तमिलनाडु के एक उपभोक्ता आयोग ने वजन घटाने का पैकेज अधूरा रहने पर एक वेलनेस क्लीनिक के खिलाफ कड़ा फैसला सुनाया है। आयोग ने क्लीनिक को निर्देश दिया है कि वह शिकायतकर्ता महिला को उसकी 51,200 रुपये की पूरी फीस वापस लौटाए। इसके साथ ही, सेवा में खामी के चलते महिला को हुई मानसिक परेशानी के एवज में 25,000 रुपये का मुआवजा और मुकदमे के खर्च के रूप में 10,000 रुपये अतिरिक्त अदा करने का आदेश दिया गया है।
आयोग के अध्यक्ष टी. शेखर और सदस्य के. वेलुमणि की पीठ ने पाया कि क्लीनिक यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहा कि उसने पूरी ली गई रकम के बदले समुचित सेवाएं दी थीं या फिर सेवा अधूरी रहने के बावजूद पूरी रकम अपने पास रखने का उसके पास कोई वैध अधिकार था।
सोशल मीडिया विज्ञापन देखकर लिया था 10 सेशन का पैकेज
शिकायत के अनुसार, महिला ने सोशल मीडिया पर वजन घटाने से संबंधित एक विज्ञापन देखने के बाद वेलनेस क्लीनिक से संपर्क किया था। क्लीनिक के कर्मचारियों ने दावा किया कि उनकी थेरेपी से निश्चित रूप से वजन कम होगा। इस भरोसे पर महिला ने क्रायोथेरेपी (अत्यधिक कम तापमान वाली थेरेपी) का 10 सेशन वाला एक पैकेज लिया और पूरी रकम का भुगतान कर दिया।
हालांकि, महिला ने केवल चार सेशन ही पूरे किए और उसके बाद जाना बंद कर दिया। महिला का आरोप था कि वजन घटने के बजाय बढ़ गया। साथ ही, थेरेपी के दौरान अत्यधिक ठंड के संपर्क में आने की वजह से उसे सर्दी, जुकाम और बुखार की शिकायत हो गई। क्लीनिक की ओर से कोई संतोषजनक समाधान न मिलने पर उसने रिफंड और हर्जाने की मांग को लेकर उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया।
बीमारी के मेडिकल सबूत नहीं, फिर भी व्यावसायिक लापरवाही पर फंसा क्लीनिक
मामले की सुनवाई के दौरान आयोग ने रेखांकित किया कि शिकायतकर्ता ने ऐसा कोई मेडिकल दस्तावेज या चिकित्सकीय रिकॉर्ड पेश नहीं किया, जिससे सीधे तौर पर यह साबित हो सके कि उसे बुखार और सर्दी-जुकाम क्रायोथेरेपी के कारण ही हुआ था।
इसके बावजूद आयोग ने सेवा की शर्तों और व्यावसायिक जवाबदेही के आधार पर फैसला महिला के पक्ष में सुनाया। आयोग ने कहा कि सेवा प्रदाता यह साबित नहीं कर सका कि उसने महिला द्वारा लिए गए चार सत्रों का आनुपातिक मूल्य कितना आंका था और बाकी बचे छह सत्रों की रकम किस आधार पर अपने पास रोकी गई थी।
उपभोक्ता कानून के तहत सेवा में कमी माना गया कदम
आयोग ने स्पष्ट किया कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 2(11) के तहत सेवा अधूरी रहने पर भी पूरी रकम दबाए रखना सीधे तौर पर ‘सेवा में कमी’ (डेफिशिएंसी इन सर्विस) के दायरे में आता है।
पीठ ने अपने आदेश में कहा कि जिस पक्ष ने सेवा देने के बदले पूरा भुगतान प्राप्त किया है, यदि वह वादा की गई सेवा संतोषजनक ढंग से पूरी नहीं कर पाता है, तो अप्रयुक्त सेवा का पैसा लौटाने की कानूनी जिम्मेदारी उसी संस्थान पर होगी। इसके लिए क्लीनिक किसी भी अनुबंध या नियम का हवाला नहीं दे सकता। आयोग ने क्लीनिक को कुल 86,200 रुपये (51,200 रुपये रिफंड, 25,000 रुपये मुआवजा और 10,000 रुपये कानूनी खर्च) अदा करने का स्पष्ट आदेश दिया।

