कलकत्ता हाईकोर्ट ने 22 साल पुरानी शादी की समाप्त: शारीरिक संबंधों से लगातार इनकार को माना क्रूरता, 10 लाख रुपये गुजारा भत्ता तय

कलकत्ता हाईकोर्ट ने बिना शारीरिक संबंध बने 22 साल से खिंच रहे एक वैवाहिक रिश्ते को समाप्त करते हुए पति को तलाक की डिक्री दे दी है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि बिना किसी वैध या चिकित्सकीय आधार के वैवाहिक संबंधों से लंबे समय तक इनकार करना क्रूरता के दायरे में आता है, जिससे यह शादी पूरी तरह टूट चुकी है।

जस्टिस देबांगशु बसाक और जस्टिस आर्यक दत्त की खंडपीठ ने 5 अक्टूबर को यह फैसला सुनाते हुए पति को अपनी अलग रह रही पत्नी को 10 लाख रुपये का स्थायी गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया। पीठ ने रेखांकित किया कि अप्रैल 2004 में शादी के बंधन में बंधा यह जोड़ा शादी के बाद बमुश्किल एक महीने ही साथ रहा था। एक अदालती आदेश के तहत थोड़े समय के लिए साथ रहने की अनिवार्यता को छोड़ दें, तो दोनों तभी से अलग रह रहे थे।

शारीरिक संबंध न बनने और क्रूरता पर अदालत की टिप्पणी

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि शादी के पूरे 22 वर्षों के दौरान दोनों के बीच कभी शारीरिक संबंध स्थापित नहीं हुए। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई चिकित्सकीय साक्ष्य या वैध आधार मौजूद नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि दोनों में से कोई भी इसके लिए शारीरिक रूप से अक्षम था। उपलब्ध दस्तावेजों और परिस्थितियों से यही सामने आता है कि दोनों पक्षों ने अपनी मर्जी से एक-दूसरे के साहचर्य से खुद को अलग कर लिया था।

पीठ ने स्पष्ट किया कि इस मामले में सामने आई क्रूरता सीधे तौर पर वैवाहिक अधिकारों और शारीरिक संबंधों से लगातार इनकार का नतीजा है, जिसने रिश्ते को इस मोड़ पर पहुंचा दिया जहां से किसी समझौते की गुंजाइश नहीं बची थी।

READ ALSO  कोई भी सभ्य समाज, कोई भी संस्था जो कानून के शासन से संचालित होती है, बुजुर्गों की यातना को नजरअंदाज करने का विकल्प नहीं चुन सकती: दिल्ली कोर्ट

क्या है पूरा विवाद और आरोप

पति ने क्रूरता और परित्याग का हवाला देते हुए जुलाई 2016 में तलाक की अर्जी दाखिल की थी। पति के अनुसार, अप्रैल 2004 में शादी के करीब चार सप्ताह के भीतर ही पत्नी ससुराल छोड़कर चली गई थी। पति ने आरोप लगाया था कि उसकी पत्नी ने वैवाहिक संबंध बनाने से साफ मना कर दिया था। उसका कहना था कि संबंध बनाने से उसका शारीरिक आकार (फिगर) बिगड़ जाएगा और उसके बाद कोई उसकी तरफ ध्यान नहीं देगा।

READ ALSO  हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के आरोपियों को हाईकोर्ट ने जमानत दी

दोनों पक्षों की दलीलें और साक्ष्य

अदालत में पति की ओर से पेश वकील कौशल पॉल ने बताया कि हाईकोर्ट के एक अंतरिम आदेश के बाद दोनों को कुछ समय के लिए पति-पत्नी के तौर पर एक साथ रहने का निर्देश दिया गया था। हालांकि, वकील ने स्पष्ट किया कि उस अवधि में भी पति उस घर में नहीं रहा और न ही दोनों के बीच कभी कोई सहवास हुआ।

दूसरी तरफ, पत्नी के वकील प्रांतिक घोष ने तर्क दिया कि पति ने क्रूरता के आरोपों को लेकर कोई स्पष्ट और पुख्ता विवरण नहीं दिया है। इसके अलावा, शादी के बाद शारीरिक संबंध न बनने की किसी तय तारीख का ब्योरा भी अदालत के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया।

हालांकि, खंडपीठ ने दोनों पक्षों के तर्कों का विश्लेषण करते हुए पाया कि शारीरिक संबंध न होने की बात पूरी तरह साबित है, क्योंकि खुद पत्नी ने जिरह के दौरान स्वीकार किया था कि उनके बीच कभी कोई सहवास नहीं हुआ था।

READ ALSO  पॉक्सो एक्ट में पीड़िता की उम्र साबित करने के लिए बपतिस्मा प्रमाणपत्र वैधानिक दस्तावेज नहीं, आरोप तय न होने पर भी आईपीसी की धारा 376 के तहत सजा वैध: सुप्रीम कोर्ट

समझौते के प्रयास और गुजारा भत्ते की शर्त

फैसले में हाईकोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि अदालत ने दोनों पक्षों के बीच विवाद को सुलझाने और आपसी सहमति बनाने के कई प्रयास किए। पीठ ने दोनों वकीलों की इस बात के लिए सराहना की कि उन्होंने अपनी सामान्य भूमिका से आगे बढ़कर सुलह कराने की असाधारण कोशिशें कीं, हालांकि यह विवाद सुलझ नहीं सका।

आर्थिक राहत का निर्धारण करते हुए अदालत ने पति की संपत्तियों और पत्नी के कामकाजी होने के तथ्य को ध्यान में रखा। सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद पीठ ने 10 लाख रुपये को स्थायी गुजारा भत्ते के रूप में उचित माना। अदालत ने पति को निर्देश दिया कि वह 15 नवंबर 2026 से शुरू होकर लगातार चार मासिक किस्तों में यह राशि पत्नी को अदा करे।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles