पति द्वारा 35 लाख रुपये परमानेंट एलिमनी देने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत शादी भंग की, दोनों पक्षों के बीच लंबित 18 केस किए रद्द

सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसमें जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन शामिल हैं, ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपने असाधारण अधिकारों का प्रयोग करते हुए एक अलग रह रहे जोड़े को आपसी सहमति से तलाक की डिक्री दी और दोनों पक्षों तथा उनके परिजनों के बीच चल रहे सभी 18 दीवानी व आपराधिक मुकदमों को रद्द कर दिया। कोर्ट ने यह आदेश प्रतिवादी-पति द्वारा याचिकाकर्ता-पत्नी को सभी दावों के अंतिम निपटारे के तौर पर 35 लाख रुपये की परमानेंट एलिमनी (स्थायी गुजारा भत्ता) का भुगतान करने के बाद दिया, जिससे वर्षों से विभिन्न अदालतों में खिंच रही कानूनी लड़ाई पर पूरी तरह विराम लग गया।

मामले की पृष्ठभूमि

इस विवाद की शुरुआत याचिकाकर्ता-पत्नी द्वारा दायर दो ट्रांसफर याचिकाओं (ट्रांसफर पिटीशन) से हुई थी। पहली आपराधिक ट्रांसफर याचिका में पत्नी ने कटक (ओडिशा) की जेएमएफसी-3 अदालत में लंबित चार्जशीट संख्या 251/2024 (एफआईआर संख्या 148/2022, आईपीसी की धारा 294, 323, 341 और 506 के तहत दर्ज) को गिरगांव (मुंबई) की अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (एसीजेएम) अदालत में स्थानांतरित करने की मांग की थी। वहीं, दूसरी सिविल ट्रांसफर याचिका में पत्नी और उसके परिजनों ने सास द्वारा घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत कटक में दायर शिकायत को भी मुंबई ट्रांसफर करने का अनुरोध किया था। सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व में दोनों मामलों में नोटिस जारी कर निचली अदालतों की कार्यवाही पर रोक लगा दी थी।

पक्षकारों का विवाह 4 दिसंबर 2016 को कटक (ओडिशा) में संपन्न हुआ था और आपसी मतभेदों के चलते वे वर्ष 2022 से अलग रह रहे थे। सुप्रीम कोर्ट मध्यस्थता केंद्र में बातचीत विफल रहने के बाद, प्रतिवादी-पति ने सुप्रीम कोर्ट में संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत एक अंतरिम आवेदन दायर किया। इसमें शादी के पूरी तरह टूट जाने (इर्रिट्रीवेबल ब्रेकडाउन ऑफ मैरिज) के आधार पर तलाक की डिक्री देने और दोनों पक्षों व उनके परिजनों के बीच लंबित सभी सिविल और आपराधिक मामलों को रद्द करने की मांग की गई थी।

पक्षकारों की दलीलें

याचिकाकर्ता-पत्नी की वकील ने निर्देशों के आधार पर कोर्ट को बताया कि पत्नी उचित परमानेंट एलिमनी मिलने की शर्त पर आपसी सहमति से तलाक लेने के लिए तैयार है। वकील ने पत्नी की गंभीर चिकित्सीय स्थिति और इलाज के लगातार खर्चों का हवाला देते हुए कहा कि वह अपने पिता पर निर्भर है, जबकि पति के पास सम्मानजनक गुजारा भत्ता देने के पर्याप्त वित्तीय साधन उपलब्ध हैं। सुनवाई के दौरान वकील ने यह भी अवगत कराया कि उन्हें याचिकाकर्ता-पत्नी से एक कानूनी नोटिस मिला है जिसमें उनका प्रतिनिधित्व न करने को कहा गया है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने वकील को मामले से भारमुक्त करने से इनकार करते हुए कहा कि उन्होंने याचिकाकर्ता और अदालत दोनों की बेहद प्रभावी ढंग से सहायता की है।

प्रतिवादी-पति के वकील ने दलील दी कि पत्नी ने शुरुआत में 30 लाख रुपये की मांग की थी, जबकि पति 15 लाख रुपये देने को तैयार था। कोर्ट के सुझाव पर पति ने कर्ज लेकर भी इस राशि को बढ़ाकर 35 लाख रुपये करने पर सहमति जताई, बशर्ते यह पत्नी के सभी दावों का पूर्ण और अंतिम निपटारा हो।

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सुप्रीम कोर्ट द्वारा 5 अगस्त 2026 को दिए गए अंतरिम निर्देशों के तहत पति ने तत्काल 2 लाख रुपये का भुगतान किया और बाद में शेष 33 लाख रुपये के दो डिमांड ड्राफ्ट बेंच के समक्ष पेश किए। व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुई पत्नी ने इन ड्राफ्टों को स्वीकार किया और दोनों पक्षों के बीच लंबित मुकदमों की सूची सौंपते हुए सभी मामलों को रद्द करने की प्रार्थना की। पति के वकील ने भी अनुपालन हलफनामा और मुकदमों की सूची पेश कर मामलों को बंद करने का अनुरोध किया।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

