ट्रायल में देरी के दौरान ट्रायल-पूर्व हिरासत दंडात्मक नहीं हो सकती: राजस्थान जल जीवन मिशन मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दी जमानत

सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ, जिसमें जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू शामिल हैं, ने राजस्थान के बहुचर्चित जल जीवन मिशन में कथित वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े मामले में लोक सेवक शुभांशु दीक्षित और निजी व्यक्ति संजय बडाया को नियमित जमानत दे दी है। हाईकोर्ट की जयपुर पीठ द्वारा जमानत याचिकाएं खारिज किए जाने के खिलाफ दायर अपीलों का निपटारा करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि जब किसी मुकदमे के निकट भविष्य में समाप्त होने की संभावना न हो, तो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाली व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा की जानी चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि मुकदमे से पहले की लंबी हिरासत को दंडात्मक उपाय में तब्दील नहीं किया जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

इस मामले की शुरुआत 18 जनवरी 2024 की प्रारंभिक जांच संख्या 06/2024 से हुई थी, जिसके आधार पर 30 अक्टूबर 2024 को भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी), जयपुर में एफआईआर संख्या 245/2024 दर्ज की गई। यह एफआईआर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (2018 संशोधन सहित) की धारा 7(सी), 9, 10, 13(1)(ए) सपठित 13(2) और 12 के साथ-साथ भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 409, 466, 467, 468, 471, 477-ए और 120-बी के तहत दर्ज हुई थी।

अभियोजन पक्ष का आरोप है कि जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग (पीएचईडी), राजस्थान में जल जीवन मिशन के क्रियान्वयन के दौरान एक सुनियोजित षड्यंत्र और गंभीर वित्तीय अनियमितताएं बरती गईं। इस योजना का उद्देश्य ग्रामीण परिवारों तक नल से सुरक्षित पेयजल पहुंचाना था। जांच एजेंसी के अनुसार, दो निजी ठेका फर्मों—मैसर्स श्री गणपति ट्यूबवेल कंपनी और मैसर्स श्री श्याम ट्यूबवेल कंपनी—ने वरिष्ठ अधिकारियों और बिचौलियों के साथ मिलीभगत कर इरकॉन इंटरनेशनल लिमिटेड द्वारा जारी किए गए फर्जी व कूटरचित कार्य-अनुभव प्रमाणपत्र तैयार करवाए। इन दस्तावेजों के आधार पर दोनों फर्मों ने पात्रता हासिल की और लगभग 979.45 करोड़ रुपये मूल्य के करीब 104 टेंडर हासिल किए, जिससे सरकारी खजाने को भारी नुकसान पहुंचा।

जांच पूरी होने के बाद एसीबी ने 12 अप्रैल 2026 को चार्जशीट संख्या 80/2026 और 29 जून 2026 को पूरक चार्जशीट संख्या 80-बी/2026 दाखिल की, जिसमें अन्य आरोपियों के साथ इन दोनों अपीलकर्ताओं को भी नामजद किया गया। अभियोजन ने मुकदमे में 124 गवाहों और हजारों पन्नों के दस्तावेजी रिकॉर्ड पेश करने की बात कही है।

दोनों अपीलकर्ताओं पर लगे विशिष्ट आरोप इस प्रकार हैं:

  • शुभांशु दीक्षित: एक लोक सेवक, जो 30 दिसंबर 2022 से 13 फरवरी 2024 तक राजस्थान वाटर सप्लाई एंड सीवरेज मैनेजमेंट बोर्ड के सचिव और पीएचईडी फाइनेंस कमेटी के डी-फैक्टो सचिव रहे। अभियोजन का आरोप है कि उन्होंने फर्जी प्रमाणपत्रों को लेकर व्हिसलब्लोअर की शिकायतों और कानूनी नोटिसों को दबाया, दागी फर्मों की वित्तीय बोलियों को मंजूरी देने वाली बैठकों में भाग लिया और बैठकों के मिनट्स जारी कर अपात्र फर्मों को टेंडर दिलाने में मदद की। उन्हें 17 फरवरी 2026 को गिरफ्तार किया गया था।
  • संजय बडाया: एक निजी व्यक्ति, जिन पर तत्कालीन पीएचईडी कैबिनेट मंत्री महेश चंद्र जोशी के दलाल और बिचौलिए के तौर पर काम करने का आरोप है। अभियोजन के अनुसार, विभाग में कोई आधिकारिक पद न होते हुए भी वे टेंडर फाइलों की आवाजाही, सतर्कता जांचों और अभियंताओं के तबादलों व पदस्थापनों को प्रभावित करते थे। उन पर ठेकेदारों से नकदी रिश्वत लेने और उस रकम को रिश्तेदारों व परिचितों के बैंक खातों के जरिए मंत्री के पुत्र की फर्म मैसर्स सुमंगलम लैंडमार्क एलएलपी में भेजने का आरोप है। उन्हें 11 मई 2026 को गिरफ्तार किया गया था।
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दोनों ने हाईकोर्ट के 1 जून 2026 (दीक्षित के मामले में) और 13 अगस्त 2026 (बडाया के मामले में) के उन फैसलों को चुनौती दी थी, जिनके जरिए उनकी नियमित जमानत याचिकाएं खारिज कर दी गई थीं।

