सुप्रीम कोर्ट ने 2008 के अहमदाबाद सिलसिलेवार बम विस्फोट मामले में दोषी ठहराए गए इंडियन मुजाहिदीन के आतंकी अहमद बावा उर्फ अब्बू अबूबकर बरेलवी की फांसी की सजा के अमल पर गुरुवार को अंतरिम रोक लगा दी। इस आतंकी हमले में 56 निर्दोष नागरिकों की मौत हुई थी।
जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस एजी मसीह और जस्टिस संदीप मेहता की तीन सदस्यीय बेंच ने अहमद बावा की अपील पर गुजरात सरकार को नोटिस जारी किया है। इसके साथ ही पीठ ने मामले से संबंधित ट्रायल कोर्ट के मूल रिकॉर्ड तलब किए हैं। मामले की सुनवाई के दौरान पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को अवगत कराया कि यह एक बेहद गंभीर अपराध से जुड़ा मामला है।
हाईकोर्ट ने 38 दोषियों की फांसी और 11 की उम्रकैद रखी थी बरकरार
अहमद बावा ने गुजरात हाईकोर्ट के 7 जुलाई के फैसले के खिलाफ शीर्ष अदालत का रुख किया है। हाईकोर्ट ने विशेष अदालत द्वारा फरवरी 2022 में 38 आतंकियों को सुनाई गई मौत की सजा और 11 अन्य को दी गई उम्रकैद को पूरी तरह जायज ठहराते हुए बरकरार रखा था। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की पुष्टि याचिका को स्वीकार करते हुए दोषियों की सभी अपीलों को निरस्त कर दिया था।
फांसी की पुष्टि करते हुए हाईकोर्ट ने कहा था कि यह हमला बड़े पैमाने पर जनहानि करने और समाज में भारी दहशत फैलाने के मकसद से रचा गया एक अमानवीय और क्रूर कृत्य था। जजों ने रेखांकित किया कि जिस बर्बर तरीके से इन धमाकों को अंजाम दिया गया, वह आतंकियों की हिंसक मानसिकता और बिना किसी पछतावे के मासूमों की जान लेने के रवैये को उजागर करता है। अदालत ने यह भी दर्ज किया कि जेल में रहने के दौरान भी कई दोषियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई थी और किसी ने भी पश्चाताप का कोई संकेत नहीं दिया। हाईकोर्ट के अनुसार, ट्रायल कोर्ट ने नरमी की सभी संभावनाओं को खारिज करने से पहले अपराध की गंभीरता और बचाव के सभी पक्षों का समुचित मूल्यांकन किया था।
लॉजिस्टिक्स जुटाने और आतंकी शिविर चलाने वालों को आजीवन कारावास
उम्रकैद की सजा पाए 11 दोषियों के मामले में हाईकोर्ट ने माना कि जांच एजेंसी ने इनके खिलाफ गुजरात और केरल में आतंकी प्रशिक्षण शिविर संचालित करने के आरोप पूरी तरह साबित किए हैं। इसके अतिरिक्त इन दोषियों ने साजिशकर्ताओं को पनाह देने और विस्फोटों में प्रयुक्त स्कूटर, प्लास्टिक के डिब्बे और घड़ियों जैसे लॉजिस्टिक सामान की खरीद-फरोख्त में सीधी भूमिका निभाई थी।
हाईकोर्ट ने दोषियों पर लगाए गए जुर्माने को भी कायम रखा। इसके साथ ही गुजरात सरकार को निर्देश दिया कि वह 30 मार्च 2027 से पहले प्रत्येक मृतक के आश्रितों को 10 लाख रुपये तथा गंभीर रूप से घायलों को 5 लाख रुपये की मुआवजा राशि जारी करे।
70 मिनट में 21 धमाके और अस्पतालों पर देश का पहला आतंकी हमला
यह हमला 26 जुलाई 2008 को हुआ था, जब महज 70 मिनट के भीतर अहमदाबाद के अलग-अलग रिहायशी व व्यस्त इलाकों में 21 सिलसिलेवार धमाके किए गए थे। इस हमले में 56 लोगों की मौत हो गई थी, जबकि 200 से अधिक लोग जख्मी हुए थे। भारत में यह पहला ऐसा आतंकी हमला था, जिसमें घायलों को इलाज के लिए ले जाए जा रहे अस्पतालों को भी जानबूझकर निशाना बनाया गया था।
इस वृहद आतंकी साजिश की जांच के दौरान कुल 35 प्राथमिकियों—अहमदाबाद ब्लास्ट की 20 और सूरत से मिले न फटे बमों की 15—को एक साथ जोड़कर संयुक्त मुकदमा चलाया गया। अदालत में कुल 78 आरोपियों पर मुकदमा चला, जिसमें से विशेष अदालत ने 49 को दोषी ठहराया था। दोषियों में प्रतिबंधित संगठन स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) का पूर्व प्रमुख सफदर नागोरी और गुजरात, मध्य प्रदेश, केरल तथा उत्तर प्रदेश सहित 11 राज्यों के उसके साथी शामिल हैं।
विशेष अदालत का फरवरी 2022 का यह फैसला देश के कानूनी इतिहास में दर्ज हुआ, क्योंकि यह पहला मौका था जब किसी एक ही मुकदमे में 38 दोषियों को एक साथ फांसी की सजा सुनाई गई थी। इससे पहले जनवरी 1998 में तमिलनाडु की टाडा अदालत ने 1991 के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी हत्याकांड में 26 दोषियों को मौत की सजा सुनाई थी।

