सार्वजनिक स्वास्थ्य और तंबाकू नियंत्रण को लेकर दिए गए एक महत्वपूर्ण निर्णय में, इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि रेस्तरां, होटल और कैफे के डेजिग्नेटेड स्मोकिंग एरिया (निर्धारित धूम्रपान क्षेत्र) में हुक्का बार चलाना या हुक्का सेवा प्रदान करना भारतीय कानून के तहत पूरी तरह से गैर-कानूनी है। उत्तर प्रदेश भर के आतिथ्य प्रतिष्ठानों द्वारा दायर 80 रिट याचिकाओं को खारिज करते हुए कोर्ट ने माना कि ‘प्रोहिबिशन ऑफ स्मोकिंग इन पब्लिक प्लेसेज रूल्स, 2008’ में वर्ष 2017 में किए गए संशोधन ने स्मोकिंग जोन के भीतर किसी भी प्रकार की सेवा देने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। कोर्ट ने कहा कि इस संशोधन के बाद वे पुराने न्यायिक फैसले निष्प्रभावी हो चुके हैं, जिनमें शर्तों के साथ हुक्का की अनुमति दी गई थी।
मामले की पृष्ठभूमि
इस कानूनी विवाद की शुरुआत कोविड-19 महामारी के दौरान लगे प्रतिबंधों से हुई थी। 27 अगस्त 2020 को हाईकोर्ट ने एक स्वतः संज्ञान जनहित याचिका (पीआईएल संख्या 716/2020) में राज्य के मुख्य सचिव को निर्देश दिया था कि संक्रमण रोकने के लिए बार, कैफे और रेस्तरां में हुक्का परोसने पर तत्काल रोक लगाई जाए। इसके अनुपालन में 5 सितंबर 2020 को राज्य सरकार ने पूरे प्रदेश में हुक्का बार के संचालन पर रोक लगा दी थी।
महामारी का दौर समाप्त होने के बाद, हाईकोर्ट ने 21 फरवरी 2023 को जनहित याचिका का निस्तारण करते हुए मामले के गुण-दोष पर जाए बिना प्रतिष्ठानों को यह छूट दी कि वे कानून के अनुसार संबंधित प्राधिकरणों के समक्ष लाइसेंस के लिए आवेदन कर सकते हैं। इसके बाद, 29 मार्च 2023 को खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (एफएसडीए) के आयुक्त ने एक परिपत्र जारी कर अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे संशोधित नियम, 2008 के अनुपालन की शर्त पर हुक्का बार चलाने वाले प्रतिष्ठानों के आवेदनों का निस्तारण करें।
हालांकि, इसके बावजूद पुलिस की कार्रवाई जारी रही। 15 मई 2023 को लखनऊ के गोमती नगर स्थित ‘फैशन टीवी कैफे’ (मैसर्स आफटेक फूड्स एंड बेवरेजेस प्राइवेट लिमिटेड) के खिलाफ दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 133 के तहत एक आदेश जारी किया गया। इसमें कहा गया कि कैफे के बाहर खुले स्थान में बिना अनुमति हुक्का परोसा जा रहा था और नाबालिगों को हुक्का देकर न्यूसेंस पैदा किया जा रहा था। इस पुलिस कार्रवाई के खिलाफ प्रतिष्ठानों ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और दावा किया कि पुलिस का यह हस्तक्षेप संविधान के अनुच्छेद 19(1)(जी) के तहत मिले उनके व्यापार और कारोबार के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।
दोनों पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश अधिवक्ता हर्षित सिंह ने मुख्य रूप से निम्नलिखित तर्क रखे:
- महामारी प्रतिबंधों की अस्थायी प्रकृति: सितंबर 2020 का प्रतिबंध कोविड महामारी के दौरान संक्रमण की कड़ी तोड़ने के लिए लागू किया गया एक आपातकालीन उपाय था। इसे सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम, 2003 (कोटपा – COTPA) के तहत स्थायी प्रतिबंध नहीं माना जा सकता।