पक्षकारों की दलीलें

अपीलकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकीलों ने नियमित जमानत देने का अनुरोध करते हुए दलील दी कि उनके मुवक्किलों के संबंध में जांच पूरी हो चुकी है और चार्जशीट पहले ही दाखिल की जा चुकी है।

वहीं, राजस्थान राज्य के वकील ने अपीलों का पुरजोर विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि गहरे षड्यंत्र वाले आर्थिक अपराधों को अत्यंत गंभीरता से देखा जाना चाहिए और अपराध की गंभीरता को देखते हुए दोनों अभियुक्तों की निरंतर हिरासत और जमानत से इनकार पूरी तरह उचित है।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि यद्यपि गहरे षड्यंत्र से जुड़े आर्थिक अपराध गंभीर होते हैं और राज्य द्वारा जमानत का विरोध करना स्वाभाविक है, लेकिन मामले के अन्य पहलुओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

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पीठ ने स्पष्ट टिप्पणी की: “यद्यपि हमें राज्य के विद्वान वकील से इस बात पर सहमत होने में कोई संकोच नहीं है कि गहरे षड्यंत्र वाले आर्थिक अपराधों को गंभीरता से देखा जाना चाहिए और राज्य वर्तमान अपीलकर्ताओं को जमानत दिए जाने का विरोध करने में सही है, तथापि, वर्तमान मामले के अन्य पहलुओं की अनदेखी नहीं की जा सकती। वर्तमान अपीलकर्ताओं के संबंध में जांच पूरी हो चुकी है और चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है। अभियोजन का मामला मुख्य रूप से दस्तावेजी रिकॉर्ड और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों पर टिका है। चूंकि ये सामग्रियां पहले ही जब्त की जा चुकी हैं और जांच एजेंसी की सुरक्षित हिरासत में हैं, इसलिए साक्ष्यों से छेड़छाड़ की आशंका काफी हद तक समाप्त हो जाती है।”

पीठ ने आगे रेखांकित किया कि ट्रायल कोर्ट के समक्ष यह मामला अभी शुरुआती दौर में है और आरोप तक तय नहीं हुए हैं। अदालत ने कहा कि कुछ आरोपियों के खिलाफ जांच अभी भी जारी है, दो आरोपी फरार हैं, और छह अन्य लोक सेवक सह-आरोपियों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 19 के तहत मुकदमा चलाने की मंजूरी 6 सितंबर 2026 को ही मिली है। गवाहों की लंबी सूची और भारी-भरकम रिकॉर्ड को देखते हुए ट्रायल के लंबा खिंचने की पूरी संभावना है।

न्यायालय ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर जोर देते हुए कहा: “आपराधिक न्यायशास्त्र का यह एक सुस्थापित सिद्धांत है कि ट्रायल-पूर्व हिरासत दंडात्मक कारावास का रूप नहीं ले सकती, विशेषकर तब जब मुकदमे की शुरुआत और उसका निष्कर्ष निकट भविष्य में संभावित न हो। जब किसी मुकदमे के निकट भविष्य में तार्किक रूप से समाप्त होने की संभावना न हो, तब भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा के लिए इस न्यायालय को हस्तक्षेप करना ही होगा।”

अदालत ने इस तथ्य पर भी ध्यान दिया कि इस कथित षड्यंत्र के सह-आरोपी अरुण श्रीवास्तव को हाईकोर्ट पहले ही 1 जून 2026 को जमानत दे चुका है, और तत्कालीन विभागीय मंत्री महेश चंद्र जोशी को इसी एफआईआर से उपजे धन शोधन रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए) मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा 3 दिसंबर 2025 को जमानत प्रदान की जा चुकी है।

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अदालत का अंतिम निर्णय

यह मानते हुए कि अपीलकर्ताओं को आगे हिरासत में रखने से कोई सार्थक उद्देश्य सिद्ध नहीं होगा, सुप्रीम कोर्ट ने दोनों अपीलें स्वीकार कर लीं और हाईकोर्ट के 1 जून 2026 व 13 अगस्त 2026 के आदेशों को निरस्त कर दिया।

अदालत ने निर्देश दिया कि संजय बडाया और शुभांशु दीक्षित को ट्रायल कोर्ट की संतुष्टि के अनुरूप जमानत बांड भरने और उचित शर्तों के अधीन नियमित जमानत पर रिहा किया जाए। साथ ही यह निर्देश भी दिया गया कि यदि जांच अधिकारी आवश्यकता पड़ने पर उन्हें बुलाते हैं, तो वे जांच में शामिल होंगे। अभियुक्तों को मुकदमे की प्रत्येक तारीख पर उपस्थित रहने का निर्देश देते हुए ट्रायल कोर्ट को यह छूट दी गई कि बिना उचित कारण गैर-हाजिर रहने या शर्तों का उल्लंघन होने पर वह जमानत रद्द कर सकता है।

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने आरोपों के गुण-दोष, अभियुक्तों की कथित भूमिका या साक्ष्यों के महत्व पर कोई अंतिम राय व्यक्त नहीं की है और ट्रायल कोर्ट इस मामले का स्वतंत्र रूप से निपटारा करेगा।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: संजय बडाया बनाम राजस्थान राज्य, साथ में शुभांशु दीक्षित बनाम राजस्थान राज्य

वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 2026, विशेष अनुमति याचिका आपराधिक संख्या 15347 वर्ष 2026 एवं 13461 वर्ष 2026 से उद्भूत 

पीठ: जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू 

निर्णय की तिथि: 29 सितंबर 2026

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