झारखंड हाईकोर्ट ने नागरिकों के अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि एक स्वच्छ, गरिमापूर्ण और उचित रूप से सुरक्षित शहरी जीवन जीने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है, जो अनुच्छेद 19(1)(डी) के तहत आवागमन की स्वतंत्रता से भी जुड़ा है। चीफ जस्टिस एम. एस. सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने हजारीबाग शहर में गंभीर ट्रैफिक जाम, अवैध अतिक्रमण और राहगीरों की सुरक्षा से जुड़ी जनहित याचिका (पीआईएल) का निपटारा करते हुए प्रशासन और पुलिस को समयबद्ध व बाध्यकारी निर्देश जारी किए। हाईकोर्ट ने दो टूक शब्दों में कहा कि प्रशासनिक असुविधा या बजट की कमी का हवाला देकर अधिकारी अपनी वैधानिक और संवैधानिक जिम्मेदारियों से पल्ला नहीं झाड़ सकते।
मामले की पृष्ठभूमि
यह जनहित याचिका वर्ष 2021 में याचिकाकर्ता अच्युत स्वरूप मिश्रा द्वारा व्यक्तिगत रूप से (इन-पर्सन) दायर की गई थी। याचिका में हजारीबाग की बदहाल ट्रैफिक स्थिति को उजागर करते हुए बताया गया था कि शहर में ट्रैफिक लाइट प्रणाली पूरी तरह नदारद है, सीसीटीवी कैमरे बंद पड़े हैं, पार्किंग की कोई समुचित व्यवस्था नहीं है और फुटपाथों पर बड़े पैमाने पर अतिक्रमण है। याचिकाकर्ता ने बड़कागांव मोड़ और कारगिल चौक जैसे व्यस्त चौराहों पर हुए जानलेवा हादसों और अनियंत्रित ट्रैफिक के कारण घायल होने वाले राहगीरों का ब्योरा अदालत के सामने रखा।
शुरुआत में प्रशासनिक एजेंसियों ने शहर की इस दुर्दशा से इनकार करने का रुख अपनाया। इस पर हाईकोर्ट ने 11 जुलाई 2024 को अधिवक्ता प्रशांत पल्लव को एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त कर शहर का जमीनी मुआयना करने का आदेश दिया। एडवोकेट कमिश्नर की विस्तृत रिपोर्ट ने याचिका के दावों की पुष्टि की। रिपोर्ट में पाया गया कि चौराहों पर ट्रैफिक पुलिसकर्मियों की भारी कमी है, स्वचालित सिग्नल नहीं हैं, लगे हुए सीसीटीवी कैमरे खराब हैं, अनियंत्रित पार्किंग फैली हुई है और हेलमेट व सीटबेल्ट जैसे बुनियादी नियमों के पालन में ढिलाई बरती जा रही है। इसके बाद भी जिला प्रशासन और नगर निगम एक-दूसरे पर जिम्मेदारी टालते रहे; पुलिस अधिकारियों ने पार्किंग की कमी के लिए नगर निगम को जिम्मेदार ठहराया, तो निगम ने पुलिस सहयोग न मिलने की शिकायत की।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता अच्युत स्वरूप मिश्रा ने दलील दी कि अदालती निगरानी में कई बैठकों, अंतर-विभागीय आदेशों और टास्क फोर्स के गठन के बावजूद जमीनी स्तर पर कोई ठोस बदलाव नहीं आया है। उन्होंने तर्क दिया कि नगर निगम और पुलिस प्रशासन की लगातार निष्क्रियता नागरिकों के मौलिक अधिकारों का सीधा हनन है।
वहीं, राज्य प्रशासन और हजारीबाग नगर निगम की ओर से पेश वकीलों ने अदालत को बताया कि न्यायिक निगरानी के बाद से कई सुधारात्मक कदम उठाए गए हैं। पुलिस प्रशासन ने बताया कि ट्रैफिक व्यवस्था के लिए तैनात जवानों की संख्या 35 से बढ़ाकर 212 कर दी गई है। इसके अलावा कल्लू चौक, पगोड़ा चौक, इंद्रपुरी चौक और झंडा चौक पर 20 अतिरिक्त पुलिसकर्मी तैनात किए गए हैं। साथ ही डिस्ट्रिक्ट चौक पर एक समर्पित ट्रैफिक पुलिस थाना और पंच मंदिर चौक पर ट्रैफिक पोस्ट चालू किया गया है। अधिकारियों ने अदालत को सूचित किया कि अवैध पार्किंग से 42,26,200 रुपये और हेलमेट, सीटबेल्ट, टिंटेड ग्लास व तेज रफ्तार ड्राइविंग के खिलाफ कार्रवाई करते हुए कुल 10,87,22,661 रुपये का जुर्माना वसूला गया है।
