ईपीएफ बकाये पर 12% और वेतन बकाये पर 6% ब्याज देय: बिहार-झारखंड उपक्रम विवाद में सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि बंद हो चुके राज्य स्वामित्व वाले निगमों के कर्मचारियों के कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) बकाये पर कर्मचारी भविष्य निधि एवं प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1952 की धारा 7-क्यू के तहत 12 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से अनिवार्य वैधानिक साधारण ब्याज देय होगा, जबकि वेतन और अन्य मौद्रिक बकाये पर देय तिथि से वास्तविक भुगतान तक 6 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से साधारण ब्याज दिया जाएगा। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने अविभाजित बिहार के पुनर्गठन से उपजे इस दशकों पुराने विवाद का निपटारा करते हुए सभी पात्र दैनिक वेतनभोगियों को एकमुश्त 1,00,000 रुपये का अतिरिक्त मुआवजा देने का भी निर्देश दिया। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने कर्मचारियों की पहचान की औपचारिक प्रक्रिया को बंद करते हुए दावेदारों को अपने दावों के सत्यापन के लिए 12 महीने का समय दिया और बिहार तथा झारखंड दोनों सरकारों को चार सप्ताह के भीतर सभी भुगतानों व लंबित दावों का पूरा विवरण ऑनलाइन सार्वजनिक करने का आदेश दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद बिहार पुनर्गठन अधिनियम, 2000 के तहत तत्कालीन बिहार राज्य के पुनर्गठन और झारखंड राज्य के गठन से शुरू हुआ था। इस विभाजन के बाद पांच प्रमुख राज्य-स्वामित्व वाले अंतर-राज्यीय निगमों के कर्मचारियों की देनदारियों, बकाया वेतन, सेवानिवृत्ति लाभों और सेवा संबंधी दावों के बंटवारे तथा भुगतान को लेकर गंभीर विवाद खड़ा हो गया:

  1. बिहार स्टेट कंस्ट्रक्शन कॉरपोरेशन लिमिटेड (बीएससीसीएल)
  2. बिहार स्टेट इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड (बीएसआईडीसी)
  3. बिहार स्टेट इलेक्ट्रॉनिक डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड (बीएसईडीसी)
  4. बिहार स्टेट फॉरेस्ट डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड (बीएसएफडीसी)
  5. बिहार स्टेट पंचायती राज फाइनेंशियल कॉरपोरेशन लिमिटेड (बीपीआरएफसी)

यह मुकदमा ऐतिहासिक कपिला हिंगोरानी बनाम बिहार राज्य मामले से जुड़ा रहा है। पूर्व में सुप्रीम कोर्ट ने इस गतिरोध को सुलझाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त जज जस्टिस दिनेश माहेश्वरी की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति गठित की थी। 29 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने समिति की अंतिम रिपोर्ट की सिफारिशों को स्वीकार करते हुए तय मुद्दों पर अंतिम मुहर लगा दी थी, लेकिन तीन अनसुलझे मुद्दों को न्यायिक निर्णय के लिए खुला छोड़ दिया था:

  • शेष बचे कर्मचारियों, श्रमिकों अथवा उनके कानूनी वारिसों की पहचान और सत्यापन, जिनके दावों का अभी तक अंतिम निपटारा नहीं हुआ है;
  • दैनिक वेतनभोगियों और मृत कर्मचारियों के कानूनी वारिसों को एकमुश्त मुआवजा अथवा कल्याणकारी सहायता की पात्रता; और
  • विलंबित वेतन, मजदूरी, सेवानिवृत्ति लाभ और भविष्य निधि की राशि पर ब्याज की पात्रता तथा उसकी दर का निर्धारण।

अगस्त 2026 में दोनों राज्यों द्वारा दाखिल अनुपालन हलफनामों के अनुसार, कुल सत्यापित 2,274 कर्मियों में से 2,074 को उनके मूल बकाये का भुगतान कर दिया गया था, जबकि लगभग 200 मामले ऐसे थे जिनमें कर्मचारी लापता थे या आवश्यक दस्तावेजों की कमी थी।

याचिकाकर्ताओं की दलीलें

याचिकाकर्ता यूनियन की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सुश्री प्रिया हिंगोरानी ने दलील दी कि कुछ कर्मचारियों का पता न चल पाना या दस्तावेजों की कमी होना उनके विधिवत तय अधिकारों को समाप्त नहीं कर सकता। उन्होंने आग्रह किया कि शेष बची धनराशि को किसी एस्क्रो अकाउंट या अलग कोष में सुरक्षित रखा जाना चाहिए, ताकि दावेदार या उनके कानूनी वारिस सत्यापन प्रक्रिया पूरी होते ही बिना दोबारा मुकदमा लड़े अपनी राशि प्राप्त कर सकें।