- खाद्य सुरक्षा और नगर निगम के अधिकार क्षेत्र का अभाव: तंबाकू उत्पाद केवल कोटपा के दायरे में आते हैं और खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 (एफएसएसए) के दायरे से बाहर हैं, क्योंकि तंबाकू कोई पोषक खाद्य पदार्थ नहीं है। इसी तरह, नगर निगम कानूनों में भी हुक्का लाइसेंस जारी करने या रोकने का कोई प्रावधान नहीं है।
- पुलिस के अधिकारों की सीमा: कोटपा की धारा 12 के तहत पुलिस अधिकारी को तलाशी या जब्ती से पहले संदेह का उचित कारण दर्ज करना होता है। पुलिस को नियमों का पालन करने वाले परिसरों पर मनमाने छापे मारने का अधिकार नहीं है।
- कानूनी छूट का प्रावधान: कोटपा की धारा 4 का परंतुक 30 या उससे अधिक सीटों वाले रेस्तरां को अलग से डेजिग्नेटेड स्मोकिंग एरिया बनाने की स्पष्ट अनुमति देता है।
- ‘सेल्फ-सर्विस’ और ‘रेंटल’ का सिद्धांत: सुप्रीम कोर्ट के यूनियन ऑफ इंडिया बनाम मोहित मिनरल्स प्राइवेट लिमिटेड और मद्रास हाईकोर्ट के आनंदसिने सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड बनाम कमिश्नर ऑफ सर्विस टैक्स के फैसलों का हवाला देते हुए तर्क दिया गया कि ग्राहकों को हुक्का उपकरण देना एक ‘किराया’ (रेंटल) या उपकरण के इस्तेमाल के अधिकार का हस्तांतरण है, न कि कोई ‘सर्विस’। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि वे एक ‘सेल्फ-सर्विस मॉडल’ का पालन करने को तैयार हैं, जिसमें हुक्का स्मोकिंग जोन के बाहर तैयार कर ग्राहक को सौंपा जाएगा और ग्राहक स्वयं उसे अंदर ले जाकर बिना किसी वेटर या स्टाफ की मदद के पिएगा, जिससे ‘सर्विस’ पर लगे प्रतिबंध का उल्लंघन नहीं होगा।
राज्य सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता पंकज खरे ने इन दलीलों का विरोध करते हुए कहा:
- संवैधानिक दायित्व: संविधान के अनुच्छेद 47 के तहत सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा करना राज्य का प्राथमिक कर्तव्य है। वैज्ञानिक प्रमाण बताते हैं कि हुक्के का धुआं कार्बन मोनोऑक्साइड, भारी धातुओं और कार्सिनोजेन से भरा होता है, जो सक्रिय और निष्क्रिय दोनों तरह के धूम्रपान करने वालों के लिए बेहद घातक है।
- कानून में पूर्ण प्रतिबंध: नियम 2008 के पुराने नियम 4(3) में लिखा था कि स्मोकिंग एरिया में धूम्रपान के अलावा ‘कोई अन्य सेवा’ (नो अदर सर्विस) नहीं दी जाएगी। केंद्र सरकार ने 23 मई 2017 को अधिसूचना जारी कर इसमें संशोधन किया और स्पष्ट रूप से लिखा—“धूम्रपान क्षेत्र या धूम्रपान के लिए बनाए गए स्थान में कोई भी सेवा (नो सर्विस) नहीं दी जाएगी।” ‘अन्य’ शब्द को हटाना यह दर्शाता है कि स्मोकिंग एरिया में हर प्रकार की व्यावसायिक सेवा पर पूर्ण रोक लगा दी गई है।
- हुक्का का स्वाभाविक स्वरूप सेवा पर आधारित: हुक्का पीना सिगरेट पीने जैसा नहीं है। इसमें पाइप जोड़ना, तंबाकू भरना, सुलगते कोयले रखना और स्टाफ द्वारा लगातार कोयला बदलना शामिल होता है। कर्नाटक हाईकोर्ट ने आर. भरत बनाम कर्नाटक राज्य मामले में माना है कि यह पूरी तरह से एक व्यावसायिक सेवा है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और निष्कर्ष