हजारीबाग नगर निगम ने बताया कि पूर्व में तैयार किया गया 38.64 करोड़ रुपये का भारी-भरकम प्रस्ताव निरस्त कर दिया गया है। इसके स्थान पर 19 अगस्त 2026 को मेसर्स कीहोल डिजाइन प्राइवेट लिमिटेड के साथ 2.68 करोड़ रुपये का नया अनुबंध किया गया है, जिसके तहत स्वचालित ट्रैफिक लाइट सिस्टम लगाया जा रहा है। निगम ने यह भी बताया कि जनवरी 2026 में गठित टास्क फोर्स ने अतिक्रमण हटाओ अभियान चलाए हैं, सदर अस्पताल के पास स्ट्रीट वेंडर्स एक्ट, 2014 के तहत वेंडिंग जोन का सर्वे शुरू किया गया है और पुराने बस स्टैंड को शहर से बाहर बाईपास रोड पर स्थानांतरित करने की योजना पर काम चल रहा है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और नज़ीरें
मोटर वाहन अधिनियम 1988, झारखंड म्युनिसिपल एक्ट 2012, ध्वनि प्रदूषण (विनियमन और नियंत्रण) नियम 2000 और स्ट्रीट वेंडर्स एक्ट 2014 के कानूनी प्रावधानों का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने माना कि प्रशासनिक एजेंसियां वित्तीय तंगी या आपसी तालमेल की कमी की आड़ में अपने दायित्वों से पीछे नहीं हट सकतीं।
खंडपीठ ने टिप्पणी की:
“अंततः प्रतिवादियों को यह ध्यान में रखना होगा कि एक स्वच्छ, गरिमापूर्ण और उचित रूप से सुरक्षित शहरी जीवन जीने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन के अधिकार का एक अभिन्न अंग है। इसके अलावा, अनुच्छेद 19(1)(डी) और अनुच्छेद 19 के तहत मिलने वाले अन्य अधिकार हर नागरिक के आने-जाने की स्वतंत्रता की रक्षा करते हैं, चाहे वह पैदल यात्री, वाहन चालक या दैनिक यात्री के रूप में शहर में आवाजाही कर रहा हो।”
प्रशासनिक जवाबदेही पर जोर देते हुए पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले म्युनिसिपल काउंसिल, रतलाम बनाम वर्धीचंद (AIR 1980 SC 1622) का हवाला दिया, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि नागरिक सुरक्षा और स्वच्छता से जुड़े सार्वजनिक कर्तव्यों के निर्वहन में धन की कमी का बहाना स्वीकार नहीं किया जा सकता।
फुटपाथों पर पैदल यात्रियों के अधिकार को रेखांकित करते हुए अदालत ने अहमदाबाद म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन बनाम नवाब खान गुलाब खान ((1997) 11 SCC 121), सुधीर मदान बनाम म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन ऑफ दिल्ली ((2009) 17 SCC 597), एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ ((2019) 10 SCC 614) और मनियार इलियास उर्फ शेख रियाज बनाम पी. अय्यप्पन (2026 INSC 647) के निर्णयों पर भरोसा जताया। इन फैसलों के आधार पर अदालत ने माना कि फुटपाथ पैदल यात्रियों की सुरक्षा के लिए जरूरी बुनियादी ढांचा हैं, जिन पर पार्किंग पूरी तरह प्रतिबंधित है और बिना अतिक्रमण वाले फुटपाथ पर चलना नागरिकों का मौलिक अधिकार है।
रेहड़ी-पटरी वालों (स्ट्रीट वेंडर्स) के अधिकारों के संबंध में हाईकोर्ट ने कहा:
“कानूनी ढांचा और इस विषय पर अदालती फैसले अब स्ट्रीट वेंडर्स को पूरी तरह से हटाए जाने के पक्ष में नहीं हैं। इसका उद्देश्य यह होना चाहिए कि स्ट्रीट वेंडिंग, वाहनों के चलने योग्य सड़कों और पैदल चलने योग्य फुटपाथों के साथ सामंजस्यपूर्ण तरीके से सह-अस्तित्व में रहे।”
जमीनी स्तर पर परिणाम सुनिश्चित करने की आवश्यकता जताते हुए अदालत ने कहा:
“प्रतिवादियों को यह याद रखना चाहिए कि केवल कागजी आश्वासन देना ही पर्याप्त नहीं है। ऐसे आश्वासनों को ज़मीनी कार्रवाई में बदलना होगा और यह कार्रवाई निरंतर जारी रहनी चाहिए।”