संविधान के तहत अपने असाधारण क्षेत्राधिकार के दायरे पर विचार करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने संविधान पीठ के ऐतिहासिक फैसले शिल्पा शैलेश बनाम वरुण श्रीनिवासन (2023) 14 एससीसी 231 का हवाला दिया और दोहराया:

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“इस अदालत द्वारा ऐसे मामलों में किसी ‘वाद या विषय’ में ‘पूर्ण न्याय’ करने के लिए भारत के संविधान के अनुच्छेद 142(1) के तहत अधिकार क्षेत्र का प्रयोग स्पष्ट रूप से स्वीकार्य है। हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि यह अदालत ऐसा आदेश या डिक्री पारित कर सकती है जो कोई फैमिली कोर्ट, ट्रायल कोर्ट या हाईकोर्ट पारित कर सकता है।”

बेंच ने रेखांकित किया कि जब दोनों पक्ष लंबे समय से अलग रह रहे हों और उनके बीच बिना किसी दबाव के एक वास्तविक समझौता हो चुका हो, जिसमें गुजारा भत्ता और वित्तीय दावों का निपटारा हो गया हो, तो उन्हें ट्रायल कोर्ट में भेजना या हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13-बी के तहत तय समयसीमा की औपचारिकता पर जोर देना केवल मुकदमेबाजी को बेवजह लंबा खींचना होगा।

इसके साथ ही कोर्ट ने रिंकू बाहेती बनाम संदेश शारदा (2025) 3 एससीसी 686 के फैसले का उल्लेख किया, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि विवाह के पूरी तरह टूट जाने के आधार पर अनुच्छेद 142 के तहत तलाक देना अदालत का एक विवेकाधीन अधिकार है:

“केवल तभी जब यह अदालत संतुष्ट और आश्वस्त हो कि विवाह में ऐसा गतिरोध आ गया है जिसे बचाया नहीं जा सकता और पक्षकारों के लिए एकमात्र समाधान अपने वैवाहिक संबंधों को समाप्त करके स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ना है, तो विवाह के पूरी तरह टूट जाने के आधार पर तलाक की डिक्री दी जा सकती है।”

इन कानूनी सिद्धांतों को मामले के तथ्यों पर लागू करते हुए बेंच ने टिप्पणी की:

“इसलिए हमें प्रतिवादी संख्या 3/पति के विद्वान वकील की इस दलील में बल दिखाई देता है कि चूंकि वर्तमान मामले में दोनों पक्षों का वैवाहिक संबंध एक ऐसे मोड़ पर पहुंच चुका है जहां सुलह की कोई गुंजाइश नहीं बची है, ऐसे में प्रतिवादी संख्या 3/पति द्वारा संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत दायर आवेदन को स्वीकार करके और परिणामस्वरूप आपसी सहमति से तलाक की डिक्री देकर तथा पक्षों के बीच लंबित मुकदमों को रद्द करके ही वास्तविक न्याय हासिल किया जा सकता है।”

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिवादी-पति के आवेदन को स्वीकार करते हुए 4 दिसंबर 2016 को संपन्न हुए विवाह को औपचारिक रूप से समाप्त करने का आदेश दिया।

वैवाहिक विवाद को हमेशा के लिए समाप्त करने के उद्देश्य से कोर्ट ने दोनों पक्षों और उनके परिजनों के बीच विभिन्न मंचों पर लंबित सभी 18 मामलों को रद्द कर दिया। इनमें शामिल हैं:

  • आईपीसी की धारा 498ए तथा धारा 294, 323, 341 और 506 के तहत दर्ज आपराधिक मामले;
  • घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत दर्ज शिकायतें और अपीलें;
  • वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत दायर शिकायत;
  • केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) की कार्यवाही से जुड़ा दिल्ली हाईकोर्ट में लंबित रिट पिटीशन;
  • दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 340 के तहत झूठी गवाही (परजरी) से संबंधित आवेदन।
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बेंच ने निर्देश दिया कि दोनों पक्षों के बीच यदि कोई अन्य दीवानी या आपराधिक मामला लंबित हो, तो वह भी रद्द माना जाएगा। साथ ही, दोनों पक्षों को भविष्य में एक-दूसरे के खिलाफ कोई नया मुकदमा दायर न करने का आदेश दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने दोनों ट्रांसफर याचिकाओं का निस्तारण करते हुए रजिस्ट्री को औपचारिक डिक्री तैयार करने का निर्देश दिया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: शिखा पत्नी वरुण सुरेखा उर्फ शिखा पुत्री शरदकुमार रानीवाला बनाम ओडिशा राज्य व अन्य 

वाद संख्या: ट्रांसफर पिटीशन (क्रिमिनल) संख्या 493/2025 साथ में ट्रांसफर पिटीशन (सिविल) संख्या 2564/2025 

पीठ: जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन 

निर्णय की तिथि: 28 सितंबर 2026

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