कोटपा के वैधानिक ढांचे और संवैधानिक सिद्धांतों का विश्लेषण करते हुए खंडपीठ ने कई महत्वपूर्ण निष्कर्ष दर्ज किए:
1. नियमन के दायरे में पूर्ण प्रतिबंध भी शामिल
याचिकाकर्ताओं की इस दलील को खारिज करते हुए कि कोटपा केवल नियमन (रेगुलेशन) का कानून है और यह पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगा सकता, खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों—जी.के. कृष्णन बनाम तमिलनाडु राज्य और इंडियन हैंडीक्राफ्ट्स एम्पोरियम बनाम यूनियन ऑफ इंडिया—का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि व्यापक जनहित और स्वास्थ्य की रक्षा के लिए नियमन के भीतर पूर्ण प्रतिबंध भी शामिल हो सकता है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 19(1)(जी) के तहत व्यापार करने का अधिकार, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गैर-धूम्रपान करने वालों के स्वच्छ हवा में सांस लेने के अधिकार के अधीन है, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने मुरली एस. देवड़ा बनाम यूनियन ऑफ इंडिया में निर्धारित किया था।
2. नियम 4(3) में 2017 के संशोधन का कानूनी असर
कोर्ट ने माना कि सुप्रीम कोर्ट का 2014 का फैसला (नरिंदर एस. चड्ढा बनाम म्युनिसिपल कॉरपोरेशन ऑफ ग्रेटर मुंबई)—जिसमें स्मोकिंग एरिया में हुक्का की अनुमति दी गई थी—पुराने नियम 4(3) पर आधारित था, जब केवल भोजन और पेय पदार्थों जैसी ‘अन्य सेवाओं’ पर रोक थी।
विधायी बदलाव को रेखांकित करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:
“2017 के संशोधन के बाद यह अस्पष्टता पूरी तरह समाप्त हो चुकी है। हमारी राय में, ‘नो अदर सर्विस’ की जगह ‘नो सर्विस’ लाया जाना और ‘अदर’ शब्द को जानबूझकर हटाया जाना कानूनी स्थिति को सशर्त निषेध से पूर्ण निषेध में बदल देता है। नरिंदर एस. चड्ढा (उपरोक्त) का फैसला अब नजीर के रूप में लागू नहीं होता, क्योंकि विधायी संशोधन द्वारा इसे निष्प्रभावी कर दिया गया है। 2017 के संशोधन के बाद डेजिग्नेटेड स्मोकिंग एरिया के भीतर किसी भी प्रकार की हुक्का सेवा—चाहे वह तंबाकू आधारित हो, निकोटीन आधारित हो या हर्बल हो—प्रदान नहीं की जा सकती। नियम, 2008 के नियम 4(3) के तहत डेजिग्नेटेड स्मोकिंग एरिया में हुक्का परोसना स्पष्ट, बिना शर्त और पूरी तरह से प्रतिबंधित है।”
कर्नाटक हाईकोर्ट के जस्टिस एम. नागप्रसन्ना द्वारा आर. भरत बनाम कर्नाटक राज्य में दिए गए तर्कों से सहमति जताते हुए कोर्ट ने दोहराया कि स्मोकिंग जोन में किसी भी प्रकार की सेवा देना पूर्णतः वर्जित है।
3. ‘सेल्फ-सर्विस’ और ‘रेंटल’ की दलीलों को किया खारिज
कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के ‘सेल्फ-सर्विस’ और ‘उपकरण किराए पर देने’ के तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया।
हुक्का तैयार करने की प्रक्रिया—जिसमें बेस में पानी भरना, चिलम में तंबाकू सजाना, फॉयल में छेद करना और सुलगते कोयले रखना शामिल है—का विवरण देते हुए कोर्ट ने कहा:
“इस फैसले के पैरा 32 में दर्ज हुक्का तैयार करने की पद्धति को देखने से स्पष्ट हो जाता है कि याचिकाकर्ताओं की सेल्फ-सर्विस मॉडल की दलील संशोधित नियमों के नियम 4(3) का मखौल उड़ाने जैसी है। हम इसे कतई स्वीकार नहीं कर सकते, क्योंकि हम हाईकोर्ट के जज मुख्यभूमि में चल रही हुक्का बार, लाउंज और रेस्तरां की गतिविधियों से कटे हुए किसी निर्जन द्वीप पर नहीं रहते हैं। हुक्का के सेल्फ-सर्विस का यह पूरा तर्क न केवल अव्यावहारिक है, बल्कि इस अदालत की बुद्धिमत्ता और व्यावहारिक ज्ञान को भी कमतर आंकने वाला है।”
कोर्ट ने बिना ड्राइवर के टैक्सी किराए पर लेने के उदाहरण को भी नामंजूर कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जब कोई व्यक्ति कार किराए पर लेता है तो उसके पास उसका पूरा नियंत्रण होता है और वह उसे कहीं भी ले जा सकता है। लेकिन हुक्का के मामले में ग्राहक को उसे केवल रेस्तरां के डेजिग्नेटेड स्मोकिंग एरिया के भीतर ही इस्तेमाल करने की पाबंदी होती है। ग्राहक को कभी भी उसका पूर्ण आधिपत्य या नियंत्रण नहीं मिलता, इसलिए यह पूरी प्रक्रिया प्रतिफल लेकर दी जाने वाली एक व्यावसायिक सेवा ही है।
4. प्रशासनिक व पुलिस क्षेत्राधिकार का निर्धारण
प्रशासनिक सीमाओं को स्पष्ट करते हुए खंडपीठ ने कहा:
- खाद्य सुरक्षा विभाग और नगर निगम: कोर्ट ने सहमति जताई कि खाद्य सुरक्षा विभाग या नगर निगम के पास हुक्का बार को विनियमित करने या उसका लाइसेंस जारी करने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है।
- पुलिस के अधिकार: कोर्ट ने माना कि कोटपा की धारा 12, 13 और 15 के तहत सब-इंस्पेक्टर या उससे ऊपर के पद के पुलिस अधिकारियों के पास यह अधिकार है कि वे धारा 4 और 6 का उल्लंघन होने पर परिसरों में प्रवेश कर सकते हैं, तलाशी ले सकते हैं, सामग्री जब्त कर सकते हैं और जुर्माना लगा सकते हैं।
कोर्ट का अंतिम निर्णय
मुख्य कानूनी प्रश्न का उत्तर नकारात्मक में देते हुए कोर्ट ने निर्णय दिया:
“उपरोक्त सिद्धांतों के सूक्ष्म परीक्षण के उपरांत यह अदालत इस स्पष्ट निष्कर्ष पर पहुँचती है कि याचिकाओं द्वारा उठाया गया यह सवाल—कि क्या उत्तर प्रदेश राज्य में सार्वजनिक स्थलों के भीतर स्थित डेजिग्नेटेड स्मोकिंग एरिया में हुक्का बार कानूनी रूप से संचालित किए जा सकते हैं और हुक्का सेवा दी जा सकती है—नकारात्मक रूप से तय किया जाता है। सार्वजनिक स्थल पर किसी गैर-धूम्रपान करने वाले व्यक्ति का स्वच्छ हवा में सांस लेने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत एक मौलिक अधिकार है, जिसे अनुच्छेद 19(1)(जी) के तहत किसी प्रतिष्ठान के व्यापारिक हितों द्वारा छीना नहीं जा सकता। तदनुसार, यह अदालत मानती है कि उत्तर प्रदेश राज्य में रेस्तरां द्वारा हुक्का बार का संचालन और हुक्का सेवा प्रदान करना वर्ष 2017 में संशोधित रूल्स, 2008 के नियम 4(3) का खुला उल्लंघन है और यह कोटपा के उद्देश्य और योजना के प्रत्यक्ष विपरीत है।”
हाईकोर्ट ने सभी 80 रिट याचिकाओं को खारिज कर दिया। साथ ही, रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि आदेश की प्रति तत्काल अनुपालन के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को भेजी जाए।
उपसंहार: स्वास्थ्य चेतावनियां और राज्य सरकार से अपेक्षा