दैनिक वेतनभोगियों के संबंध में, वरिष्ठ अधिवक्ता ने “काम नहीं तो वेतन नहीं” के सिद्धांत को लागू करने का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि बीएससीसीएल ने अक्टूबर 2015 तक इन कर्मियों को औपचारिक रूप से सेवामुक्त नहीं किया था और वे निगम के श्रमिक बने रहे। इस अवधि के दौरान काम का अभाव श्रमिकों की किसी चूक या काम छोड़ने के कारण नहीं था, बल्कि यह निगम के ठप पड़ने और बड़े प्रशासनिक तंत्र की विफलता का परिणाम था। उन्होंने यह भी कहा कि कई दशकों के अंतराल के बावजूद 42.50 रुपये प्रतिदिन की ऐतिहासिक दर पर बकाये की गणना करना मनमाना है, क्योंकि इसमें न्यूनतम मजदूरी में हुए वैधानिक संशोधनों और जीवन-यापन की लागत में वृद्धि की अनदेखी की गई है। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत आजीविका के अधिकार के हनन का हवाला देते हुए सार्वजनिक कानून उपचार के तहत मौद्रिक मुआवजे की मांग की।

ब्याज के मुद्दे पर, याचिकाकर्ताओं का कहना था कि ब्याज की गणना उस वास्तविक तिथि से होनी चाहिए जिस दिन संबंधित वेतन, सेवानिवृत्ति लाभ या भविष्य निधि देय हुई थी। ईपीएफ बकाये पर उन्होंने बल दिया कि कर्मचारी भविष्य निधि एवं प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1952 की धारा 7-क्यू के तहत ब्याज देना कानूनन अनिवार्य है।

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प्रतिवादी राज्यों की दलीलें

याचिका का विरोध करते हुए बिहार राज्य के वरिष्ठ अधिवक्ता श्री रंजीत कुमार और झारखंड राज्य के वरिष्ठ अधिवक्ता श्री अरुणाभ चौधरी ने कहा कि 2,074 सत्यापित कर्मियों को भुगतान करके पर्याप्त अनुपालन सुनिश्चित किया जा चुका है। राज्यों ने शेष 200 दावेदारों को खोजने के लिए किए गए प्रशासनिक प्रयासों का ब्योरा दिया—जिसमें अंतिम ज्ञात पते पर विशेष दूत भेजना, स्पीड पोस्ट भेजना, यूनियनों व जिला प्रशासन से समन्वय करना और राष्ट्रीय व क्षेत्रीय समाचार पत्रों में सार्वजनिक नोटिस जारी करना शामिल था। राज्यों ने अनुरोध किया कि इन अवशिष्ट मामलों को प्रशासनिक रूप से बंद माना जाए।

दैनिक वेतनभोगियों को लेकर राज्यों ने तर्क दिया कि वे केवल बीएससीसीएल द्वारा दैनिक शर्तों पर रखे गए थे और उन्हें न्यूनतम वेतन के बाद के संशोधनों का दावा करने का कोई निहित कानूनी अधिकार नहीं है। उन्होंने बताया कि 598 पहचाने गए दैनिक वेतनभोगियों में से 467 को उनकी सेवानिवृत्ति, मृत्यु या सेवा समाप्ति तक 42.50 रुपये प्रतिदिन की दर से 14.21 करोड़ रुपये का भुगतान पहले ही किया जा चुका है। राज्यों ने भुखमरी या सेवाकाल में मृत्यु के आधार पर एकमुश्त मुआवजे की मांग का पुरजोर विरोध करते हुए कहा कि सेवा नियमावली में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, और दशकों बाद यह तय करना व्यावहारिक रूप से असंभव है कि मौत भुखमरी से हुई थी या प्राकृतिक कारणों से।

ब्याज के मुद्दे पर दोनों राज्यों ने दलील दी कि वेतन बकाये पर 7.5 प्रतिशत और ईपीएफ पर 12 प्रतिशत ब्याज का बोझ सरकारी खजाने पर भारी वित्तीय दबाव डालेगा। उन्होंने तर्क दिया कि निगम स्वतंत्र कानूनी इकाइयां थे जिनकी देनदारियां स्वतः राज्यों पर नहीं डाली जा सकतीं। राज्यों ने यह भी रेखांकित किया कि भुगतान मानवीय आधार पर किए गए थे, इकाइयां दशकों से बंद थीं, कर्मियों ने उस दौरान कोई वास्तविक सेवा नहीं दी थी और उन्होंने यह भी सिद्ध नहीं किया है कि वे इस अवधि में कहीं अन्यत्र लाभप्रद रोजगार में नहीं थे।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

