उड़ीसा हाईकोर्ट ने क्रूरता के आधार पर फैमिली कोर्ट द्वारा दिए गए तलाक के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए कहा है कि जब पति-पत्नी के रिश्ते की बुनियाद ही काफी हद तक खत्म हो चुकी हो, तब केवल कानूनी रूप से विवाह को बनाए रखना उसकी पवित्रता को बचाना नहीं है।
चीफ जस्टिस हरीश टंडन और जस्टिस चित्तरंजन दास की डिवीजन बेंच ने पति की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें उसने 27 जनवरी 2024 को फैमिली कोर्ट द्वारा पत्नी के पक्ष में दिए गए तलाक के आदेश को चुनौती दी थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि विवाह निश्चित रूप से एक पवित्र संस्था है और अदालतों को सामान्यतः इसे बचाने का प्रयास करना चाहिए। लेकिन केवल रिश्ते का कानूनी स्वरूप बनाए रखना पर्याप्त नहीं है, खासकर तब जब आपसी सम्मान, भरोसा, साथ और परिस्थितियों के अनुसार एक-दूसरे से समझौता करने की इच्छा खत्म हो चुकी हो।
अदालत ने कहा कि ये बातें वैवाहिक जीवन की बाहरी विशेषताएं नहीं, बल्कि उसकी मूल बुनियाद हैं। यदि ये तत्व धीरे-धीरे समाप्त हो जाएं और रिश्ता लगातार मानसिक पीड़ा और तनाव का कारण बन जाए, तो अदालत केवल इसलिए वास्तविकता से आंखें नहीं मूंद सकती कि वैवाहिक संबंधों में आई गिरावट को किसी एक अलग घटना या साफ-साफ तय श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
शादी के बाद बढ़े मतभेद
पति के अनुसार दोनों की शादी 20 अक्टूबर 2021 को हुई थी। शादी के बाद वे पहले विशाखापट्टनम में रहे और बाद में हैदराबाद चले गए, जहां दोनों आईटी सेक्टर में काम करते थे।
इसके बाद उनके बीच मतभेद बढ़ने लगे। जून 2023 में पत्नी वैवाहिक घर छोड़कर अपने माता-पिता के साथ रायगड़ा चली गई। बाद में उसने क्रूरता के आधार पर फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दायर की।
फैमिली कोर्ट ने 27 जनवरी 2024 को विवाह समाप्त कर दिया। इसके खिलाफ पति ने हाईकोर्ट में अपील की।
पति ने क्रूरता के निष्कर्ष को दी चुनौती
पति की ओर से पेश एडवोकेट एस के द्विवेदी ने दलील दी कि फैमिली कोर्ट ने क्रूरता के आधार पर विवाह समाप्त करने में गलती की।
उन्होंने कहा कि पत्नी के आरोप न तो पर्याप्त सबूतों से साबित हुए और न ही वे हिंदू विवाह अधिनियम के तहत क्रूरता माने जाने के लिए पर्याप्त थे।
पति की ओर से यह भी कहा गया कि उसने वैवाहिक संबंध फिर से शुरू करने के लिए अलग कार्यवाही शुरू की थी, जिससे यह दिखता है कि वह विवाह को जारी रखना चाहता था।
पत्नी की ओर से पेश एडवोकेट टी के मिश्रा ने कहा कि पत्नी ने वैवाहिक जीवन के दौरान उसके साथ हुई शारीरिक और मानसिक क्रूरता की विशिष्ट घटनाओं का उल्लेख किया था और उनके समर्थन में साक्ष्य भी दिए थे।
उन्होंने कहा कि पति के व्यवहार से पत्नी को मानसिक पीड़ा हुई और उसके लिए वैवाहिक संबंध जारी रखना संभव नहीं रह गया था।
सामान्य वैवाहिक विवाद क्रूरता नहीं
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि वैवाहिक जीवन में होने वाली सामान्य कहासुनी, छोटी-मोटी नाराजगी, कभी-कभार होने वाले झगड़े या मतभेद अपने आप में तलाक का आधार नहीं बन सकते।
अदालत ने कहा कि जिस व्यवहार की शिकायत की गई है, उसका स्वरूप और गंभीरता ऐसी होनी चाहिए जिससे यह उचित आशंका पैदा हो कि पति-पत्नी के लिए साथ रहना संभव नहीं होगा।
बेंच ने यह भी कहा कि मानसिक क्रूरता को हर मामले में सीधे सबूत से साबित करना संभव नहीं होता। इसका आकलन संबंधित पति या पत्नी के मन पर पड़े प्रभाव, परिस्थितियों, सामाजिक पृष्ठभूमि और दोनों के रिश्ते की प्रकृति को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
पत्नी के साक्ष्य का समग्र रूप से आकलन करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि मामले को केवल किसी एक झगड़े या अलग-थलग वैवाहिक विवाद तक सीमित नहीं किया जा सकता।
अदालत ने कहा कि शारीरिक हमले के आरोप और पत्नी द्वारा बताई गई विशिष्ट घटनाएं, जब एक साथ देखी जाती हैं, तो वे लगातार चले आ रहे वैवाहिक तनाव और विवाद को दर्शाती हैं।
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि पति-पत्नी का आखिरकार अलग होना कोई अचानक हुई घटना नहीं थी, बल्कि पहले से बिगड़ते चले आ रहे वैवाहिक संबंध का परिणाम था।
बेंच के अनुसार, साक्ष्यों से केवल पति-पत्नी के नजरिए में अंतर नहीं दिखता, बल्कि यह भी स्पष्ट होता है कि उनके रिश्ते से आपसी भरोसे का महत्वपूर्ण तत्व काफी हद तक समाप्त हो चुका था।
सुलह की कोशिश भी नहीं हुई सफल
हाईकोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि 20 मार्च को दोनों पक्षों को अदालत के सामने आमने-सामने लाया गया था, लेकिन इसके बावजूद रिश्ते को बहाल नहीं किया जा सका।
अदालत ने दर्ज किया कि उस समय दोनों ने विवाह समाप्त करने की इच्छा जताई थी।
हालांकि बेंच ने स्पष्ट किया कि तलाक का आदेश केवल इसलिए बरकरार नहीं रखा जा रहा है क्योंकि दोनों अलग रह रहे हैं या विवाह खत्म करना चाहते हैं।
हाईकोर्ट ने कहा कि तलाक के आदेश की असली बुनियाद रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों से साबित हुई क्रूरता ही है।
फैमिली कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि वैवाहिक संबंध अपना मूल स्वरूप खो चुका है और पत्नी को ऐसे रिश्ते में वापस जाने के लिए मजबूर करना वास्तविकता से परे होगा।
इसके साथ ही हाईकोर्ट ने पति की अपील खारिज कर दी और तलाक के आदेश को बरकरार रखा।

