमिटेड बनाम द एक्साइज एंड टैक्सेशन ऑफिसर-कम-असेसिंग अथॉरिटी के निर्णय का हवाला देते हुए कोर्ट ने दोहराया कि “रिट याचिका की ‘स्वीकार्यता’ (एंटरटेनेबिलिटी) और ‘पोषणीयता’ (मेंटेनेबिलिटी) दो अलग-अलग अवधारणाएं हैं। इन दोनों के बीच के सूक्ष्म लेकिन वास्तविक अंतर को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।” कोर्ट ने गोदरेज सारा ली के हवाले से कहा कि “हाईकोर्ट द्वारा किसी रिट याचिका को केवल इस आधार पर खारिज कर देना कि याचिकाकर्ता ने वैकल्पिक उपाय का इस्तेमाल नहीं किया है, जबकि यह जांच ही न की जाए कि क्या याचिका पर सुनवाई के लिए कोई असाधारण मामला बनता है, उचित नहीं होगा।”

कोर्ट का फैसला

हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सिंगल जज के 17 दिसंबर 2025 के आदेश को रद्द करते हुए रिट याचिका (रिट-ए संख्या 14662 / 2025) को उसके मूल नंबर पर बहाल कर दिया।

अदालत ने मामले को गुण-दोष के आधार पर नए सिरे से विचार के लिए सिंगल जज के पास वापस भेज दिया और निर्देश दिया कि याचिका पर शीघ्रता से, अधिमानतः छह सप्ताह के भीतर सुनवाई की जाए, क्योंकि अपीलकर्ता की सेवा का केवल एक वर्ष शेष बचा है। प्रतिवादियों को दस दिनों के भीतर अपना जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया, जिसके बाद अपीलकर्ता को तीन दिनों के भीतर प्रत्युत्तर हलफनामा (रिजॉइंडर) दाखिल करने की छूट दी गई। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन सहित सभी गुण-दोष संबंधी बिंदुओं पर अंतिम निर्णय लेने के लिए सिंगल जज स्वतंत्र रहेंगे।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: विनोद चंद्रा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, प्रमुख सचिव, उच्च शिक्षा विभाग, लखनऊ एवं 4 अन्य 

वाद संख्या: स्पेशल अपील संख्या 10 / 2026 

पीठ: जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी 

निर्णय की तिथि: 05 अक्टूबर 2026

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