चिकित्सा अनुसंधानों का हवाला देते हुए पीठ ने रेखांकित किया कि लगभग एक घंटे के एक हुक्का सत्र में व्यक्ति करीब 200 कश खींचता है, जो 100 सिगरेट पीने के बराबर विषैला नुकसान पहुँचाता है। पानी से छनकर आने के कारण हुक्के के कम नुकसानदेह होने का दावा पूरी तरह भ्रामक है। कोर्ट ने उल्लेख किया कि गुजरात, पंजाब, राजस्थान, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों ने सख्त दंडात्मक प्रावधानों के साथ राज्य स्तरीय संशोधन पारित कर हुक्का बार पर प्रतिबंध लगाया है। कोर्ट ने उम्मीद जताई कि उत्तर प्रदेश सरकार भी जनहित में इसी प्रकार के कड़े कदम उठाएगी।
जज ने साझा किया तंबाकू से जुड़ा निजी संघर्ष, युवाओं को आगाह करने के लिए लिखी कविता
फैसले के अंत में “तंबाकू धूम्रपान के साथ मेरा अनुभव” शीर्षक के तहत जस्टिस शेखर बी. सराफ ने युवाओं को तंबाकू की गिरफ्त से बचाने के उद्देश्य से सिगरेट की लत से जुड़े अपने व्यक्तिगत संघर्ष को बेहद संजीदगी से साझा किया:
“धूम्रपान के अपने निजी अनुभव के आधार पर, मैं इन अंतिम अनुच्छेदों को इस उम्मीद में लिख रहा हूँ कि इस देश की युवा पीढ़ी को शिक्षित कर सकूँ ताकि वे तंबाकू धूम्रपान की इस विनाशकारी और अमिट लत का शिकार न बनें:”
इसके बाद जज ने 36 पंक्तियों की एक कविता के जरिए बताया कि कैसे लॉ कॉलेज के दिनों में शुरू हुआ एक ‘सुट्टा’ धीरे-धीरे इंसान को अपनी गिरफ्त में ले लेता है:
“सुबह की ओस सा निर्मल, जब लॉ स्कूल में गया था मैं,
गेट पर कश खींचते लोगों को देख नाक सिकोड़ता था मैं,
‘कमजोर इच्छाशक्ति वाले,’ कहकर हँसता था, ‘इनमें कभी शामिल न होऊंगा मैं’,
मगर वे अंतिम शब्द साबित हुए, पाठको, सच तो यह था कि फंदे में आ चुका था मैं।
शुरुआत हुई थी एक मासूम, गर्म ‘चाय’ के साथ,
एक सीनियर ने बढ़ाया हाथ, ‘एक बार लो, बस मजे की बात।’
मैंने भी तूफान में कूदते सिपाही की तरह उसे थामा,
बहादुरी से, मूर्खता से, और एक के बाद एक सिलसिला थमा नहीं।
वह ‘कभी-कभार का सुट्टा’ जल्द ही बेखौफ हो गया,
खरगोशों की तरह बेतहाशा बढ़ता गया।
मेरे फेफड़े, जो कभी मेरे थे, चुपचाप बिक चुके थे,
उस मकान मालिक के हाथ, जिसने कभी किराये की शर्तें नहीं बताई थीं।
मैं खुद को बहलाता रहा कि मैं तो बस कभी-कभार लेता हूँ,
एक तहजीबदार, नियंत्रण में रहने वाला सोशल स्मोकर हूँ।
मगर इधर गिनती खामोशी से बढ़ती रही,
‘बस एक और’ से बढ़ते-बढ़ते ‘पूरा पैकेट खरीद लो’ तक पहुँच गई।
फिर आई खाँसी, जो मेरे जिस्म का स्टैंड-अप एक्ट बन गई,
हर रात बिना माँगे, मुफ्त में अपनी नुमाइश करने लगी।
कफ आ धमका, एक बेहद कड़वी सच्चाई बनकर,
मानो मेरे गले को दलदल बसाने का जिम्मा सौंप दिया गया हो।
मैंने पैच आजमाया, तो खुजली ने सताया,
मैंने निकोटीन गम चबाया, फिर भी सिगरेट सुलगाया;
बिल्कुल उस डाइटिंग करने वाले की तरह जो केक छोड़ने की कसम खाकर,
क्रीम को ‘हानिरहित’ मानकर सीधे उसी पर टूट पड़ता है।
‘मैं छोड़ दूंगा,’ मैंने बड़े यकीन से दो बार कहा,
फिर तीन बार, फिर साल में करीब चालीस बार कहा।
हर जनवरी मेरे अपने लिए वही सलाह लेकर आती रही,
जिसे मैंने कभी माना ही नहीं।
सच कहूँ तो अब मैंने छोड़ने की कोशिश ही छोड़ दी है,
संकल्पों पर धूल और शर्म की परत जम चुकी है,