कोर्ट का फैसला और बाध्यकारी निर्देश
याचिका का निस्तारण करते हुए हाईकोर्ट ने उपायुक्त (डीसी), पुलिस अधीक्षक (एसपी) और नगर आयुक्त को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराते हुए 17 सूत्रीय बाध्यकारी निर्देश जारी किए:
- ट्रैफिक सिग्नल प्रणाली: मेसर्स कीहोल डिजाइन प्राइवेट लिमिटेड के साथ हुए अनुबंध के तहत चिन्हित 20 प्रमुख चौराहों (जैसे कोर्ट चौक, मटवारी चौक, कोर्रा चौक, बड़कागांव मोड़, इंद्रपुरी चौक आदि) पर जेब्रा क्रॉसिंग और साइन बोर्ड के साथ चार महीने के भीतर काम पूरा कर ट्रायल रन शुरू किया जाए।
- निगरानी और रखरखाव टीम: तीन सप्ताह के भीतर नगर निगम के सहायक अभियंता, ट्रैफिक पुलिस इंस्पेक्टर और ठेकेदार के प्रतिनिधि की एक तीन सदस्यीय टीम बनाई जाए, जो दैनिक डाउनटाइम लॉग रखेगी। कोई भी सिग्नल 48 घंटे से अधिक बंद रहने पर उसे अगले 48 घंटे में अनिवार्य रूप से ठीक करना होगा।
- सीसीटीवी नेटवर्क: डीसी और एसपी दो महीने के भीतर वर्ष 2017 से अब तक लगे सभी कैमरों की कार्यप्रणाली का संयुक्त ब्योरा देंगे। खराब कैमरों को चार महीने में ठीक या प्रतिस्थापित किया जाए और नए कैमरों व एएनपीआर (ANPR) सिस्टम को पुलिस कंट्रोल रूम से जोड़ा जाए।
- पुलिस बल और प्रशिक्षण: एसपी व्यस्त समय (सुबह 8 से 11 और शाम 4 से 8 बजे) का तैनाती चार्ट सौंपेंगे, जिसमें हर चौराहे के जिम्मेदार अधिकारी का नाम दर्ज होगा। ट्रैफिक कर्मियों को जिला विधिक सेवा प्राधिकार (डीएलएसए) के समन्वय में तीन महीने के भीतर कम से कम तीन दिन का विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा।
- भारी वाहनों का प्रवेश निषेध: सुबह 8:00 बजे से रात 8:00 बजे तक नगर निगम क्षेत्र में भारी और व्यावसायिक मालवाहक वाहनों के प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध सख्ती से लागू रहेगा। नगर निगम कोई भी गैर-कानूनी एंट्री टैक्स नहीं वसूलेगा और नियम तोड़ने वाले कर्मियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी।
- पार्किंग और अतिक्रमण मुक्ति: तीन महीने के भीतर अधिकृत पार्किंग स्थलों के नक्शे और तस्वीरें जमा की जाएं। पीटीसी चौक से कोर्रा चौक तक जिन व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के पास ऑफ-स्ट्रीट पार्किंग नहीं है, उन्हें नोटिस जारी किया जाए। खाली कराए गए फुटपाथों पर दोबारा कब्जा होने पर झारखंड म्युनिसिपल एक्ट, 2012 की धारा 606 के तहत कानूनी कार्रवाई की जाए। स्ट्रीट वेंडर्स एक्ट के तहत चार महीने में वेंडिंग व नॉन-वेंडिंग जोन अधिसूचित किए जाएं।
- साइलेंस जोन और बस स्टैंड: दो महीने के भीतर अदालत परिसर, सदर व आरोग्यम अस्पताल, संत कोलंबस कॉलेज और कार्मेल स्कूल के 100 मीटर के दायरे को साइलेंस जोन अधिसूचित कर प्रेशर हॉर्न पर पाबंदी लगाई जाए। चार महीने में बाईपास पर नए बस अड्डे के लिए जमीन की स्थिति और ई-रिक्शा/ऑटो के रूट निर्धारण की रिपोर्ट पेश की जाए।
- अधिकारियों का व्यक्तिगत हलफनामा: हजारीबाग के उपायुक्त, पुलिस अधीक्षक और नगर आयुक्त इन सभी निर्देशों के अनुपालन को लेकर चार महीने के भीतर स्वयं हस्ताक्षरित व्यक्तिगत शपथपत्र हाईकोर्ट में दाखिल करेंगे। किसी अधीनस्थ अधिकारी का हलफनामा स्वीकार नहीं किया जाएगा।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: अच्युत स्वरूप मिश्रा बनाम झारखंड राज्य व अन्य
वाद संख्या: डब्लू.पी. (पीआईएल) संख्या 4534/2021 पीठ: चीफ जस्टिस एम. एस. सोनक और जस्टिस राजेश शंकर निर्णय की तिथि: 29 सितंबर 2026