1. लापता और असत्यापित कर्मियों का सत्यापन

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि दोनों राज्यों ने समाचार पत्रों में नोटिस और अन्य माध्यमों से लापता कर्मचारियों और उनके वारिसों का पता लगाने के सभी उचित कदम उठाए हैं। अदालत ने माना कि जब बार-बार प्रयासों के बाद भी परिणाम नहीं निकला, तो राज्यों से इस कवायद को अनिश्चितकाल तक जारी रखने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। हालांकि, पीठ ने स्पष्ट किया कि प्रशासनिक रूप से प्रक्रिया बंद होने से कर्मियों का मूल कानूनी अधिकार समाप्त नहीं होगा। अदालत ने शेष दावेदारों या उनके वारिसों को नोडल अधिकारी के समक्ष दस्तावेज पेश करने के लिए 12 महीने की मोहलत दी।

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2. दैनिक वेतनभोगियों के अधिकार और मुआवजा

पीठ ने कहा कि यद्यपि दैनिक वेतनभोगी की सेवा नियमित कर्मचारियों से भिन्न होती है, लेकिन केवल दैनिक वेतनभोगी होने के आधार पर उनके साथ मनमाना व्यवहार नहीं किया जा सकता और न ही उनके द्वारा दी गई सेवाओं को नकारा जा सकता है। 42.50 रुपये की पुरानी दर पर बकाये की गणना को खारिज करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:

वर्ष 1992 से लेकर एक लंबी अवधि तक के लिए कर्मचारियों के बकाये की गणना के वास्ते 42.50 रुपये का निश्चित दैनिक वेतन एक समान आधार के रूप में अपनाना, हमारे विचार में, उनके वित्तीय हक का उचित और तर्कसंगत पैमाना नहीं हो सकता। ऐसा दृष्टिकोण इस धारणा पर आगे बढ़ता है कि कई दशकों की अवधि में जीवन-यापन की लागत और समय-समय पर लागू वैधानिक वेतन ढांचे में होने वाले परिवर्तनों के बावजूद, श्रम का मूल्य और उसके लिए देय वेतन स्थिर बना रहा।

हालांकि, अदालत ने यह भी माना कि दशकों बाद प्रत्येक कर्मचारी की दैनिक मजदूरी का नए सिरे से निर्धारण करने का निर्देश देने से मुकदमेबाजी का एक और लंबा दौर शुरू हो जाएगा। इसलिए, समानता और न्याय के संतुलन को साधते हुए कोर्ट ने प्रत्येक दैनिक वेतनभोगी को 1,00,000 रुपये की अतिरिक्त एकमुश्त अनुग्रह राशि देने का आदेश दिया। सेवा नियमावली में प्रावधान न होने के कारण भुखमरी या मृत्यु मुआवजे की मांग को अस्वीकार कर दिया गया।

3. ईपीएफ बकाये पर ब्याज

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भविष्य निधि एक सामाजिक सुरक्षा उपाय है और इसे सामान्य मौद्रिक दावे की तरह नहीं देखा जा सकता। कर्मचारी भविष्य निधि एवं प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1952 की धारा 7-क्यू का विश्लेषण करते हुए अदालत ने आरकोट टेक्सटाइल मिल्स लिमिटेड बनाम रीजनल प्रॉविडेंट फंड कमिश्नर व अन्य मामले के अपने पूर्व निर्णय को दोहराया:

धारा 7-क्यू, जो विलंबित भुगतान के लिए ब्याज का प्रावधान करती है, मूलतः प्रभावित कर्मचारियों को ब्याज के भुगतान के रूप में एक मुआवजा है। यह प्रावधान काम की न्यायसंगत और मानवीय परिस्थितियां सुरक्षित करने के उद्देश्य से बनाया गया है, जैसा कि रीजनल प्रॉविडेंट फंड कमिश्नर बनाम हुगली मिल्स कंपनी लिमिटेड में विचार व्यक्त किया गया था। धारा 7-क्यू में प्रयुक्त भाषा विलंबित भुगतान पर ब्याज लगाने का प्रावधान करती है और इसकी दरें निर्धारित की गई हैं।

पीठ ने निर्णय दिया कि धारा 7-क्यू के तहत ब्याज की देनदारी कानून के संचालन से उत्पन्न होती है और इसे केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि मूल राशि का भुगतान बाद में कर दिया गया था।