पर उम्मीद अब भी बाकी है कि शायद जब यह दायित्व पूरा होगा
(यह काम, यह फैसला), तब इच्छाशक्ति फिर से अपना हक जताएगी।
तो नज़्म में पिरोकर यह मेरी जनसेवा है,
उस इंसान की तरफ से जो उसी रास्ते पर चला जिस पर आज तुम हो:
पहली सिगरेट एक मासूम वक्त जैसी लगती है,
पर यह वैसी नहीं होती। मेरे उस बीस साल के गुरूर पर नहीं,
उस खाँसी पर भरोसा करो जो अब मेरे पास है।
वह बेवकूफ मत बनो जिसने हँसी उड़ाई थी, और अंत में खौलते पानी का मेढक बन कर रह गया।”
जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी ने इस निर्णय से पूर्ण सहमति व्यक्त की।
मामले में पेश हुए अधिवक्ता
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता:
वत्सला सिंह, नितेश कुमार मिश्रा, शोभित मोहन शुक्ला, आर्ष राज, अभय प्रताप सिंह, अभिलाषा रस्तोगी, अभिषेक मिश्रा, अभिषेक सिंह, आदर्श प्रताप सिंह, अजय कुमार सिंह, अजीत प्रताप सिंह, आकांक्षा पाठक, अखिलेश्वर सिंह, आकृति पांडे, अमन ठाकुर, आनंद कुमार, आनंद मिश्रा, आनंद प्रकाश दीक्षित, अनुभव अवस्थी, अनुज कुमार अवस्थी, अनुज कुमार गुप्ता, अनुराग सिंह, अर्पित वर्मा, अरुण कुमार यादव, आर्यन सिंह, आशीष कुमार, आशुतोष मिश्रा, आत्मा राम मिश्रा, चंदन वर्मा, दीपांशी, धर्मेंद्र कुमार वर्मा, धीरज प्रताप सिंह, दिनेश कुमार मिश्रा, दिव्या द्विवेदी, हरि कृष्णा चौबे, हर्षित सिंह, हर्षिता रजनीश, इंद्र प्रताप सिंह, ईशान भसीन, कमलेश कुमार गुप्ता, क्षेमेंद्र शुक्ला, लक्ष्मी कांत त्रिपाठी, मंगल सेन यादव, मनोज कुमार मिश्रा, मोहम्मद इमरान खान, मुस्कान भारती, नीता टेकवानी, पलक सहाय गुप्ता, पंकज मिश्रा, पंकज वर्मा, पवन कुमार शुक्ला, पीयूष त्रिपाठी, प्रभाकर त्रिवेदी, प्रशांत मिश्रा, प्रेरणा जालान, राघवेंद्र पांडे, राहुल कुमार, राज कृष्णा, राकेश कुमार उपाध्याय, रत्नेश कुमार रावत, रितिक भारद्वाज, रितिक भारद्वाज, सचिन दीक्षित, सागर सिंह, समन्व्य धर द्विवेदी, सानिध्य शुक्ला, संजीव कुमार द्विवेदी, सौरभ कश्यप, शैलेंद्र कुमार सिंह, शिव शंकर वर्मा, शिखर चौबे, शिवांशु गोस्वामी, शोभ नाथ पांडे, शिवेंद्र कुमार श्रीवास्तव, सुधांशु सिंह, सूरज शर्मा, सूर्य भान सिंह, सुशील कुमार, सैयद आफताब अहमद, सैयद अहमद मेहदी, तौहीद, वैभव श्रीवास्तव, वैभव उपाध्याय, वर्षा पांडे और विनीत त्रिपाठी।
प्रतिवादियों की ओर से अधिवक्ता:
मुख्य स्थायी अधिवक्ता (सीएससी), शासकीय अधिवक्ता (जीए), अखिलेश कुमार श्रीवास्तव, आभा श्रीवास्तव, अदनान हशमत, आफताब अहमद, अनुज कुमार श्रीवास्तव, जयेश भूसरेड्डी, कृष्ण कुमार पांडे, मोहम्मद तालिब खान, नामित शर्मा, ओम शंकर तिवारी, पंकज खरे, राजेश कुमार सिंह, शैलेंद्र सिंह चौहान, शैलेश कुमार पाठक, शाश्वत द्विवेदी, श्रुति साहू, सिद्धार्थ त्रिपाठी, सिद्धार्थ शंकर दुबे, सिद्धार्थ त्रिपाठी और यतींद्र पाठक।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: मैसर्स आफटेक फूड्स एंड बेवरेजेस प्राइवेट लिमिटेड बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य
वाद संख्या: रिट-सी संख्या 10713/2023
पीठ: जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी
निर्णय की तिथि: 29 सितंबर 2026

