सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) को पुणे के एक भोजनालय को 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया गया था। नियामक संस्था ने नियमों के उल्लंघन पर इस प्रतिष्ठान का फूड लाइसेंस निलंबित कर दिया था, जिसके खिलाफ हाईकोर्ट ने यह हर्जाना लगाया था।
जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस पीबी वराले की पीठ ने महाराष्ट्र सरकार और एफडीए की संयुक्त अपील स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया। राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि खाद्य सुरक्षा अधिकारियों ने यह कदम जनस्वास्थ्य की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उठाया था, क्योंकि प्रयोगशाला जांच में प्रतिष्ठान से लिया गया मिठाई का नमूना खाने के लिहाज से असुरक्षित पाया गया था।
फूड पॉइजनिंग की शिकायत के बाद हुई थी जांच
यह मामला पुणे स्थित ‘गुरुनानक डेयरी एंड स्वीट्स’ से जुड़ा है। प्रतिष्ठान के खिलाफ कथित तौर पर फूड पॉइजनिंग की शिकायत मिलने के बाद एफडीए के पुणे कार्यालय की टीम ने 12 जून को वहां औचक निरीक्षण किया था।
जांच के दौरान खाद्य सुरक्षा अधिकारियों ने रासायनिक विश्लेषण के लिए ‘मलाई पेड़ा’ का नमूना लिया, जो बाद में जांच रिपोर्ट में मानव उपभोग के लिए असुरक्षित पाया गया। इसके अलावा, निरीक्षण दल को परिसर में साफ-सफाई, कर्मचारियों की व्यक्तिगत स्वच्छता, उत्पादों की लेबलिंग और जरूरी व्यावसायिक रिकॉर्ड के रखरखाव में भी गंभीर कमियां मिलीं। इन अनियमितताओं के आधार पर एफडीए ने खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 के तहत प्रतिष्ठान का लाइसेंस निलंबित कर दिया था।
कारोबारी नुकसान पर हाईकोर्ट ने लगाया था हर्जाना
लाइसेंस निलंबन की इस कार्रवाई के खिलाफ गुरुनानक डेयरी एंड स्वीट्स ने बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान एफडीए की दलीलों को खारिज कर दिया था। भोजनालय प्रबंधन की ओर से अदालत को बताया गया कि एक महीने तक लाइसेंस निलंबित रहने के कारण उसे लगभग 9 लाख रुपये का वित्तीय नुकसान झेलना पड़ा है। इस दलील को आधार बनाते हुए हाईकोर्ट ने एफडीए को आदेश दिया था कि वह भोजनालय को क्षतिपूर्ति के रूप में 5 लाख रुपये की राशि अदा करे।
सुप्रीम कोर्ट में राज्य सरकार की दलीलें स्वीकार
हाईकोर्ट के इस आदेश के खिलाफ महाराष्ट्र सरकार और नियामक संस्था ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। शीर्ष अदालत में राज्य सरकार ने तर्क रखा कि मलाई पेड़े का नमूना असुरक्षित घोषित होने के बाद ही यह प्रशासनिक कार्रवाई की गई थी और इसका एकमात्र उद्देश्य सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा करना था। इन तथ्यों का संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने हाईकोर्ट द्वारा दिए गए 5 लाख रुपये के मुआवजे के आदेश को पूरी तरह निरस्त कर दिया।

