बालिग बेटे के आचरण के लिए ससुर पर नहीं चल सकता घरेलू हिंसा का मुकदमा: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल अपने बालिग बेटे के व्यवहार या गलतियों को न रोक पाने के आधार पर किसी ससुर को घरेलू हिंसा कानून के तहत जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। हाईकोर्ट ने बहू की याचिका खारिज करते हुए ससुर के खिलाफ कार्रवाई से इनकार करने वाले निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखा है।

जस्टिस मधु जैन की पीठ ने अगस्त में दिए गए आदेश में कहा कि पति के कथित वैवाहिक कदाचार में ससुर की कोई भूमिका नहीं थी। अदालत ने टिप्पणी की, “सिर्फ इसलिए कि किसी पिता ने अपने बालिग बेटे के आचरण पर नियंत्रण नहीं रखा, उसे घरेलू हिंसा (डीवी) कानून के दायरे में उत्तरदायी नहीं बनाया जा सकता।”

मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता महिला ने अपने ससुर पर घरेलू हिंसा का आरोप लगाते हुए दावा किया था कि उन्होंने अपने अलग रह रहे बेटे को किसी अन्य महिला के साथ संबंध रखने से रोकने या उसके खिलाफ कार्रवाई करने में विफलता दिखाई।

पारिवारिक रिश्ते का होना ही कार्रवाई का आधार नहीं

घरेलू हिंसा कानून के कानूनी पहलुओं की समीक्षा करते हुए अदालत ने रेखांकित किया कि कानून की धारा 3 शारीरिक, मानसिक, मौखिक, भावनात्मक या आर्थिक नुकसान पहुंचाने अथवा उसकी धमकी देने वाले कृत्यों को कवर करती है। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि पक्षों के बीच महज घरेलू संबंध (डोमेस्टिक रिलेशनशिप) का होना ही इस कानून के तहत मामला दर्ज करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है।

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तथ्यों के अभाव में केवल आरोपों का कानूनी आधार नहीं

याचिकाकर्ता ने ससुर पर अपमानित करने, उपहास उड़ाने, नीचा दिखाने और धमकाने के आरोप लगाए थे, लेकिन अदालत ने पाया कि इन दावों के समर्थन में कोई ठोस तथ्य रिकॉर्ड पर नहीं रखे गए।

अदालत ने कहा कि ‘अपमानित किया’, ‘चिल्लाया’ और ‘गाली दी’ जैसे शब्द केवल व्यक्तिपरक निष्कर्ष हैं। जब तक इनके पीछे के वास्तविक तथ्य और घटनाएं स्पष्ट न की जाएं, तब तक धारा 3 के अंतर्गत मौखिक या भावनात्मक प्रताड़ना का अपराध साबित नहीं होता।

व्यावसायिक मतभेद और घरेलू हिंसा का दायरा

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मामले में यह तथ्य भी सामने आया कि महिला और उसके ससुर एक फर्म में साझेदार के तौर पर व्यावसायिक संबंध भी रखते थे।

हाईकोर्ट ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि हालांकि व्यावसायिक विवाद पूरी तरह से धारा 3 की परिधि से बाहर नहीं होते, लेकिन ऐसे मामलों में यह साबित करना आवश्यक है कि पीड़िता को कानून द्वारा संरक्षित किसी अधिकार या संसाधन से वंचित किया गया हो। अदालत ने पाया कि मौजूदा रिकॉर्ड में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो कि याचिकाकर्ता को किसी संरक्षित संसाधन से वंचित किया गया था या ससुर की तरफ से घरेलू हिंसा की कोई धमकी दी गई थी।

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