बेंगलुरु के एक उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एक एयरलाइन और ऑनलाइन ट्रैवल पोर्टल को निर्देश दिया है कि वे एक पीड़ित यात्री को संयुक्त रूप से 78,920 रुपये का भुगतान करें। अमेरिका के नेवार्क हवाई अड्डे पर यात्री सूची में नाम की कथित विसंगति का हवाला देकर एक अस्वस्थ बुजुर्ग को भारत वापसी की उड़ान पर चढ़ने से रोक दिया गया था, जिसके बाद सहमति बनने के बावजूद उन्हें रिफंड नहीं दिया गया।
प्रभारी अध्यक्ष वी. अनुराधा और सदस्य एच. जनार्दन व शरावती एस. एम. की पीठ ने उपभोक्ता शिकायत को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया। आयोग ने कहा कि लिखित सहमति के बावजूद रिफंड की रकम रोके रखना सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार का स्पष्ट उदाहरण है। पीठ ने दोनों कंपनियों को टिकट की मूल कीमत 65,920 रुपये वापस करने के साथ-साथ 10,000 रुपये का मुआवजा और 3,000 रुपये कानूनी खर्च के रूप में अदा करने का आदेश दिया।
एयरलाइन काउंटर की सूची में गड़बड़ी के कारण नहीं मिली थी बोर्डिंग
यह मामला दिल्ली और नेवार्क के बीच राउंड-ट्रिप टिकट से जुड़ा है। एक महिला ने अपने माता-पिता के लिए ट्रैवल पोर्टल के जरिए टिकट बुक कराए थे। शिकायतकर्ता के पिता वरिष्ठ नागरिक हैं, जो स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों की वजह से व्हीलचेयर का सहारा लेते हैं। यात्रा की तारीख में संशोधन के बाद वे उसी टिकट और पीएनआर पर 8 जून 2024 को दिल्ली से आव्रजन (इमिग्रेशन) की जांच पूरी कर अमेरिका रवाना हुए थे।
परेशानी उस समय पेश आई जब वे नेवार्क हवाई अड्डे से दिल्ली लौटने के लिए पहुंचे। वहां एयरलाइन के ग्राउंड स्टाफ ने यात्री सूची (गेस्ट लिस्ट) में नाम के मिलान में विसंगति का दावा करते हुए उन्हें विमान में चढ़ने से रोक दिया। इसके चलते परिजनों को हवाई अड्डा काउंटर पर तुरंत 71,241 रुपये खर्च करके नया टिकट लेना पड़ा।
रिफंड की सहमति बनने के बाद भी अटकी रही रकम
इस घटना के बाद यात्री की बेटी ने नए टिकट पर हुए अतिरिक्त खर्च की वापसी की मांग की। एयरलाइन और ट्रैवल एजेंसी दोनों ने इस मांग को सैद्धांतिक रूप से स्वीकार किया और रकम दो हिस्सों में लौटाने पर सहमति जताई। इसमें टिकट के मूल मूल्य के रूप में 65,920 रुपये और किराए के अंतर के तौर पर 5,321 रुपये लौटाए जाने तय हुए थे।
हालांकि, शिकायतकर्ता द्वारा बार-बार संपर्क किए जाने और लगातार प्रयास के बावजूद यह राशि उनके बैंक खाते में नहीं पहुंची, जिसके चलते उन्हें उपभोक्ता आयोग की शरण लेनी पड़ी।
कंपनियों ने एक-दूसरे पर जिम्मेदारी टालने का किया प्रयास
आयोग के समक्ष जवाब दाखिल करते हुए दोनों पक्षों ने अपनी देनदारी से इनकार किया। ट्रैवल पोर्टल का कहना था कि वह महज एक मध्यस्थ (फैसिलिटेटर) है और हवाई अड्डे पर बोर्डिंग रोकने के लिए जिम्मेदार नहीं है। पोर्टल ने यह भी तर्क दिया कि उसने सुविधा शुल्क काटकर 65,490 रुपये की प्रक्रिया शुरू की थी, लेकिन बैंक ट्रांसफर असफल होने के चलते रकम ग्राहक के पोर्टल वॉलेट में जमा हो गई और वैकल्पिक बैंक विवरण प्राप्त करने के लिए लिंक भेजा गया था।
वहीं एयरलाइन ने दलील दी कि अंतरराष्ट्रीय नियमों के मुताबिक यात्री के पहचान पत्र और टिकट के नाम का मिलान अनिवार्य है। सिस्टम में नाम मिसमैच का ऑटोमेटेड अलर्ट आने की वजह से यात्री को रोका गया था। एयरलाइन ने कहा कि बुकिंग के समय नाम दर्ज कराने पर उसका कोई नियंत्रण नहीं था। साथ ही उसने पूरा रिफंड स्वीकृत कर यात्री को एजेंसी के जरिए राशि क्लेम करने की सलाह दी थी।
आयोग ने दलीलों को खारिज कर तय की जवाबदेही
आयोग ने इन तर्कों को सिरे से खारिज कर दिया। पीठ ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि जब यात्री उसी टिकट, उसी पीएनआर और मामूली तारीख बदलाव के साथ 8 जून 2024 को दिल्ली से बिना किसी अड़चन के अमेरिका गए थे, तो वापसी में उन्हें सिर्फ एयरलाइन काउंटर की गेस्ट लिस्ट में नाम की गलत प्रविष्टि की वजह से रोका गया। आयोग ने स्पष्ट किया कि यह पूरी तरह एयरलाइन की आंतरिक लिपिकीय भूल थी, जिसमें यात्री का कोई दोष नहीं था।
पीठ ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य यह सिद्ध करते हैं कि दोनों कंपनियों ने रिफंड देने पर सहमति जताई थी, लेकिन वास्तव में भुगतान नहीं किया। आयोग ने स्पष्ट किया कि एयरलाइंस और ट्रैवल एजेंसियों को रिफंड की सहमति देने के बाद तुरंत भुगतान सुनिश्चित करना चाहिए, और वादा करके राशि रोकना सेवा में गंभीर कमी व अनुचित व्यापार आचरण है।