4. वेतन बकाये पर ब्याज

वेतन बकाये को वैधानिक ईपीएफ से अलग बताते हुए कोर्ट ने रेखांकित किया कि वेतन बकाये के लिए कोई एक समान वैधानिक ब्याज दर निर्धारित नहीं है। सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया बनाम रवींद्र व अन्य मामले में संविधान पीठ के निर्णय का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि ब्याज वास्तव में उस धन के उपयोग से वंचित किए जाने का मुआवजा है, जिसका व्यक्ति वैध हकदार था:

सेक्रेटरी, इरिगेशन डिपार्टमेंट, ओडिशा सरकार बनाम जी.सी. रॉय में संविधान पीठ ने विचार व्यक्त किया था कि जिस व्यक्ति को उस धन के उपयोग से वंचित रखा जाता है जिसका वह वैध रूप से हकदार है, उसे इस वंचना के लिए मुआवजा पाने का अधिकार है, चाहे इसे किसी भी नाम से पुकारा जाए। इसे ब्याज, मुआवजा या हर्जाना कहा जा सकता है… यही सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 34 का सिद्धांत है।

राज्यों द्वारा स्वतंत्र कॉर्पोरेट इकाई की आड़ लेने की दलील को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि कल्याणकारी राज्य होने के नाते, जिनके अधीन ये निगम काम कर रहे थे, बिहार और झारखंड अपने उपक्रमों की विफलता के कारण कर्मचारियों के वैध अधिकारों को निरर्थक नहीं बना सकते। हालांकि, ब्याज को दंडात्मक बनने से रोकने और क्षतिपूर्ति के रूप में रखने के लिए अदालत ने 7.5 प्रतिशत की सिफारिश के स्थान पर 6 प्रतिशत प्रति वर्ष साधारण ब्याज तय किया।

अदालत के अंतिम निर्देश

रिट याचिका (सिविल) संख्या 932/2022 का निस्तारण करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:

  1. सत्यापन प्रक्रिया की समाप्ति और रियायत: कर्मचारियों की पहचान की प्रक्रिया को प्रशासनिक रूप से बंद किया जाता है। हालांकि, असत्यापित या लापता कर्मी अथवा उनके कानूनी वारिस इस आदेश की तारीख से 12 महीने के भीतर संबंधित नोडल अधिकारी से संपर्क कर दस्तावेज प्रस्तुत कर सकते हैं, जिसके बाद उनके बकाये का भुगतान किया जाएगा।
  2. वेबसाइट पर अनिवार्य प्रकाशन: चार सप्ताह के भीतर दोनों राज्य अपने सूचना एवं जनसंपर्क विभाग तथा संबंधित प्रशासनिक विभागों की वेबसाइटों पर सभी कर्मचारियों का पूरा विवरण सार्वजनिक करेंगे। इसमें भुगतान पा चुके कर्मचारियों का ब्योरा तथा लंबित मामलों के कारण, आवश्यक दस्तावेज और नोडल अधिकारी के संपर्क विवरण स्पष्ट रूप से दर्ज होंगे। इसे समय-समय पर अपडेट किया जाएगा।
  3. दैनिक वेतनभोगियों को एकमुश्त राशि: दोनों राज्य संबंधित अवधि में कार्यरत प्रत्येक दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी को 1,00,000 रुपये की अतिरिक्त एकमुश्त राशि का भुगतान करेंगे।
  4. ब्याज दरें: ईपीएफ बकाये पर अधिनियम की धारा 7-क्यू के तहत 12 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से साधारण ब्याज देय होगा। वेतन बकाये और अन्य गैर-ईपीएफ भुगतानों पर देय तिथि से वास्तविक भुगतान की तिथि तक 6 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से साधारण ब्याज दिया जाएगा।
  5. भुगतान की समय-सीमा: ब्याज और मूल बकाये की गणना कर यह राशि आज से तीन महीने के भीतर वितरित की जाएगी।
  6. नजीर का दायरा: अदालत ने स्पष्ट किया कि ये निर्देश इस मामले के असाधारण विलंब और विशिष्ट परिस्थितियों को देखते हुए दिए गए हैं और इन्हें अन्य मामलों के लिए सामान्य बाध्यकारी कानूनी नजीर नहीं माना जाएगा।
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मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: बिहार स्टेट अर्ध सरकारी अराजपत्रित कर्मचारी महासंघ और अन्य बनाम बिहार राज्य और अन्य

वाद संख्या: रिट याचिका (सिविल) संख्या 932/2022 

पीठ: जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता 

निर्णय की तिथि: 28 सितंबर, 2026

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